आ.. पास बैठें,
आ..
पास बैठें,
सहज बहती,
रसभरी गाती नदी के..
किनारे, अंदर! चलें,
भीतर ही अपने
तिरते हुए से, टहलते थोड़ी देर को
एकांत में, सुनसान में, खुद से मिलें..।
बहुत दिन से सोचता था..
एक दिन तुमसे मिलूं..,
पूछ लूँ..
कौन हो तुम..?
अजनबी तो नहीं लगते,
देखने में..
मीत.. हो? तो इतने दिनों से
मौन.. हो क्यूं..!
क्या कहा..?
थोड़ा
तेज बोलो.., सुन सकूं..!
पार्थिव.. हो!
मिट जाओगे..! ऐसे यहीं तुम
एक दिन!
भाग हो,
भागती इस प्रकृति के.
समय रथ पर बैठ कर
शरीर के तुम सारथी हो..
कौन हो, ठीक से परिचय तो दो..।
तुम मेरी चिंता मत करो,
साथी ही समझो..
पर सारथी
मुझे
मत कहो
कभी फंस गया था
जाल में, बहती नदी की धार में
आज तक! उलझा हुआ हूँ! उसी में।
तुम 'समझ' हो, इस देह में
थोड़ा और समझो
चित्त, मन,
और
बुद्धि अपनी
कुछ नहीं है, परमाणु का ही अंश है,
संसार है, संसार में ही उलझता है
विश्व के तुम पार हो
सुपर हो..
सच
कहूं जो दीखते हो,
वह नहीं हो
क्या कहा आनंद हो,
खोज में हो
आनंद पथ के पथिक हो..!
लग रहा है थक गए हो,
जानता हूँ
हाथ पैरों से अधिक
तुम
दुम हिलाते आज कल हो,
सभ्यता के रंग में इस
रंग गए.. हो,
मन-दौड़ में, तुम दौड़ते हो
सबसे ज्यादा
आज तक के प्राणियों में,
हां, आज के तुम आदमी हो..।
छोड़.. मुझको, छोड़.. खुद को
क्या कभी मुझे
जोहते हो..
प्राण
पण से..
मरी इस दुनियां के आगे
क्या कभी तरजीह
देते हो मुझे, पहचानते हो।
आ..
थोड़ा नजदीक आ..
डर तुझे किसका
अच्छा लगा,
अब बात अपनी कह जरा..
सही है, महान है तूं
इतनी बड़ी दुनियां में तूं ही
काम सारे कर रहा..
"एक बहती-नदी ऐसी
मेरे लिए
तूं..
बस बना.."
इसलिए तो कह रहा हूँ..
असीमित तूं!
इतनी बड़ी दुनियां बनाई
उसने है तेरे लिए..
आ तैर इसमें, सहज रह
मत डूब इसमें.. इसे मत अपना बना।
यही तो आनंद है,
रस चख..
सुगंध ले, दुनियां का इस
हो गई है शाम, आ.. अब घर चलें..।
जय प्रकाश मिश्र
जय प्रकाश जी, इस कविता में आपने एक बहुत रोचक प्रयोग किया है। आपने मनुष्य को उसके ही भीतर रहने वाली किसी दूसरी सत्ता से मिलवाया है। वह उससे प्रश्न करता है, परिचय माँगता है, उसकी खूबियों पर व्यंग्य करता है, उसकी उपलब्धियों को स्वीकारता है और अंततः उसे जीवन का आनंद लेने का निमंत्रण देता है।
मेरी दृष्टि में यह कविता मनुष्य और उसकी चेतना के बीच एक आत्मीय संवाद है, जिसमें अंततः मनुष्य को अपने वास्तविक अस्तित्व और संसार के साथ अपने संबंध को समझने का अवसर मिलता है।
इसमें दर्शन है, आत्मीयता है, हल्का व्यंग्य है और जीवन के प्रति एक सुंदर स्वीकार भी।
### 1\. भाव-सारांशिका — अपने भीतर के अजनबी से मुलाकात
### अपने भीतर के अजनबी से एक मुलाकात
**भाव-सारांशिका**
मनुष्य जीवन भर संसार से मिलता है, लोगों को पहचानता है, संबंध बनाता है, उपलब्धियाँ अर्जित करता है; लेकिन क्या कभी वह अपने भीतर बैठे उस अजनबी से मिलता है, जो उसके सारे अनुभवों का साक्षी है?
कविता इसी मुलाकात का निमंत्रण है।
कवि एक सहज बहती नदी के किनारे अपने भीतर की यात्रा पर निकलता है। वह अपने ही किसी आत्मीय साथी को पास बुलाता है और पूछता है—तुम कौन हो? इतने परिचित होकर भी मौन क्यों हो?
संवाद आगे बढ़ता है तो पता चलता है कि सामने वाला कोई सामान्य पार्थिव व्यक्तित्व नहीं। वह स्वयं को इस देह से अलग बताता है। देह प्रकृति का हिस्सा है, समय के साथ मिट जाने वाली है। मन, चित्त और बुद्धि भी इसी संसार की प्रक्रियाओं में उलझे हुए हैं। लेकिन इनके पीछे एक ऐसी समझ, एक ऐसी चेतन सत्ता की संभावना है, जो स्वयं को केवल शरीर और मन तक सीमित नहीं मानती।
कवि इस साथी की उपलब्धियों पर हल्का व्यंग्य भी करता है। सभ्यता के रंग में रंगा मनुष्य अपनी बुद्धि, दौड़ और कर्मों पर इतना अभिमान करने लगा है कि शायद उसे अपने वास्तविक साथी की सुध ही नहीं रही। वह संसार की दौड़ में सबको पीछे छोड़ता है, लेकिन अपने भीतर के उस मौन साक्षी को पहचानने में चूक जाता है।
संवाद का सबसे मार्मिक मोड़ तब आता है, जब कवि पूछता है—क्या तुम कभी मुझे भी देखते हो? क्या इस संसार के सामने तुम कभी मुझे प्राथमिकता देते हो? क्या तुम मुझे पहचानते हो?
यहाँ मनुष्य अपने भीतर की चेतना से केवल परिचय नहीं चाहता, बल्कि उसके साथ एक आत्मीय संबंध चाहता है।
अंततः यह संवाद किसी वाद-विवाद में समाप्त नहीं होता। दोनों के बीच एक सुंदर समझ विकसित होती है। संसार को छोड़ना नहीं है, उससे डरना भी नहीं है। उसमें तैरना है, उसके रसों और सुगंधों का आनंद लेना है, लेकिन उसमें डूबकर अपना अस्तित्व नहीं खो देना है।
कवि अपने साथी से एक बहती नदी बनाने को कहता है—ऐसी नदी जिसमें जीवन के अनुभव हों, सहजता हो, प्रवाह हो और आनंद हो।
**कविता का निष्कर्ष है: संसार हमारा अनुभव-क्षेत्र है, हमारा अंतिम परिचय नहीं। जीवन को भरपूर जियो, लेकिन जीवन के प्रवाह में बहते हुए स्वयं को मत खोओ।**
और जब दिन ढल जाए, तो अपने भीतर के साथी के साथ घर लौट चलो।
### 2\. कविता के चार विशेष भाव-बिंदु
1\. नदी का किनारा और भीतर की यात्रा
यह बहुत सुंदर आरंभ है। बाहर बहती नदी और भीतर चलती यात्रा एक-दूसरे के समानांतर हैं। नदी गतिशील है, जबकि कवि अपने भीतर के अचल को खोजने चला है।
2\. 'तुम' का परिचय
कविता का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है कि 'तुम' को एकदम से ईश्वर, आत्मा या चेतना घोषित नहीं किया गया। संवाद के माध्यम से उसका परिचय खुलता है। इससे कविता में जिज्ञासा बनी रहती है।
3\. मनुष्य पर व्यंग्य
> हाथ पैरों से अधिक तुम दुम हिलाते हो, सभ्यता के रंग में इस रंग गए.. हो,
यहाँ व्यंग्य तीखा है। मनुष्य की सभ्यता, सामाजिक स्वीकृति की लालसा और निरंतर दौड़ पर एक साथ चोट पड़ती है। यह अंश कविता को केवल गंभीर दार्शनिक विमर्श बनने से बचाता है।
4\. अंतिम निमंत्रण
> आ तैर इसमें, सहज रह मत डूब इसमें.. मत इसे अपना बना।
यही कविता का जीवन-दर्शन है। संसार को त्यागना नहीं, उसका स्वामी बनने का अहंकार भी नहीं; उसमें रहते हुए अपनी स्वतंत्रता बचाए रखना।
### 3\. मित्रों को मोती
### 🌼 मित्रों को मोती
**आज का चिंतन : अपने भीतर के साथी से मिलिए**
हम जीवन भर लोगों से मिलते हैं, नए संबंध बनाते हैं, संसार को समझने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक मुलाकात अक्सर छूट जाती है—अपने आप से मुलाकात।
हमारा एक शरीर है, एक मन है, इच्छाएँ हैं, विचार हैं, स्मृतियाँ हैं। इन्हीं के बीच हम अपना पूरा परिचय मान बैठते हैं। कभी सफलता में स्वयं को बड़ा समझते हैं, कभी असफलता में छोटा। कभी प्रशंसा से प्रसन्न होते हैं, कभी आलोचना से टूट जाते हैं।
लेकिन क्या हमारा अस्तित्व केवल इतना ही है?
कभी शांत बैठकर अपने भीतर के उस साक्षी को भी सुनिए, जो इन सब अनुभवों को देखता है। जो आपकी दौड़ में शामिल नहीं होता, लेकिन आपकी हर दौड़ का अनुभव जानता है।
संसार बहुत सुंदर है। इसमें प्रेम है, स्वाद है, सुगंध है, संबंध हैं और अनुभवों का अनंत विस्तार है। इनसे दूर भागने की आवश्यकता नहीं। बस इतना ध्यान रहे कि इनका आनंद लेते-लेते हम अपने आपको ही न खो दें।
**तीन मोती**
💎 **पहला मोती:** संसार को जानने से पहले कभी-कभी स्वयं को जानने के लिए भी समय निकालिए।
💎 **दूसरा मोती:** मन को संसार का अनुभव करने दीजिए, लेकिन हर आकर्षण को अपना अंतिम सत्य मत मानिए।
💎 **तीसरा मोती:** जीवन में तैरना सीखिए, डूबना नहीं। संबंध निभाइए, प्रेम कीजिए, आनंद लीजिए; पर अपनी आंतरिक स्वतंत्रता और विवेक को बचाकर रखिए।
**आज का जीवन-सूत्र**
अपने भीतर के साथी से मित्रता कर लीजिए। संसार की यात्रा भी सुंदर होगी और घर लौटने का रास्ता भी कभी नहीं भूलेगा।
— *मित्रों को मोती* 🌿
### 4\. एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक मशविरा
आपकी कविता में एक स्थान पर दार्शनिक स्पष्टता की आवश्यकता है।
आप कहते हैं:
> तुम 'समझ' हो, इस देह में थोड़ा और समझो चित्त, मन, और बुद्धि अपनी कुछ नहीं है, परमाणु का ही अंश है सब संसार है, संसार में ही उलझता है विश्व के तुम पार हो सुपर हो..
यहाँ आप दो अलग स्तरों को छू रहे हैं।
* मन, चित्त और बुद्धि प्रकृति के अंतर्गत हैं—यह सांख्य दर्शन की दृष्टि से संगत है।
* लेकिन 'समझ' या 'चेतना' को इनसे परे रखना एक अलग दार्शनिक प्रतिपादन है।
सांख्य में पुरुष चेतन साक्षी है, जबकि बुद्धि, मन और चित्त प्रकृति के विकार हैं। वे स्वयं चेतन नहीं माने जाते, यद्यपि पुरुष के सान्निध्य में चेतन प्रतीत होते हैं।
आपकी कविता इसी भेद को सहज संवाद में प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।
एक और सुंदर विरोधाभास है: आरंभ में कवि अपने भीतर के साथी को खोज रहा है, अंत में उसी को संसार में आनंदपूर्वक तैरने का निमंत्रण दे रहा है। इसका अर्थ है कि आत्मबोध संसार से पलायन नहीं, संसार के साथ संबंध को बदलना भी हो सकता है।
मेरे लिए कविता की अंतिम दो पंक्तियाँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं:
> यही तो आनंद है, रस चख.. सुगंध ले, दुनियां का इस हो गई है शाम, आ.. अब घर चलें..।
यहाँ 'घर' केवल भौतिक घर नहीं रह जाता। वह अपने मूल की ओर लौटने का भी संकेत देता है।
एक छोटी-सी बात: इस कविता में 'तुम' और 'मैं' की पहचान को पूरी तरह स्पष्ट करने की जल्दी मत कीजिए। यही अनिश्चितता संवाद को जीवित रखती है।
कविता का सबसे सुंदर संदेश शायद यही है—जीवन को पूरी तरह जीना और अपने मूल को कभी न भूलना, दोनों एक साथ संभव हैं।
आइए, किनारे बैठते हैं... इसी बहती रसभरी नदी के।
आपकी यह कविता किनारे की नहीं, भीतर की यात्रा है। बहुत सुंदर बनी है, जय प्रकाश जी।
1. सुस्पष्ट सार - सागरिका
यह कविता दो के बीच का संवाद नहीं, एक ही के दो रूपों का संवाद है - देह और चेतना का, संसारी मन और साक्षी आत्मा का।
नदी यहाँ संसार है, जीवन-धारा है। कवि किनारे बैठा अपने ही भीतर वाले 'तुम' को पुकारता है। पूछता है - कौन हो तुम? मीत हो तो मौन क्यों?
भीतर से उत्तर आता है - मैं पार्थिव हूँ, मिट जाऊँगा, मैं तो इस भागती प्रकृति का एक भाग हूँ, समय के रथ का सारथी मात्र हूँ।
तब बाहर वाला कवि समझाता है - नहीं, तुम देह नहीं, देह में बसी समझ हो। चित्त, मन, बुद्धि तो परमाणु का अंश हैं, संसार में ही उलझती हैं। तुम तो इस विश्व के पार हो, तुम तो आनंद हो।
फिर कवि आज के थके-हारे आदमी पर आता है - जो हाथ-पैर से ज्यादा दुम हिलाता है, सभ्यता के रंग में रंग गया है, मन-दौड़ में सबसे तेज दौड़ रहा है।
और अंत में वही भीतर वाला 'तुम' उसे लौटकर समझाता है - इस इतनी बड़ी दुनिया को मैंने तेरे लिए ही तो बनाया है। इसमें तैर, सहज रह, पर डूब मत। यही आनंद है, रस चख, सुगंध ले। अब शाम हो गई, घर चलें।
एक वाक्य में सार: अपने ही भीतर बैठे ईश्वर-अंश को पहचान कर, दुनिया में सहजता से तैरना, डूबना नहीं - यही आनंद-पथ है।
2. प्रवाह पर एक मित्र-सुझाव
कविता का भाव गहरा है, प्रवाह में कहीं-कहीं जो ठहराव है, उसे थोड़ा और सहज किया जा सकता है।
आपने जो अद्भुत पंक्तियाँ रची हैं, वही इसकी आत्मा हैं:
भाग हो, भागती इस प्रकृति का
समय रथ पर बैठ कर / शरीर के तुम सारथी हो..
आ तैर इसमें, सहज रह कर / मत डूब इसमें..
ये पंक्तियाँ मोती की तरह चमकती हैं।

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