आदमी है सबसे नीचे।

आसान हो या कठिन हो 
दुनियां ये क्यूं.. है
इस तरह की,
इतनें 
दिनों से, बुन रही 
कोई जाल है क्या, नटवरी! 

काम पर रखा हमे है, मुफ्त में..
इस जिंदगी भर, 
भोजनों पर
कुछ भी न देगी, फल हमें
और अंत में, एक दिन 
सब छीन लेगी 
बिन बताए.. 
भगा देगी
इस 
जहां से.. नृशंसी!

सोचता हूँ कौन है वह
नित पट बदलती 
सामने मेरे
स्वांग 
रचती, लुभा लेती
आदमी को
फांस 
लेती औरतों को 
किस तरह से
एक साथ रखती, जिंदगी में
जिंदगी से, बांध देती शरीरों को
अपना बना लेती हमे, 
किन लालचों में
बाँधकर, 
संतति हमारी प्राप्त करती
उसी से, यह और आगे
साथ रहती मौन 
यह
बुद्धि दे, विवेक दे, शक्ति दे दे
काम सारे कराती है
इस जहां के..
और हम..सब, जानकार सब 
मूक हो.. बैल से भी और बदतर 
लगे रहते, नधे रहते, 
छोड़कर आराम हर।

और सुख हैं मानते हम इसी को
संतुष्ट हैं, बिन पगारों के..
खुश हैं रहते 
जाल में 
उस 
नटवरी के, देख कैसे, जिदगी भर।

रूप रंग संवारती, चुपचाप है यह
नवल रहती, शोर करती 
कभी भी न!
अंत करती राजवंशों का
सभी यह मौन में
सभ्यता को लील जाती
संस्कृति को क्षीण करती
जब बदलते हैं रास्ते हम। 

भरम दे दे, पालती है
विश्वास में हमें  
पागती है
प्रेम
में
हमे सानती है,
लालचों से सींचती है..
मूर्खता में बांधती है
जीवनों का इस तरह 
चींटियों से और बदतर! 
हम लगे हैं, जान देकर.. 
पुश्त से दर पुश्त इसके द्वार पर..
सच कहूं! कुछ नहीं, मजदूर हैं हम।

और प्राणी, वनस्पति 
उगते हैं इसमें 
जीवंत 
कैसे बिहरते, 
आनंद भर, उल्लास भर, 
चाहना में लिपटते, एक बनते
सौरभ उड़ाते, जिंदगी भर, 
जीवन मधुर है सोचते, 
मधुरता में ही वे रमते भरमते।

पूछता हूँ! 
क्यूं बने आसूं हैं, हममें, 
खारे खारे पास सबके, नेत्र में रखे हुए
मुस्कुराहट तैरती हर फूल पर, 
हर मुखों के अधर पर
हर कली में क्यों 
गुंथी है मधुरता
ये जाल है क्या..
बस पूछता हूं.. 
फूल खिलते, हंस उड़ते
झरने झरते ऐसे सुंदर
प्रिय हमे, क्यों कर हैं लगते ? 

और इनके बीच में
एक 'मैं' हूँ.. एक 'तुम' हो
सारे बच्चे बीच में हैं क्यों खड़े
कोई बताए न! नटवरी का राज क्या है
इतनी घनेरी दिवानी ये बदलियां 
उड़ती.. क्यूं! ऊंचे
कुछ तो है, 
बादल वहां है, आदमी है कितने नीचे।
हां आदमी है सबसे नीचे।

जय प्रकाश मिश्र

जी। यह कविता पिछली कविता की तरह केवल ‘दुनिया कैसी है’ नहीं पूछती, बल्कि उससे एक कदम आगे जाकर पूछती है—“मनुष्य इस व्यवस्था में आखिर है क्या?” आपने दुनिया को फिर ‘नटवरी’ बनाया है—मोहिनी भी, कठोर भी, सृजनशील भी और अंततः सब कुछ वापस ले लेने वाली भी।


सबसे मजबूत बात यह है कि अंत तक आते-आते प्रश्न बदल जाता है। शुरुआत में आदमी दुनिया का मजदूर है; बीच में वह उसके सुखों में स्वयं बँधा हुआ है; और अंत में बादल ऊपर, आदमी नीचे—यह केवल ऊँचाई का दृश्य नहीं, मनुष्य की अपनी सीमित चेतना का बिंब बन जाता है।


प्रवाहमय सारांशिका और आलोचनात्मक दृष्टि


कविता का प्रवाह कुछ यूँ बनता है—

दुनिया → जाल → मजदूरी → मोह → परिवार → संतति → सुख का भ्रम → सभ्यता → प्रकृति → आँसू और मुस्कान → ‘मैं’ और ‘तुम’ → बच्चे → बादल → मनुष्य की स्थिति।


मनुष्य जन्म लेता है, काम करता है, खाता है, प्रेम करता है, संतति पैदा करता है, घर बनाता है, संस्कृति रचता है और फिर उसी संसार के मोह में बँधा हुआ जीवन पूरा कर देता है। उसे लगता है कि वह स्वतंत्र होकर जी रहा है, जबकि कविता की दृष्टि में वह किसी विराट व्यवस्था का “बिना पगार का मजदूर” है। दुनिया उसे बुद्धि भी देती है, विवेक भी, शक्ति भी—और उन्हीं के सहारे उससे अपने सारे काम भी करा लेती है।


लेकिन यहाँ कविता केवल निराशा नहीं है। प्रकृति को देखिए—फूल खिलते हैं, हंस उड़ते हैं, झरने बहते हैं, बादल चलते हैं, जीव और वनस्पतियाँ जीवन में रमती हैं। प्रकृति मानो बिना प्रश्न किए जीवन का उत्सव मना रही है; केवल मनुष्य है जो पूछता है—“यह जाल है क्या?”


और यही कविता का असली दार्शनिक बिंदु है।


मनुष्य को संसार बाँधता है, पर उसी संसार में सौंदर्य भी देता है। वह आँसू भी देता है और मुस्कान भी। वह मृत्यु रखता है, पर फूल भी खिलाता है। वह मोह देता है, पर विवेक भी देता है। इसलिए ‘नटवरी’ को केवल छलिया कहना कविता के अपने अंतिम प्रश्न को छोटा कर देगा। वह एक ऐसी विराट सत्ता/व्यवस्था है जिसका रहस्य मनुष्य भोगता तो है, पर समझ नहीं पाता।


मेरी आलोचनात्मक टिप्पणी यही होगी कि कविता में “जाल”, “मजदूर”, “मुफ्त में”, “बिन पगार” जैसे विचार कई जगह पुनरावृत्त होते हैं। इन्हें थोड़ा कस दिया जाए तो अंतिम दार्शनिक प्रश्न कहीं अधिक प्रहारक होगा। विशेषतः अंतिम पंक्तियाँ—


> “कुछ तो है,

बादल वहां है, आदमी है कितने नीचे।

हां आदमी है सबसे नीचे।”




—इनका प्रभाव इसलिए बहुत बड़ा है कि पूरी कविता के बाद अचानक दुनिया के रहस्य से मनुष्य की लघुता सामने आती है। मैं इन्हें बिल्कुल नहीं छेड़ूँगा।


यहाँ आपकी “एक चोट गहरी” यही है:


जिस संसार को आदमी जीतना चाहता रहा,

शायद उसी संसार को समझने में वह सबसे पीछे रह गया।


मित्रों को मोती


मित्रों को मोती


मित्रों,


हम सोचते हैं कि हम अपनी जिंदगी जी रहे हैं।

पर कभी ठहरकर देखें तो लगता है—

हम जन्म से ही किसी विराट व्यवस्था में

काम पर रख दिए गए हैं।


मुफ्त में।


हमें भूख मिलती है,

तो भोजन खोजते हैं।

प्रेम मिलता है,

तो घर बनाते हैं।

संतति मिलती है,

तो भविष्य बनाने लगते हैं।

सपने मिलते हैं,

तो उम्र लगा देते हैं।


और इस सबके बीच

हम इतने प्रसन्न रहते हैं

कि भूल ही जाते हैं—

जिस संसार को अपना समझकर

सजाते रहे,

एक दिन वही संसार

बिना पूछे हमसे सब वापस ले लेगा।


फिर भी क्या यह संसार केवल छल है?


नहीं।


वही तो फूल खिलाता है,

झरने बहाता है,

हंस उड़ाता है,

बादलों को आकाश में छोड़ता है,

हमारे भीतर प्रेम रखता है,

आँखों में आँसू भी

और अधरों पर मुस्कान भी।


शायद रहस्य यही है—


दुनिया हमें बाँधती भी है

और जीवन का रस भी देती है।

वह हमें चलाती भी है

और चलने का अर्थ पूछने की बुद्धि भी देती है।


हम उसकी मजदूरी करते-करते

कभी-कभी यह भूल जाते हैं

कि हम मजदूर भर नहीं हैं—

हम उसके रहस्य के साक्षी भी हैं।


इसलिए आज एक प्रश्न अपने भीतर रखें—


जिस संसार को पाने में

हमने पूरी जिंदगी लगा दी,

क्या हमने उसे कभी

सचमुच देखा भी?


फूल क्यों सुंदर हैं?

बादल क्यों भाते हैं?

किसने हमारे भीतर

इनके लिए प्रेम रखा है?


और अंत में शायद

सबसे बड़ा प्रश्न—


आकाश इतना ऊँचा क्यों है

और आदमी इतना नीचे?


शायद इसलिए कि

ऊँचाई केवल आकाश में नहीं होती;

उसे देखने वाली दृष्टि में भी होती है।


दुनिया का रहस्य शायद बाहर नहीं,

उसे देखते हुए हमारे भीतर खुलना है।

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