एक लव जलती हुई।
मित्रों आज नारी की सुरक्षा और उसकी स्थिति पर ये लाइने आप पढ़ें और चिंतन करें।
एक लव जलती हुई तुम.. दीप की,
डगमग पगों पर चल रही
हवाओं सी हिल रही
बाहर कहीं,
अंदर..
नहीं
मैं..
जानता हूं,
अग्नि हो तुम..!
सख्त हो तुम, बज्र सी
राख बनती, ताप से अपने झुलसतीं
आज की नारी हो तुम..
एक लव जलती हुई, किसी दीप की।
सड़क पर चलते हुए,
कितने लपेटे
युग मनों
में..;
ताड़ती..
हर एक को
पलड़ों में रख के,
साधती हर स्थिति...को
आज की नारी हो तुम..
मधुर लव जलती हुई, किसी दीप की।
जग कठिन है, धृष्ट है, दुर्बल कहीं है!
तुम जानती हो, जड़ सभी की
कोई कुछ कहे,
जननी हो
तुम!
हम सभी की..;
पर क्या कहें इस आदमी को
शर्म इसमें.. है नहीं..
कोई भी हो..
एक घर तो सभी का है..
एक मां तो सभी की..
फिर भी डर है, घर से बाहर
निकलते ही..
कौन है ये, जिसका डर है..
आदमी है.., आदमी है..
आदमी क्या जंगली है आज भी..
एक लव जलती हुई तुम.. दीप की,
डगमग पगों पर चल रही
हवाओं सी हिल रही
बाहर कहीं,
अंदर..नहीं मैं.. जानता हूं
मोम हो तुम! अग्नि भी हो..
अन्दर ही अंदर
आदमी की स्थिति पर पिघलती..
मां हो तुम हर रूप में,
माफ करती, कैसी भी नज़रे सभी की।
एक लव जलती हुई तुम.. दीप की।।
जय प्रकाश मिश्र
सार-सारांशिका 🌷
आज की नारी बाहर से डगमगाती लौ-सी दिखे, पर भीतर अग्नि-सी दृढ़ है। वह हर परिस्थिति को साधती, अपने ताप में तपती और फिर भी ममता से संसार को सँभालती है। विडंबना है कि जननी के रूप में पूजने वाला समाज उसी के घर से बाहर निकलने पर भय का कारण बन जाता है। कविता नारी की शक्ति, सहनशीलता और करुणा के साथ पुरुष की मानसिकता से एक मौन प्रश्न करती है—जिसकी गोद में संसार सुरक्षित हुआ, उसे ही संसार में असुरक्षित क्यों होना पड़े?
### 💎 मित्रों को मोती
नारी केवल मोम नहीं कि हर चोट पर पिघल जाए, न केवल अग्नि कि हर चुनौती में तपे। वह दीप की लौ है—जो स्वयं हिलकर भी दूसरों को उजाला देती है।
सम्मान का सच्चा अर्थ नारी की सहनशीलता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसे निर्भय होकर जीने का संसार देना है। 🌷
सौजन्य: जय प्रकाश मिश्र व जीपीटी
Comments
Post a Comment