होठ चुप हैं और मैं लेटा हुआ।
कहीं 'कुछ' अति बड़ा होगा,
रहस्यों में छुपा होगा,
आंख खुल
जाएगी
मेरी
देखकर...
मान कर यह
रस्तों पे दौडा आजतक!
पीछे मैं इनके,
आवरण
में
छुपाए
जो घूमते हैं अंक में
मंदिरों और मस्जिदों में
आदमी के ख्वाब को।
ऊंचे वहां..
उन गुंबद-ओ-मीनार पे
चढ़ नहीं सकता जहां मैं..
उम्र में इस, मोड़ पर
दिखाते
हैं
बताते हैं,
रखा हुआ है,
सपनों का सुख
और कोई स्वर्ग!
मृत्यु के उस पार का..
सौदा हैं करते..
पल रहे
समाज के ही दान पर ये
आज भी आस्था पर
विज्ञान के भी जमाने में देख तो।
आखिरी इस दशक तक
खोजा बहुत..
पर
नहीं पाया,
सच में बाहर, एक भी सच।
अंदर कहीं कुछ
चमकता है,
झलकता
है,
निथरता है, जब
शांत होता मेरा मन..
और अब जब थक गया हूँ
गिर पड़ा हूं, दौड़ता
फुटपाथ पर
इस
जिंदगी के अपरवश
मूर्छित हुआ सा
छोड़ दी
दुनियां मुझे, तब कहीं पर्दा हटा।
मुखातिब मैं सत्य से
सच हो गया.. हूँ
कुछ नहीं थी.. जिंदगी,
एक हरा पत्ता सा रहा
संसार रूपी पेड़ का,
काम अब पूरा हुआ
और यह अब सूखता पीला हुआ।
प्रश्न मेरा एक था
इस बिचारी जिंदगी से
क्या कहीं कोई ख्वाब था
तुम्हारा इस जन्म में
अंत में, क्या सोचते हो
रह गया/ आंशिक/ पूरा हुआ ?
खिलखिला कर
हंस पड़ी मेरी जिंदगी..
ख्वाब था,
मनुष्यता को जी सकूं
मनुष्य होकर इस धरा पर..
स्वार्थ के मद्देनजर वह रह गया।
पटाक्षेप:
सूखा हुआ मुंह, बंद पलकें
होठ चुप हैं,
और
मैं लेटा हुआ
अंत में तेरे सामने,
मैं यही था, पहुंचा यहीं तक
लक्ष्य मेरा जिंदगी भर दूर का था।
आने दो उसको, छूने दो मुझको,
हवा है वो, आम है
आखिरी एक सच कहूँ!
खास होना जिंदगी में आम
का भी ख्वाब था
जय प्रकाश मिश्र
जी मित्र। यह रचना आपकी पिछली कविताओं की ही धारा में है, लेकिन यहाँ आत्म-खोज से आगे एक कठोर आत्म-परीक्षण आ गया है। “बाहर कोई बहुत बड़ा रहस्य मिलेगा” से शुरू होकर कविता अंततः “मनुष्यता को जी सकूं” तक पहुँचती है। मेरे लिए यही इसका वास्तविक केंद्र है।
भाव-संपुटिका — सारांश, भाव-सरिता और क्रिटिक
कविता का आरंभ उस मनुष्य से होता है जो जीवन भर किसी विराट रहस्य की तलाश में बाहर दौड़ता रहा—मंदिरों, मस्जिदों, गुंबदों, मीनारों और मृत्यु के पार के स्वर्ग में। उसे विश्वास था कि कहीं कोई ऐसा आवरण है जिसके पीछे अंतिम सत्य छिपा है और एक दिन उसकी आँख खुल जाएगी।
लेकिन उम्र के अंतिम मोड़ पर पीछे मुड़कर देखता है तो स्वीकार करता है—
> “नहीं पाया,
सच में बाहर, एक भी सच।”
यहाँ कविता बाहरी धार्मिक संरचनाओं का केवल विरोध नहीं करती; वह मनुष्य की उस आदत पर प्रश्न करती है जिसमें वह अपने भीतर के अज्ञात को बाहर किसी संस्था, स्थान या वादे में खोजता रहता है।
फिर कविता का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन आता है—
> “अंदर कहीं कुछ
चमकता है,
झलकता है,
निथरता है, जब
शांत होता मेरा मन..”
यहीं बाहरी यात्रा समाप्त होकर अंतर्यात्रा शुरू होती है। लेकिन सत्य भी यहाँ कोई मूर्त वस्तु बनकर सामने नहीं आता। वह शांत मन में झलकता है।
फिर जीवन का अंतिम बोध अत्यंत मार्मिक है। मनुष्य स्वयं को संसार-वृक्ष का एक हरा पत्ता पाता है—कुछ समय हरा, फिर पीला, फिर सूखता हुआ। उसका काम पूरा हुआ। यह बिंब आपकी पूरी कविता को बहुत सहज ढंग से मृत्यु और अनित्यता से जोड़ देता है।
लेकिन कविता का सबसे बड़ा और सबसे मानवीय खुलासा इसके बाद है।
जब जिंदगी से पूछा जाता है—
> “क्या कहीं कोई ख्वाब था
तुम्हारा इस जन्म में?”
तो जिंदगी हँसकर उत्तर देती है—
> “ख्वाब था,
मनुष्यता को जी सकूं
मनुष्य होकर इस धरा पर..
स्वार्थ के मद्देनजर वह रह गया।”
यही पूरी कविता का हृदय है।
जिस सत्य की तलाश मंदिरों और मस्जिदों के पार की जा रही थी, अंततः वह किसी रहस्यमय स्वर्ग में नहीं, मनुष्य होकर जी पाने की असफल कोशिश में दिखाई देता है।
और पटाक्षेप में—
> “खास होना जिंदगी में आम
का भी ख्वाब था”
यह बहुत सुंदर उलटाव है। मनुष्य “खास” होना चाहता रहा, जबकि जीवन का अंतिम स्वप्न शायद “आम” होकर भी मनुष्य बने रहना था। “आम” यहाँ साधारण भी है और फल भी—यह द्विअर्थी स्पर्श कविता को याद रह जाने वाला अंत देता है।
अब निर्मोही क्रिटिक
यह कविता विचार की दृष्टि से बहुत मजबूत है, लेकिन संपादन की दृष्टि से अभी खुली हुई है।
पहला: शुरुआती मंदिर-मस्जिद वाला अंश थोड़ा अधिक प्रत्यक्ष है।
“दान पर पल रहे”, “अंधेरगर्दी”, “विज्ञान के जमाने में” जैसी पंक्तियाँ आपके आंतरिक अनुभव से निकलने के बजाय सामाजिक टिप्पणी जैसी लगती हैं। आपकी कविता की शक्ति निर्णय सुनाने में नहीं, अपने जीवन का हिसाब खोलने में है। यदि इस हिस्से को थोड़ा संयत किया जाए तो चोट अधिक गहरी होगी।
दूसरा:
> “आखिरी इस शतक तक”
यदि आशय जीवन के आठवें दशक/अंतिम दशक से है, तो “शतक” पाठक को भ्रमित कर सकता है। यदि यह जानबूझकर जीवन को सौ वर्ष की इकाई मानकर कहा गया है, तो उसे कहीं और अधिक स्पष्ट संकेत चाहिए। वरना यह शब्द बदलने योग्य है।
तीसरा और बहुत महत्वपूर्ण: “कुछ नहीं थी जिंदगी” को मैं थोड़ा सावधानी से देखूँगा। आपकी कविता का पूरा अंतिम दर्शन यह नहीं कहता कि जीवन कुछ नहीं था; वह कहता है कि जीवन का बाहरी वैभव अंतिम सत्य नहीं था। “हरा पत्ता” वाला बिंब स्वयं जीवन को अर्थ देता है। इसलिए “कुछ नहीं थी जिंदगी” कहीं आपकी अपनी कविता के पूर्वार्ध को ही काट न दे।
चौथा: सबसे बड़ी ताकत और संभावित कमजोरी दोनों है—बहुत सारे बड़े प्रश्न एक साथ हैं: सत्य, धर्म, स्वर्ग, मृत्यु, विज्ञान, आत्मा, जीवन का स्वप्न, मनुष्यता, खास/आम। सामग्री बहुत समृद्ध है। इसे थोड़ा कसने पर कविता का अंतिम वार बहुत अधिक शक्तिशाली होगा।
लेकिन पटाक्षेप को बचाइए
अंतिम दृश्य में सूखा मुंह, बंद पलकें, चुप होंठ और सामने खड़ा अंतिम सत्य—यह दृश्यात्मक रूप से बहुत अच्छा है। और—
> “आने दो उसको, छूने दो मुझको,
हवा है वो, आम है”
यहाँ आपकी कविता फिर दार्शनिक होने के बजाय स्पर्शनीय हो जाती है। यही जगह मुझे विशेष रूप से पसंद है।
और अंतिम पंक्ति में “खास” से “आम” की यात्रा—पूरी जिंदगी की महत्वाकांक्षा को एक छोटे-से शब्द में उलट देती है। इसे रहने देना चाहिए।
एक वाक्य में कविता
जीवन भर बाहर किसी महान सत्य को खोजता मनुष्य अंत में अपने भीतर लौटकर पाता है कि सबसे बड़ा अधूरा स्वप्न कोई स्वर्ग पाना नहीं, बल्कि इस धरती पर मनुष्य होकर जी पाना था।
मित्रों को मोती
१.
सत्य को बहुत दूर खोजते रहे;
अंत में पता चला—
मन शांत हुआ तो रास्ता छोटा हो गया।
२.
जीवन का सबसे बड़ा अधूरा स्वप्न
धन, यश या स्वर्ग नहीं;
मनुष्य होकर मनुष्य के साथ जी पाना है।
३.
खास बनने की दौड़ बहुत लंबी है;
कभी आम होकर देखो—
शायद वहीं जीवन पहली बार अपना लगे।
एक चोट गहरी होनी चाहिए , दूसरा वह दशक ही है शुद्ध करूंगा। कुछ नहीं से अर्थ है कि इसे लेकर बहुत परेशान न रहें।
हाँ मित्र—अब आपकी मंशा स्पष्ट है। “कुछ नहीं थी जिंदगी” को हटाने की जरूरत नहीं है। यहाँ “कुछ नहीं” नास्तित्व नहीं, बल्कि जीवन को लेकर अनावश्यक संचय, चिंता और उपलब्धि-बोध से मुक्त हो जाना है—इतना सब किया, अंततः साथ क्या गया? कुछ भी नहीं। इसलिए जीवन को पकड़े रहने की बेचैनी क्यों?
और आपने बिल्कुल सही पकड़ा—इस कविता में एक गहरी चोट चाहिए, लेकिन वह गाली या आरोप की चोट नहीं; ऐसी चोट जो पाठक के भीतर देर तक रहे।
मेरे हिसाब से वह चोट पहले से मौजूद है:
> ख्वाब था,
मनुष्यता को जी सकूं
मनुष्य होकर इस धरा पर..
स्वार्थ के मद्देनजर वह रह गया।
यही कविता का सबसे गहरा घाव है।
क्योंकि यहाँ आदमी यह नहीं कह रहा कि उसका धन कम रह गया, यश कम रह गया या स्वर्ग नहीं मिला। वह स्वीकार कर रहा है कि जिस एक चीज के लिए मनुष्य जन्म मिला था, वही पूरी तरह जी नहीं पाया।
और यदि चोट को और भीतर तक पहुँचाना हो, तो उसके बाद कोई अतिरिक्त दार्शनिक व्याख्या नहीं चाहिए। खाली जगह ही चोट को गहरा करेगी।
मुझे लगता है आपकी कविता का क्रम बहुत सार्थक है:
बाहर सत्य की खोज → भीतर उसकी झलक → जीवन का हिसाब → असली स्वप्न का खुलासा → असफलता → मृत्यु के सामने अंतिम स्वीकृति → “खास” से “आम” तक।
और “दशक” शुद्ध करने के बाद यह और साफ हो जाएगा।
एक और बात—“कुछ नहीं” को समझाने के लिए कविता में कोई अतिरिक्त पंक्ति न जोड़िए। पाठक को उस खालीपन में थोड़ी देर रहने दीजिए। वही आपकी कविता की चुप चोट होगी।
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