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खिलती हंसी फिसल पड़ती थी

आमंत्रण निजता तक था जो भी था, जैसा भी था, पर आमंत्रण निजता तक था। कौन बचेगा क्यों कर इनसे  आलिंगन सपनो सा था। (श्री राधाकृष्ण का स्वरूप आपको अपने में आत्मसात कर विस्मृत कर लेता है) हाय! निमंत्रण झर झर झरता,  नयन झुके जाते थे। पवन पकड़ जब डालें झुकता, फल टुपुक टुपुक गिर जाते थे। (श्री राधेकृष्ण विग्रह दर्शन से अपने भीतर प्रेम उपजाता है, अंतर में मिठास का पुट मिलता है ) अंगुलियां सुधि बुधि बन बुनती,  सपनों की सुंदर चादर। सुबह सबेरे चूं चूं करते उड़ते थे,  चिड़ियों के पर। (श्री श्यामा की सुंदर अंगुलियों में आनंद की अद्भुत अनुभूति मिलती है, और खुद को एक हल्कापन महसूस होता है) अरुणोदय की प्रथम किरण से स्वर्ण पुता जाता था, नन्ही कलियां विहंस मुरकतीं हृद-स्थल खुल जाता था, (प्रातः काल में किरणों से कली पुष्प बन खिलने लगती हैं, सूर्य किरणे मंदिरों को सुनहले रंग से रंग देती हैं) खिलती हंसी फिसल पड़ती थी, रस अधर मधुर टपकाते थे। स्वी..कृति मौन बनी प्रस्तुत थी,  हर अंग झुके जाते थे। (श्री राधे मुख सौंदर्य से मुस्कान छलक जाती थी होठों से अमृत टपकता है ) सलिल सरिस लय विलय उर्...

बाजार में काबलियत नहीं बिकती

बाजार में काबलियत नहीं बिकती  जो लोग जमीं पर, खुद ही, गिर पड़.. के, खड़े होते हैं। वे ही इस जमीं के होते.. हैं, खुद के पैरों से चल सकते हैं। पर वो लोग,  जो बिना गिरे ही, पैरों जमीं छुए ही…, चाहते है चलना,  चलना ही नहीं, भगना। पर, ये नहीं होगा! शुक्रे खुदा कहें या  ऊपर वाले की मर्जी, कहीं किसी भी बाजार में, काबलियत नहीं बिकती।  बाजार में अगर ये कहीं  बिकती भी होती, तो उन चमचमाते औंजारों  तक ही सीमित होती। काबिलियत हमेशा जेहनो-जेहन के साथ भद्रचलन से आती है, कोई एम एल सी का चुनाव नहीं, कहीं से भी बटोर ली जाती है। एक समय था की नेता लोगो की भलाई लिए बनता था। आज वो समय है, वो अपनी बुराई दबाने के लिए बनता है। लोक तंत्र में सिर गिने जाते हैं, कुछ समस्याएं तो थीं लेकिन,  राज्य सभा, विधान परिषद के लोग कुछ हट के चुने जाते थे, इन्हे वोट चतुर, सुजान, पढ़े लिखे लोग बड़े मनोयोग से करते थे। यह हृदय था लोकतंत्र का, सांसे जहां से वह लेता है, पर खेद है गिनती तंत्र का अंधेरा उसे भी निगल लेता है। जय प्रकाश

न चमक चाहिए, न भीड़, न उत्तेजना,

जो शिखर बन वह चमकता है, है दिख रहा, दूर.. से, आंखों को, आपको अपने भीतर तक...। वह पहले आप के जैसे.. ही लोगो के पैरों.. के  नीचे… था।  सच कहता हूं, सुनें.., वह जो हमें  दिखता है, राज मुकुट में भी.  सबसे… ऊपर, चमचमाता मुस्कुराता.. हीरा.., वह तो पहले पैरों की  जमीं के भी.. नीचे… था, उसे खोद कर.. ही निकाला गया, था जमीन से। इसलिए.. अपनी,  आज की  स्थिति से परेशान  मत हो, यह तो नियति  का नियम है, आप  सब्र रखें, बस  परिश्रम करें। ध्यान रहे  हाथों से, टटोलने वाले को, आंखों की जरूरत नहीं होती। आप आंखों के लिए चमकदार नहीं है कोई बात नहीं,अनुभवी हाथों के लिए  दानेदार तो हैं। भरोसा रखें, पहले खुदपर  फिर अपने ऊपर वाले पर,  सब ठीक होगा। हीरा, हीरा ही  रहेगा, जहां  भी रहे।  लोगों के बीच,  लोगों से दूर, बीहड़ों में  नीचे जमीं में, अंधकार में, प्रकाश में। क्योंकि उसे कुछ चाहिए नहीं  लौटा देता है, वह सबकुछ जो कुछ भी हम उस पर डालते है। उसे खुद के लिए  न चमक  चाहिए, न भीड़,  न उत्तेजना, क्य...

आनंद चूंअन लागा पवन के झकोरों से।

 वरद वर्षा नव तरु पल्लव सम डोलत मन संग संग, बरसत जब वारि बृंद  भीजत सब अंग अंग। चमकन नभ बिजुरी  चम चम चम लागी जब, डरपट हिय साथ लिए  फिरती हत भागी मैं। वर्षा जल टपटप टप चुअन लागी पातिन पर, उमग उमग उर खोलत पवन चंचल डालिन तर। कसमसाति हिलति डारि  झूमति समीर संग, झोंके हैं उघाड़ देत  डलियन के सुघड़ अंग। रस है बहन लागा भी…ग गया, अंतर-तर  बरखा पटाति नाहीं छमछमाति तरुअन पर। वरषत जल मधु समान, धवल हुईं पतियां सब  मन में उदासी भरी जाऊं केहि रहियाँ अब। नृत्य करत सारे तरु  ले ले मृदंग ढोलि  गूंजति शहनाई सी बरखा अबोलि बोलि। वारि झरत अमृत सम पल्लवन के कोनों से आनंद चूंअन लागा  पवन के झकोरों से। श्याम जू छिपन लागे बादलों के कोनों में राधा बन बूंद बरसीं भक्तन की गलियन में।            जय प्रकाश

एक कील थी चुभती हृदय में,

एक कील थी चुभती हृदय में, वह अकेला सोचता था,  कुछ करे, अस्तित्व पाए। धूल… जीवन न बने…,  फूल बनकर महक जाए। (एक आम सन्यासी भी बचपन से कुछ अलग होता है) सूरज ये कहता नित्य उससे जीवन क्षणों में जा.. रहा है, जो भी, है करना कर.. उसे  तूं इतना क्यों घबड़ा रहा है।  (नेचर ऐसे लोगो से सीधे वार्ता करती रहती है, मनोबल भी बढ़ाती है) बोलता… कुछ भी नही था,  सोचता…. दिनभर यही था, चलित, विचलित,हो रहा था आत्म-मंथन… कर रहा था। (गृह त्याग के पूर्व बाल सन्यासी के मन मस्तिष्क में कश्मकश चलती रहती है) कठिन था,  उस नेह को अवसान देना,  जन्म.. से, जो बांध. रखे, थे.. उसे। पर कहीं एक कील थी  चुभती हृदय में, तौलना संसार…,  जिस पर था उसे…। (घर बार को छोड़ना कठिन होता है, फिर भी संसार की बाल सन्यासी परमतृप्ति के तराजू पर तौलता है) समय ने करवट लिया,  आत्मनिर्णय.. हो गया,  बंधन सभी ढीले.. लगे,  संबंध सब गीले… लगे। (अंत में उसका विवेक जीतता है, सांसारिकता और उसका राग हार जाता है) एक निश्चय… हो गया,  मन मुठ्ठियों में बंध गया, एक धारा…. बह चली,  तट छोड...

गीतों से भर जाता था घर

गीतों से भर जाता था घर। दूर… बहुत, दूर…  मे…रा, भी…, एक  घर है कहीं। ऐ दोस्त! ये, रू…ह, आज भी  अकेले में  भटकती है वहीं। (अपने बचपन का गांव और घर जो काम धंधे में छूट गए सभी को प्रियतर होते हैं) आगाज़े जिंदगी,  मुहब्बते तरन्नुम  बसती थी वहां। लोग, वो लोग,  जो वहां थे, गर अब नहीं, तो मानो अब इस  जमीं पर हि नहीं। (हम सभी ने वहां जिंदगी का फलसफा सीखा, वहां सच्चा प्रेम बसता था। ईमान के पक्के, सच्चे लोग थे, गर गांव वासी बदला तो अच्छे लोग मानो दुनियां में नहीं रहे) उनके लिए  अपनी थी, आबरू-ए-इज्जत ‘सबकी’। अब तो बस, कुछ यादें ही  बची हैं तब की। (सब मिलजुल कर रहते थे, उनकी रहन अच्छी थी विस्मृत नहीं होती) घर तो अनेक थे,  पर एक थे, सुख दुख उनके। चाचा, काका, दादा, भैया कहते ही पिघलते उठते थे दिल उनके। (समरसता का समय था, करुणाशील लोग थे) मेहमान, किसी का भी हो वो सबका था। खेत खलिहान किसी का भी हो वो सबका था। (एक परिवार हो लोग रहते थे) मां बूढ़ी हो किसी की, किसी के बच्चे हों असहाय,  बैल बूढ़ा हो किसी का या किसी का पैर टूट जाय, ये विषय सबके थे,...

मेरे तो पंख घायल हैं।

मेरे तो पंख घायल हैं ऐ रस जरा धीमा बरस कोई भीग जाता है,  तेरे आंचल के रंगो-आब पर   कोई रीझ जाता है। कहूं क्या बात उनकी झर रहा  मधुमास अंग अंग से, वो हिलते हैं तो गिरतीं है नजर नापाक अंग अंग पे। नयन खुद ही परेशां हैं रुके तो किस पे वो ठहरे जो पत्थर पर भी वो ठहरे तो पत्थर सुर्ख होता है। छुओ मत पांव मेरा तुम नहीं मैं सख्स वो हूं अब उडा था जो कभी आकाश मेरे तो पंख घायल हैं।   क्रमशः आगे कल पढ़ें