इतना बड़ा त्यौहार किसका?
इतना बड़ा त्यौहार किसका?
चमचम चमकता,
रौनक.. भरा
स्वर्ण
हो
फैला पड़ा
इतनी बड़ी इस भूमि ऊपर
जलते हुए दीपों का रेला।
महल सी अट्टालिका की मुंडेरों पर
दीपती, द्युति लहर सुंदर
लाइनों से देखकर
वह, सोचती है,
तेल होता,
स्नेह
सा
इनमें भरा
तो पास की ये.. झुग्गियां
सूनी न रहतीं, सोई हुई
आज प्रिय, कुछ इस तरह?
किसी का त्यौहार है यह
किसी का मौका
है यह,
कमा ले वह
लग गया है भोर से,
होती सुबह..
धूम है, खुशी है, उत्साह है
सभी भीतर
कोई मना ले, कोई कमा ले
क्या यही,: कम है..
त्योहार है कितना बड़ा,
उत्साह सब में है भरा, आकंठ तक।
सब बिकेंगे आज देखो..
किस तरह
सड़कों
के
ऊपर
मिट्टी बिकेगी दीप बन कर
रंगपुत गई तो देव क्या
श्रीगनेश बन कर
घी तेल सारे स्नेह बन कर
निरस रूई सत्व
रूपी
बातियों का रूप लेकर..
सत्व, रज, तम सब बिकेंगे
एक ही दूकान पर
त्योहार है,
दीपालिका का कैसा सुंदर।
असत्य हारे, सत्य जीते
अन्याय हारे, न्याय जीते
मनुष्यता जीवित रहे..
बल लगे सत्कर्म में,
अंधा न होकर नाच नाचे आंगनो में..
और क्या दीवाली है ये..
यही तो त्योहार है ये..।
आप सभी मित्रों को शुभ दीपावली और इस महापर्व की शुभकामनाएं।
जय प्रकाश मिश्र
आइए, इस कविता को एक सुगठित रूप में समझें —
भाव-सारांश सारणी
1. दीपों का रेला (विस्मय और वैभव) पूरी भूमि पर फैला स्वर्ण-सा उजाला, जलते दीपों की रेल — त्योहार कितना बड़ा है!
2. महल और झुग्गी (करुणा और प्रश्न) महल की मुंडेरों पर दीपों की लहर देखकर मन पूछता है — अगर इनमें तेल की जगह स्नेह भरा होता, तो पास की झुग्गियाँ सूनी-सोई न रहतीं।
3. मनाना और कमाना (यथार्थ और स्वीकार)
किसी का त्योहार है, किसी का मौका है। कोई भोर से मना रहा है, कोई भोर से कमा रहा है। दोनों में ही धूम, खुशी, उत्साह आकंठ भरा है।
4. बाजार का रूपक (दर्शन और रूपांतरण)
आज सब बिकेगा — मिट्टी दीप बनकर, रंग श्रीगणेश बनकर, घी-तेल स्नेह बनकर, नीरस रुई बाती बनकर। एक ही दुकान पर सत्व, रज, तम सब बिकेंगे।
5. अंतिम प्रार्थना (संकल्प और शुभकामना)
असत्य हारे, सत्य जीते। अन्याय हारे, न्याय जीते। मनुष्यता जीवित रहे। बल सत्कर्म में लगे। यही सच्ची दीवाली है।
कविता का केंद्रीय भाव: दीवाली केवल दीपों की नहीं, दीपों के अर्थ की है — जहाँ उजाला सिर्फ महलों में नहीं, मन में भी फैले।

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