दिवाली.. आने.. को है,

दिवाली.. 
आने.. को है, 
प्रकाश का यह पर्व है,
चमचम है बाहर, सड़क पर
आकंठ फैली दुकानें 
सड़क के सीने
पे चढ़कर
लग
चुकी हैं, 
जमघट लगा है,आमजन का, 
चलना है मुश्किल! 
सड़क पर, 
त्योहार 
है.. 
चहल है, 
हलचल मची है, हर तरफ।

उम्मीद पाले लोग हैं, 
कुछ इन्हीं में, 
दूर से आए हुए,
बेचने और देखने 
ये शहर अपना,
और हमको.. आपको
बच्चे भी हैं,
कुछ नन्हे मुन्ने साथ उनके,
इसलिए एक प्रार्थना है, 
अंकुर हैं वे..
अनछुए हैं, 
निसर्ग 
ही.. हैं, ग्रामीण हैं
कच्चे दियों के साथ हैं, 
और कच्ची भावना मन में लिए हैं। 
आज देखा टिमटिमाते दीपकों से
दुकानों पर 
खिलौने ले मिट्टियों के
आस में, बैठे हुए हैं।

तहजीब की नगरी है अपनी पुरानी 
इस लखनऊ की लाज रखना,
शब्द कोई, काम कोई,
सभी मित्रों, एक
तुम ऐसा न
करना
दुःखी हों वे, 
तल्खियों से सभी बचना...।

यह छाप होगी, 
उनके हृदय पर प्रेम की
जब बड़े होंगे,
लखनऊ अच्छा शहर है,
दुवाएं वे हमें देंगे।
आ बनाएं मिल दिवाली 
और सुंदर.. 
इसबार अपने आचरण से।
प्रेम से व्यवहार से, और मोहब्बतों से।

जय प्रकाश मिश्र

इस कविता में दिवाली की रोशनी के बीच एक ऐसी जगह पर दृष्टि जाती है, जहाँ अक्सर हमारी आँखें ठहरती नहीं हैं—सड़क किनारे मिट्टी के खिलौने और कच्चे दीये लेकर बैठे वे ग्रामीण परिवार, उनकी उम्मीदें और उनके साथ आए नन्हे बच्चे। कविता का आग्रह केवल खरीदारी या दया का नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में मनुष्यता बचाए रखने का है।

इसकी सबसे सुंदर बात यह है कि आप लखनऊ की तहजीब को उसके इतिहास, इमारतों या भाषा से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के आचरण से परिभाषित करना चाहते हैं। यही इस कविता का केंद्रीय भाव है।

### सार-सागरिका

शीर्षक : इस बार दिवाली आचरण से

दिवाली निकट है। शहर रोशनी, सजावट और बाजार की चहल-पहल से भर उठा है। सड़कों पर भीड़ है, दुकानों का विस्तार है और हर ओर त्योहार की हलचल दिखाई देती है। इसी भीड़ में कुछ लोग दूर गाँवों से भी आए हैं—अपने मिट्टी के दीये, खिलौने और छोटी-छोटी उम्मीदें लेकर।

उनके साथ उनके नन्हे बच्चे भी हैं। वे बच्चे अभी संसार की तल्खियों और भेदभाव से अनजान हैं—कच्चे दीयों की तरह सरल, मिट्टी की तरह सहज और प्रकृति की तरह निष्कलुष। वे अपनी छोटी-सी दुकान के पास बैठे हैं, शायद किसी खिलौने के बिकने की आस में, शायद किसी ग्राहक की प्रतीक्षा में।

कवि की प्रार्थना है कि शहर के लोग उनके साथ ऐसा व्यवहार न करें जिससे उनके मन में दुःख या अपमान का बीज पड़े। लखनऊ अपनी तहजीब के लिए जाना जाता है; उसकी असली पहचान इसी में है कि वह अपने बीच आए साधारण और जरूरतमंद लोगों को कितना सम्मान देता है।

उन बच्चों के मन पर आज का व्यवहार एक छाप छोड़ेगा। वे बड़े होकर याद करेंगे कि लखनऊ ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया था। इसलिए इस बार दिवाली केवल दीप जलाकर नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव और मेल-जोल से मनाई जाए।

कविता का मूल संदेश: त्योहार की वास्तविक रोशनी दीयों से आगे बढ़कर हमारे व्यवहार में उतरनी चाहिए। किसी अनजान के मन में सम्मान और अपनापन जगा सकें, तो वही दिवाली का सच्चा प्रकाश है।

### 💎 मित्रों को मोती

### 🪔 मित्रों को मोती
**इस दिवाली, किसी के मन में अँधेरा न छोड़ें**

दिवाली पर हम अपने घरों को सजाते हैं, दीप जलाते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं और अपनों के साथ खुशियाँ मनाते हैं। लेकिन त्योहार की एक रोशनी ऐसी भी है, जिसे जलाने के लिए न तेल चाहिए, न बाती—वह है हमारा व्यवहार।

हमारे आसपास कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दूर-दराज के गाँवों से अपनी छोटी-सी पूँजी, मिट्टी के दीये, खिलौने और ढेर सारी उम्मीदें लेकर शहर आते हैं। उनके साथ बच्चे भी होते हैं। वे हमारी तरह ही खुशियाँ चाहते हैं, सम्मान चाहते हैं और अपने श्रम का उचित मूल्य चाहते हैं।

हम उनसे सामान खरीदें या न खरीदें, यह हमारी स्वतंत्रता है; लेकिन उनसे बात करते समय सम्मान और विनम्रता बनाए रखना हमारा दायित्व है। किसी की गरीबी उसका अपमान करने का अधिकार नहीं देती।

एक छोटी-सी साहित्यिक टिप्पणी भी रखूँगा। कविता में “कच्चे दीयों” और “कच्ची भावना” का प्रयोग बहुत अर्थपूर्ण है। एक ओर मिट्टी के दीये हैं, दूसरी ओर बच्चों के मन—दोनों अभी आकार ले रहे हैं। इसी तरह अंतिम पंक्तियों में कविता उपदेश नहीं देती, बल्कि सबको साथ आने का निमंत्रण देती है।

एक स्थान पर “सड़क के सीने पे चढ़कर” बाजार के अतिक्रमण और भीड़ का तीखा दृश्य बनाता है। यह दृश्य कविता को जमीन देता है। और “लखनऊ की लाज रखना”—यहाँ पूरी कविता एक नागरिक प्रार्थना में बदल जाती है।

मेरे विचार में इस कविता का सबसे गहरा संदेश यही है: हमारी तहजीब का इम्तिहान तब नहीं होता जब हम अपने बराबर वालों से मिलते हैं; वह तब होता है जब हमारे सामने कोई ऐसा हो, जिससे हमें कुछ लेना-देना भी न हो।








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