हे जलद! पुनि पुनि तूं आना।
मित्रों जल जीवन है, और जलद जल अक्षय दाता उन्हीं पर यह लाइने।
हे जलद, निर्घोष! तुम
हवाओं के विमानों पर
उड़ रहे रातों
में इन..
कहां
जा रहे हो?
छूते हुए, ऊंचे वहां..
मंदिरों के शिखर तुम..।
आज यूं निर्घोष तुम..
स्पर्श देते, तृप्त करते,
आज यूं निर्घोष तुम..
स्पर्श देते, तृप्त करते,
भूमि मेरी
हृदय मेरा, तन मेरा
यह मन मेरा
यह वसन मेरा भिगोते हो,
स्मित हंसी की नमी से
इन फुहारों से इस.. इस तरह
विह्वल हूँ मैं तुम्हे देख कर
लगते मुझे अपने हो तुम..
प्रिय जलद! आज क्यों निर्घोष तुम।
कितने हैं रथ कैसे गिनूं..
स्तरों में, कितने तुम
क्षितिज के इस पार से
उस पार तक,
एक से फैले हुए एकसार तुम
तीन दिन से सतत ऐसे
आ रहे मेरी तरफ
हृदय मेरा, तन मेरा
यह मन मेरा
यह वसन मेरा भिगोते हो,
स्मित हंसी की नमी से
इन फुहारों से इस.. इस तरह
विह्वल हूँ मैं तुम्हे देख कर
लगते मुझे अपने हो तुम..
प्रिय जलद! आज क्यों निर्घोष तुम।
कितने हैं रथ कैसे गिनूं..
स्तरों में, कितने तुम
क्षितिज के इस पार से
उस पार तक,
एक से फैले हुए एकसार तुम
तीन दिन से सतत ऐसे
आ रहे मेरी तरफ
बरसते पूरब दिशा से,
पश्चिम कहां प्रिय जा रहे तुम।
टपकती ये बूँद टुप.. टुप..
और शीतल
पश्चिम कहां प्रिय जा रहे तुम।
टपकती ये बूँद टुप.. टुप..
और शीतल
लहरियां
फब्तियाँ कसती हुई,
ये साथ तेरे
मचलती प्रिय बदलियां!
आनंद घन तुम..
सत्य ही आनंद घन तुम।
उड़ रहा
यह महासागर,
इतनी बड़ी जलराशि का
इतने.. नीचे,
फब्तियाँ कसती हुई,
ये साथ तेरे
मचलती प्रिय बदलियां!
आनंद घन तुम..
सत्य ही आनंद घन तुम।
उड़ रहा
यह महासागर,
इतनी बड़ी जलराशि का
इतने.. नीचे,
इस तरह से लहरता
और मैं अंदर हूँ इसके,
और मैं अंदर हूँ इसके,
किस तरह,
सच जिस तरह हों मछलियां..!
शैवाल से ये वनस्पति
सच जिस तरह हों मछलियां..!
शैवाल से ये वनस्पति
ताजे हरे..
आज तो मुझको लगे,
जलीव हम हों हो गए, आने से तेरे
हे जलद ऐसे लगे..।
खुश है धरती,
आज तो मुझको लगे,
जलीव हम हों हो गए, आने से तेरे
हे जलद ऐसे लगे..।
खुश है धरती,
पेड़ पौधे धुल गए हैं,
जीवन मिला,
जीवन मिला,
हम जंतुओं को रस मिला है,
प्राण भी
प्राण भी
इन हवा संग हर्षित हुआ है।
तुम पुनः आना
तुम पुनः आना
प्रार्थना है,
हे जलद! कई बार आना
वर्ष में मेरे पास आना
ऐसे ही तुम मुझे भिगाना
और मेरी धरा को इस
हे जलद! कई बार आना
वर्ष में मेरे पास आना
ऐसे ही तुम मुझे भिगाना
और मेरी धरा को इस
तृप्ति देना आकंठ ऐसे..
अमृत पिलाना..
खिला देना, फूल सुंदर, वनों में
खिला देना, फूल सुंदर, वनों में
उपवनों में, मनों में,
मरु भूमि को भी रसल करना
प्राण मेरा, हृदय मेरा
तन मेरा और
मन मेरा
स्पंद दे दे फुहारों का जीवंत रखना।
हे जलद, निर्घोष! तुम
हवाओं के विमानों
प्राण मेरा, हृदय मेरा
तन मेरा और
मन मेरा
स्पंद दे दे फुहारों का जीवंत रखना।
हे जलद, निर्घोष! तुम
हवाओं के विमानों
पर
उड़ रहे रातों में इन..
कहां जा रहे हो?
छूते हुए, ऊंचे वहां..
उड़ रहे रातों में इन..
कहां जा रहे हो?
छूते हुए, ऊंचे वहां..
मंदिरों के, मस्जिदों के, एक से
स्पर्श देते शिखर तुम..।
जय प्रकाश मिश्र
मित्र, यह कविता मुझे पिछली कविता से बिल्कुल अलग धरातल पर मिलती है। यहाँ “जलद” केवल बादल नहीं हैं—वे जल के दाता, जीवन के वाहक और प्रकृति के अक्षय करुणा-रूप बन जाते हैं। कविता का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि अंततः कवि स्वयं को वर्षा से अलग नहीं रखता; वह कहता है—“जलीव हम सब हो गए”। यही इसकी आत्मा है।
सारांशिका
कवि रात के आकाश में उड़ते, मंदिरों के शिखरों को छूते हुए निर्घोष बादलों को देखता है और पूछता है—“कहां जा रहे हो?” वर्षा की फुहार जब धरती, शरीर, मन और हृदय को भिगोती है, तो बादल पराये नहीं, अपने लगने लगते हैं।
क्षितिज से क्षितिज तक फैले बादलों के रथ, टपकती बूँदें, शीतल हवाएँ और मचलती बदलियाँ मिलकर एक विराट “आनंद-घन” का रूप ले लेते हैं। फिर कवि को लगता है कि जैसे पूरा महासागर आकाश में उठकर उसके ऊपर बरस रहा हो और मनुष्य, वनस्पति, पशु-पक्षी—सब उसी जलराशि के भीतर जीवित मछलियों की तरह हैं।
वर्षा से धरती धुलती है, पेड़-पौधों को जीवन मिलता है, जीवों को रस और प्राणों को आनंद मिलता है। अंत में यह केवल वर्षा के लिए धन्यवाद नहीं रह जाता, बल्कि एक प्रार्थना बन जाता है—जलद बार-बार आओ, धरती को ही नहीं, हमारे मन और प्राण को भी जीवंत करते रहो।
और कविता वहीं लौटती है जहाँ से शुरू हुई थी—
“हे जलद, निर्घोष!”
इस प्रकार कविता एक वृत्त बनाती है—बादल को देखना → वर्षा में भीगना → स्वयं को प्रकृति का हिस्सा पाना → कृतज्ञ होना → फिर उसी बादल को पुकारना।
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सच्ची क्रिटिक
1. “जलद” का संबोधन बहुत सही बैठा है
आपने “बादल” कहकर उसे केवल दृश्य नहीं बनाया; “जलद” कहकर उसका कर्म सामने रखा—जो जल देता है।
और “निर्घोष” उसके दूसरे स्वभाव को पकड़ता है—वह मौन दाता भी है और गर्जनशील भी।
> हे जलद, निर्घोष! तुम
हवाओं के विमानों पर
उड़ रहे रातों में इन..
“हवाओं के विमानों” में कल्पना सुंदर है। बादल का आकाश में चलना सचमुच किसी विशाल विमान-समूह जैसा लगता है।
2. “कहां जा रहे हो?” कविता का मानवीकरण नहीं, आत्मीयता है
बार-बार—
> कहां जा रहे हो?
पूछना बालसुलभ लगता है, लेकिन यही इसकी खूबसूरती है। कवि बादल को मौसम की घटना नहीं मान रहा; वह उससे संवाद कर रहा है।
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3. दूसरा अंतरा कविता का सबसे आत्मीय हिस्सा है
> स्पर्श देते, तृप्त करते, भूमि मेरी
हृदय मेरा, तन मेरा
यह मन मेरा
यह वसन मेरा भिगोते हो...
यहाँ जल का क्रम बाहर से भीतर आता है—
भूमि → हृदय → तन → मन → वसन।
और फिर—
> लगते मुझे अपने हो तुम..
यही वह जगह है जहाँ बादल “प्रकृति” से “प्रिय” की सीमा छू लेते हैं।
यह भाव मुझे बहुत स्वाभाविक लगा।
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4. “तीन दिन से सतत” कविता को धरती देता है
यह अच्छा है कि आपने केवल कल्पना नहीं की, एक वास्तविक अनुभव भी रखा—
> तीन दिन से सतत ऐसे
आ रहे मेरी तरफ
पूरब दिशा से...
इससे कविता का विराट आकाश अचानक आपके सामने घट रही घटना बन जाता है।
हालाँकि—
> “पश्चिम कहां प्रिय जा रहे तुम।”
यहाँ “प्रिय” बहुत निजी संबोधन है। यदि आपका उद्देश्य बादल से आत्मीय संबंध बनाना है तो इसे रखें। मुझे लगता है यह कविता के भाव-संसार में स्वाभाविक है।
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5. “आनंद घन” बहुत सुंदर है
> आनंद घन तुम..
सत्य है आनंद घन तुम।
यहाँ “घन” का दोहरा अर्थ काम करता है—घना बादल और आनंद का घनत्व।
दूसरी पंक्ति में “सत्य है” कहना थोड़ा सीधा है, लेकिन उसी के कारण भाव में विश्वास आता है। यह कोई अलंकारिक प्रशंसा नहीं, कवि का अनुभूत सत्य है।
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6. कविता का सबसे बड़ा काव्यात्मक उछाल यहाँ है
> उड़ रहा
यह महासागर,
इतनी बड़ी जलराशि का...
यह बहुत अच्छा बिंब है।
सामान्यतः हम कहते हैं—“बादल समुद्र से जल लेकर आए हैं।”
आपने उलटा कर दिया—
समुद्र ही उड़कर हमारे ऊपर आ गया।
यही कविता की कल्पनाशक्ति है।
और फिर—
> सच जिस तरह हों मछलियां..
...
जलीव हम सब हो गए, तेरे आने से
यह विचार बहुत सुंदर है। मनुष्य धरती पर खड़ा प्रेक्षक नहीं रहा; वह जल के भीतर रहने वाला जीव बन गया।
“जलीव” शब्द यहाँ मुझे रोकता है—और यह अच्छी बात है। यदि आपका आशय “जल-जीव” से है तो संयुक्त रूप में “जलजीव” अधिक सहज होगा; लेकिन यदि आपने “जलीव” को ध्वन्यात्मक/काव्यात्मक प्रयोग के रूप में जानबूझकर रखा है, तो उसके पीछे का अर्थ कविता में स्पष्ट रूप से उभरना चाहिए। यह एक जगह है जहाँ मैं कवि से पुनर्विचार अवश्य कहूँगा।
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7. “फब्तियाँ कसती हुई” — यहाँ मेरी थोड़ी आपत्ति है
> शीतल लहरियां
फब्तियाँ कसती हुई,
साथ तेरे
मचलती ये बदलियां
“फब्ती कसना” सामान्यतः किसी पर चुटकी लेने या व्यंग्य करने का मुहावरा है। बादल और लहरियों के आनंदपूर्ण खेल में यह शब्द थोड़ा अलग रंग ले आता है।
यदि आपने जानबूझकर बादलों की चंचल छेड़छाड़ दिखाने के लिए रखा है, तो अर्थ बनता है। लेकिन पूरी कविता के कोमल, विस्मयपूर्ण और प्रार्थनामय स्वर में यह अकेला शब्द थोड़ा खुरदुरा लगता है।
यहाँ मैं इसे कविता की एकमात्र वास्तविक diction-risk मानता हूँ।
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8. अंतिम अंतरा कविता को केवल प्रकृति-कविता नहीं रहने देता
> जीवन मिला, हम जंतुओं को
रस मिला,
प्राण भी इन हवा संग हर्षित हुआ।
यहाँ जल केवल सुंदर नहीं है—जीवन का आधार है।
और फिर—
> ऐसे मुझे तुम भिगाना
और मेरी धरा को इस तृप्ति देना
खिला देना फूल सुंदर, वनों में
इन उपवनों में, मनों में
यहाँ “वनों” से “मनों” तक जाना बहुत सुंदर है।
वर्षा बाहर की धरती को ही नहीं, भीतर की धरती को भी खिलाती है।
मेरे विचार से यह कविता का सबसे गहरा अर्थ है।
---
जहाँ कविता थोड़ी ढीली पड़ती है
मित्र, सच्ची आलोचना में यह भी कहूँगा कि कविता कुछ जगह बहुत कुछ एक साथ कहने लगती है।
विशेषकर अंतिम हिस्से में—
> प्राण, हृदय, तन, मन, स्पंद, जीवंत...
इन भावों का मूल एक ही है। कुछ पुनरावृत्ति यहाँ आपकी शैली का हिस्सा है, पर दो-तीन स्थानों पर कविता यदि थोड़ा कम कहे तो वर्षा स्वयं अधिक बोल पाएगी।
लेकिन मैं इसे काटने की जल्दी नहीं करूँगा। आपकी कविता में पुनरावृत्ति अक्सर भाव की लहर बनती है, केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं।
और शुरुआत तथा अंत का लगभग समान होना बिल्कुल रहने देना चाहिए।
बादल वहीं हैं, पर अब कवि वही नहीं है। यही वृत्ताकार रचना का लाभ है।
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कविता का असली “मोती”
मेरे लिए इस पूरी कविता की सबसे बड़ी पंक्ति कोई एक पंक्ति नहीं, बल्कि यह अंतर्दृष्टि है:
जलद बाहर से धरती को भिगोता है, लेकिन भीतर से मनुष्य को प्रकृति का जलजीव बना देता है।
और जब आप कहते हैं—
> “इन उपवनों में, मनों में”
तब जल की यात्रा आकाश → धरती → वन → मन हो जाती है।
यही कविता का गहरा केंद्र है।
मित्रों को मोती
मित्रों को मोती
जल केवल धरती को नहीं भिगोता,
वह भीतर की सूखी भूमि को भी छूता है।
बादल जब बरसता है,
पेड़-पौधों में जीवन लौटता है,
धरती तृप्त होती है
और मन भी कहीं भीतर से हरा हो जाता है।
शायद इसीलिए
वर्षा को देखते हुए लगता है—
जलद आकाश से नहीं बरसते,
वे जीवन बनकर आते हैं।
और सच्चा आनंद तब है
जब फूल केवल वनों में नहीं,
मनों में भी खिलने लगें।मित्र, इस कविता में आपकी पिछली कविता के “बाज़ार” वाले आत्म-परीक्षण के विपरीत यहाँ स्वार्थ गलता है और अस्तित्व साझा हो जाता है। वहाँ प्रश्न था—“मैं कौन था?”; यहाँ उत्तर की एक झलक मिलती है—मैं अकेला नहीं, उसी जलचक्र का एक अंश हूँ।
मेरा उत्तर: जीवन में फब्तियों को जगह मिलनी चाहिए जो आपसे ताल मेल और निकटता देतीं हैं। यह बादलों के बीच उनकी निजता में प्रवेश है।
बिल्कुल मित्र। आपकी यह व्याख्या सुनकर “फब्तियाँ कसती हुई” पर मेरी पिछली आपत्ति वापस लेना उचित है।
मेरा उत्तर: जीवन में फब्तियों को जगह मिलनी चाहिए जो आपसे ताल मेल और निकटता देतीं हैं। यह बादलों के बीच उनकी निजता में प्रवेश है।
बिल्कुल मित्र। आपकी यह व्याख्या सुनकर “फब्तियाँ कसती हुई” पर मेरी पिछली आपत्ति वापस लेना उचित है।
यहाँ “फब्ती” व्यंग्य नहीं, छेड़छाड़ की आत्मीयता है—वह निकटता जहाँ दो अपने लोग औपचारिक भाषा छोड़कर एक-दूसरे से खेलते हैं। बादल, लहरियाँ और बदलियाँ आपके लिए केवल प्रकृति के घटक नहीं रहे; आपने उनकी निजता में प्रवेश किया है।
और यही पंक्तियाँ—
> शीतल लहरियां
फब्तियाँ कसती हुई,
साथ तेरे
मचलती ये बदलियां
बादलों को दूर से देखने वाले मनुष्य की दृष्टि नहीं है। यह जैसे कवि स्वयं उस दृश्य के भीतर खड़ा है, और बादलों की अपनी मस्ती सुन रहा है।
मुझे अब इसमें एक और सुंदर बात दिखती है—“फब्तियाँ” के कारण बादल निर्जीव दृश्य नहीं रहते, उनमें व्यक्तित्व और संबंध पैदा होता है। “मचलती” उसके बाद इस निजता को और पुष्ट करता है।
और आपकी बात—“जीवन में फब्तियों को जगह मिलनी चाहिए”—कविता के बाहर भी एक सुंदर जीवन-दर्शन है। जहाँ केवल गंभीरता हो, वहाँ संबंध सूख सकते हैं; थोड़ी छेड़, थोड़ी हँसी, थोड़ी बेबाकी ही निकटता को जीवित रखती है।
इसलिए इस कविता में मैं “फब्तियाँ” को अब काटने योग्य शब्द नहीं, बल्कि निजता खोलने वाली चाबी मानूँगा।
जय प्रकाश संग जीपीटी (AI)
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