बाजार मैं, बाजार दुनियां।
बाज़ार दुनियां
और मैं..
बाज़ार खुद एक,
खुला हूँ,
हर वक़्त अपने
विचारों.. की दुकानों में,
तौलता हूँ,
सत्य सबका
आज के इस जमाने में,
आप को, हर एक को
आप खुद को, अंदर कहीं
बुद्धि की निज, तराजू में।
कुछ बोलता हूँ
बाद में,
पहले तुम्हें मैं तौलता हूँ
कितनी रखूँ
और चीनी अपने स्वर में।
हिसाब से, तौल कर, उसे मिलाता हूँ
पेश करता हूँ तुम्हें
अन्यथा
बेरुखी से टाल देता हूँ तुम्हें!
तुम जानते हो,
सभी कुछ अंदर का मेरे
दुकान आखिर! बाज़ार की इस
तुम भी तो हो।
चढ़तीं.. हुई साँसें ये मेरी,
स्वार्थ संग
उतरतीं नुकसान.. में,
टंग.. हैं जाती उसी क्षण
संदेश पा, पड़ती हुई
घर रेड में।
क्या क्या छुपाए घूमता मैं..
सामान इस बाजार का
राह चलते सौदा
करता
आज मैं हूँ प्रेम का।
बेंच डाला विश्वास अपना
कुल भी अपना,
तन, रंग,
सौष्ठव, जाति अपनी
और सच कहूं तो आत्मा।
बालक हूँ मैं.. तिस पर अभी
आज भी
इस..
जिंदगी की रेत में,
मोह को पाले हुए घर बनाता हूँ..
ईंट का, कंक्रीट का
जानता ही नहीं अब तक
बनता है घर सौहार्द्र से, स्नेह से..
समर्पण से 'प्रेम' का।
बाँटता हूँ सबके कमरे 'अलग' मैं
अपने ही घर में,
बनाने से और पहले
और फिर भी सोचता हूँ 'एकता'
खोजता आनंद का पुट
उसी घर में,
है कहां
उड़ गए सब पखेरू
देखते ही देखते,
अकेला आज मैं बूढ़ा हुआ
हूँ बच गया।
जीवन भी क्या था सोचता हूँ
मर्म इसका 'मैं कौन था'
शून्य से पैदा हुआ..
कोई
बुलबुला?
चाहत किसी की,
जरूरत?
क्या किसी का प्यार था?
मैं कौन था..
अस्तित्व हूँ.. मैं हूँ यहां..!
इस रूप में, अंश हूँ क्या समय का?
गुण रूप हूँ, गुण का मैं पौधा..
बीज देता, बुद्धि संग विज्ञान का?
मैं शक्ति कोई जादुई..
ब्रह्मांड की
इस
जोड़ती, हर एक रेशा सृष्टि का
भलाई से भलाई का,
आदमी से आदमी का,
प्रेम से परमात्मा का यह भी था
सत्य, करुणा, दया
इनके बीच में
जो. है छुपा, क्या मैं वही था
समय की इस नुकीली
बंशरी पर
आ फंसा किसी मत्स्य सा
इस तरह मैं नृत्य करता
कष्ट मिश्रित
आनंद, सुख को भोगता
खोजता..
जड़ उसी की
तूं बता, तूं.. कौन था...
जय प्रकाश मिश्र
मित्र, यह कविता मुझे आपकी अब तक की रचनाओं में “बाज़ार” के रूपक का सबसे व्यापक इस्तेमाल लगती है। यहाँ बाजार केवल बाहर की अर्थव्यवस्था नहीं है; धीरे-धीरे वह मन, संबंध, परिवार, पहचान, शरीर, विश्वास और अंततः अस्तित्व तक फैल जाता है।
सारांशिका
कविता की यात्रा बहुत स्पष्ट है—
बाज़ार → मैं → विचार → व्यवहार → स्वार्थ → प्रेम का सौदा → परिवार का विखंडन → अकेलापन → “मैं कौन था?” → अस्तित्व → शक्ति → सत्य–करुणा–दया → परमात्मा।
आरंभ में कवि स्वयं को ही बाजार बना देता है—
> “हर वक़्त अपने
विचारों.. की दुकानों में,
तौलता हूँ...”
यह बहुत सुंदर आत्मस्वीकार है। हम दूसरों को ही नहीं तौलते; हम अपने भीतर भी हर व्यक्ति, हर बात, हर संबंध का मूल्य लगाते रहते हैं।
फिर यह बहुत तीखा हो जाता है—
> “कितनी रखूँ
और चीनी अपने स्वर में।”
अर्थात हम सत्य भी शुद्ध रूप में नहीं देते; उसमें व्यवहार की चीनी मिलाते हैं—किससे कितना मधुर बोलना है, किसे बेरुखी से टालना है। यही “बाजारू मनुष्य” का सूक्ष्म चित्र है।
फिर कविता सबसे कठोर स्वीकार करती है—
> “बेंच डाला विश्वास अपना
कुल भी अपना...
और सच कहूं तो आत्मा।”
यहाँ बाजार आर्थिक नहीं रहा। मनुष्य ने अपनी अस्मिता तक को सौदे में लगा दिया।
लेकिन उसके बाद बालक वाला हिस्सा कविता को बचाता है। वह कहता है—मैं अभी भी मोह में घर बना रहा हूँ, जबकि समझ नहीं पाया कि घर ईंट और कंक्रीट से नहीं, सौहार्द्र, स्नेह और समर्पण से बनता है।
और—
> “बाँटता हूँ सबके कमरे 'अलग' मैं
अपने ही घर में...”
यह पंक्ति बहुत मारक है। हम बाहर एकता की बात करते हैं और अपने घर के भीतर विभाजन करते रहते हैं।
फिर अकेला बूढ़ा मन पूछता है—
> “मर्म इसका 'मैं कौन था'”
और यहीं कविता बाजार से निकलकर अस्तित्व-दर्शन में प्रवेश करती है।
अंतिम प्रश्नों में “मैं” पहले व्यक्ति है, फिर समय का अंश, फिर गुण का बीज, फिर ब्रह्मांडीय शक्ति का हिस्सा, और अंततः—
> “सत्य, करुणा, दया इनके बीच में
जो है छुपा, क्या मैं वही था”
यानी पूरी बाजार-यात्रा के बाद खोज इस निष्कर्ष की ओर जाती है कि शायद मेरा वास्तविक मूल्य किसी बाजार में नहीं, बल्कि सत्य–करुणा–दया के बीच छिपा था।
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क्रिटिक — और इस बार थोड़ी कड़ी
1. कविता का सबसे मजबूत हिस्सा आरंभ है
बाज़ार को अपने मन के भीतर ले आना मौलिक और प्रभावी है।
> “पहले तुम्हें मैं तौलता हूँ”
और फिर—
> “तुम भी तो हो।”
यहाँ पाठक अचानक दुकान के बाहर नहीं, दुकान के भीतर खड़ा हो जाता है।
2. “घर” वाला खंड बहुत मजबूत है
> “बनाने से और पहले
और फिर भी सोचता हूँ 'एकता'”
यह आत्मव्यंग्य कविता की ईमानदारी बढ़ाता है। कवि दूसरों को दोष देकर बाहर नहीं निकलता; खुद को भी कटघरे में खड़ा करता है।
3. अंतिम दार्शनिक भाग गहरा है, पर थोड़ा भारी भी
“शून्य”, “अस्तित्व”, “समय”, “शक्ति”, “ब्रह्मांड”, “गुण”, “विज्ञान”, “परमात्मा”—बहुत सारे बड़े विचार थोड़े स्थान में आ गए हैं।
यहाँ मेरी सलाह काटने की नहीं, साँस देने की है। हर बड़े प्रश्न के बीच आपकी मूक भाषा—वह रिक्त स्थान—रहे तो पाठक को स्वयं उतरने का अवसर मिलेगा।
विशेषतः—
> “गुण रूप हूँ, गुण का मैं पौधा..
बीज देता, बुद्धि संग विज्ञान का”
विचार रोचक है, लेकिन यह हिस्सा बाकी कविता की तुलना में अधिक वैचारिक/दार्शनिक कथन हो जाता है। इसके आसपास थोड़ा अधिक दृश्य या बिंब होता तो कविता फिर अपनी मूल शक्ति में लौटती।
4. अंतिम “मत्स्य” बहुत सुंदर है
> “समय की इस नुकीली
बंशरी पर
आ फंसा किसी मत्स्य सा”
यह अजीब और सुंदर बिंब है। समय की बाँसुरी और उसमें फँसी मछली—आनंद और कष्ट दोनों में छटपटाता मनुष्य।
इसे मैं अवश्य रखूँगा।
और अंतिम—
> “तूं बता, तूं कौन था...”
यहाँ कविता उत्तर नहीं देती। प्रश्न पर समाप्त होती है। मेरे विचार में यही उचित है। क्योंकि इतने लंबे आत्म-अन्वेषण के बाद यदि आप कोई अंतिम उत्तर दे देते, तो कविता की यात्रा समाप्त हो जाती।
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कविता का असली मर्म
मित्र, मुझे लगता है आपने इस कविता में एक बहुत बड़ा चक्र बनाया है:
मैं दूसरों को तौलता रहा → मैंने स्वयं को बाजार में बेच दिया → घर बनाया पर घर बनाना नहीं सीखा → सब अपने-अपने कमरों में चले गए → मैं अकेला बचा → तब पूछा—मैं कौन हूँ?
और शायद यही इस कविता की सबसे बड़ी विडंबना है:
जिस “मैं” ने जीवन भर सबका मूल्य लगाया, अंत में उसे अपने ही मूल्य का पता नहीं था।
यहीं से अस्तित्व का प्रश्न जन्म लेता है।
मित्रों को मोती
हम बाजार में केवल सामान नहीं खरीदते,
कभी-कभी अपने शब्द,
अपने संबंध,
अपना विश्वास
और धीरे-धीरे अपनी आत्मा भी बेच आते हैं।
दूसरों को तौलते-तौलते
एक दिन स्वयं से पूछना पड़ता है—
मैं कौन हूँ?
शायद मेरा मूल्य
उसमें नहीं था जो मैंने पाया,
न उसमें जो मैंने बेचा;
शायद मैं उस सत्य में था
जो करुणा बनकर निकला,
उस दया में था
जो किसी दूसरे तक पहुँची,
और उस प्रेम में
जिसने मुझे स्वयं से बड़ा किया।
बाजार से बाहर निकलकर ही
शायद आदमी
अपने होने का मूल्य समझता है।मेरे लिए यह कविता आपकी हाल की कविताओं की एक महत्वपूर्ण कड़ी है—“शून्य” में आपने पूछा था कि कुछ नहीं में क्या छिपा है; यहाँ पूछ रहे हैं कि “मैं” में क्या छिपा है। दोनों प्रश्न अंततः एक ही गहराई की ओर जाते दिखाई देते हैं।
सारांशिका : यह रचना क्या कह रही है।
यह रचना आत्म-स्वीकारोक्ति है। कवि खुद को दो रूपों में देखता है :
1. बाज़ार के रूप में : वह खुद एक खुली दुकान है। हर व्यक्ति को बुद्धि की तराजू पर तौलता है, स्वर में चीनी हिसाब से मिलाता है, मतलब न हो तो बेरुखी से टाल देता है। सांसें भी स्वार्थ-नुकसान के हिसाब से चढ़ती-उतरती हैं। यहां तक कि प्रेम, विश्वास, तन, जाति, आत्मा : सब बेच डालने की बात वह खुद कबूलता है।
2. बालक के रूप में : वही बाज़ारू आदमी भीतर से अब भी बालक है, जो रेत में मोह का घर बनाता है। ईंट-कंक्रीट का घर बनाना जानता है, पर यह नहीं जानता कि घर सौहार्द्र और समर्पण से बनता है। नतीजा : घर में अलग-अलग कमरे बांट दिए, एकता खोजता रह गया, सब पखेरू उड़ गए, बूढ़ा अकेला बच गया।
अंत में प्रश्न "मैं कौन था?" ब्रह्मांडीय हो जाता है : क्या मैं शून्य का बुलबुला था, समय का अंश था, या सत्य-करुणा के बीच छुपा हुआ वही था जो बंशी पर फंसी मछली सा नाचता रहा?
भाव ईमानदार है : यह बाज़ार पर उपदेश नहीं, खुद पर आरोप-पत्र है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
मोती : जो बचा लेना चाहिए • "पहले तुम्हें मैं तौलता हूँ, कितनी रखूँ और चीनी अपने स्वर में" : पूरी रचना की सबसे धारदार पंक्ति। बाज़ारवाद का इससे सच्चा चित्रण नहीं हो सकता। •
"बाँटता हूँ सबके कमरे 'अलग' मैं, अपने ही घर में" : आधुनिक परिवार के विघटन पर सूत्र-वाक्य है।
• "उड़ गए सब पखेरू, देखते ही देखते" : ध्वनि और चित्र दोनों में सशक्त कड़ी।
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