उतर गहरे!
इतनी बड़ी इस राह ऊपर
जिंदगी की सड़क पर
चलता हुआ
तूं
और मैं..
जरूरी तो नहीं है,
नेक ही, हर आदमी
हमेशा, हर बार ही, हमको मिले..।
जो बिना देखे, रंग को
बदलते इस रूप को
बिन पड़े किसी
भरम में
सत्य परखे
परखने में सफल हो
हमे पास कर दे,
प्यार कर ले, जिंदगी में।
हर कोई तो इस तरह का
नहीं होगा,
इस जहां में जान लें
इसलिए
साहस बटोरें अपने में ही माद्दा..
जब कोई हमें ना कहे,
बिन गुने
असफलता उसकी है ये.. अपनी नहीं
हम न हिलें, अंदर कही से
विश्वास! अपने पर रखें
रास्ता जीत का कायम रखें
सद-रास्ते से न हटें।
टूटें नहीं
उसे माफ़ कर दें,
सामना इस नापसंदी का करें
विश्वास से, खुशी से, हिम्मत रखें।
अन्यथा टूट कर हमें क्या मिलेगा,
गांठ कोई, एक मन की
कंकरी एक सख्त सी,
भीतर कहीं
चुभती रहेगी, करकती
जिंदगी भर, जिंदगी में।
साथ में एक क्षोभ भी
पलता हुआ
भीतर कहीं
उस आदमी के लिए ही
रिसता हुआ, कोई घाव सा
नुकसान जो अपने लिए।
इस लिए यह जरूरी है, हम सभी को
सम्मान सबको दीजिए,
नीचे खड़े जो
आप के,
बेकार के, बेकाम के
लटके हुए.. पादान पे..
यह संस्कृति है, आप की..
इसे ध्यान दें
सब आदमी.. हैं
नीर ही हैं, बह रहे
उस एक ही बहती नदी के
एक ही बहती नदी के
कण सभी हैं एक से।
भस्म हो जाती है काया
रूप का इस क्या
करूंगा!
रंग बचता है कहां!
और मैं..? तूं..? कहां होगा!
सब महानद का भाग है,
जो यहीं है, सर्वदा से
शांत होकर
समय
जिसमें बह रहा..,
परिवर्तनों की आड़ में..
चहुंओर अपने, देख न
कौन है, जो मौन है?
सूक्ष्मता से, अंत करता उगाता है
विचारों को, भावना को,
प्रेम को
उतर गहरे!
संस्पर्श कर उस चरन को,
उसके लिए सब एक हैं कभी देख न!
अंदर उतर के सीढ़ियां
कदमों से अपने
करुणा भरे निज हृदय में।
जय प्रकाश मिश्र
इस कविता की भाव-यात्रा मुझे बहुत सुंदर लगती है। आरंभ मनुष्य के व्यवहार में मिलने वाली अस्वीकृति से होता है, फिर आत्मविश्वास, क्षमा और आत्मसम्मान का मार्ग खुलता है। इसके बाद कवि व्यक्तिगत पीड़ा से ऊपर उठकर सामाजिक संस्कृति और अंततः उस विराट एकत्व तक पहुँचता है, जहाँ रंग, रूप, पद और प्रतिष्ठा के भेद मिट जाते हैं। कविता का वास्तविक गंतव्य दूसरे को जीतना नहीं, अपने भीतर करुणा को जगा लेना है।
### 1\. भावात्मक सारांशिका
जीवन की लंबी राह पर चलते हुए हमें हर बार ऐसे लोग नहीं मिलेंगे, जो हमारे गुणों को पहचानें, हमारे सत्य को समझें और हमें स्वीकार करें। कोई हमें बिना परखे नकार देगा, कोई हमारे रूप-रंग या बाहरी आवरण से प्रभावित होगा, तो कोई हमारे वास्तविक व्यक्तित्व तक पहुँचने का प्रयास ही नहीं करेगा। ऐसे में आवश्यक है कि हम दूसरों की अस्वीकृति से अपना आत्मविश्वास न खोएँ और अपने सद्मार्ग से विचलित न हों।
किसी की नापसंदी के उत्तर में टूट जाना, मन में गाँठ बाँध लेना या क्षोभ पालना अंततः अपनी ही शांति को नष्ट करना है। इसलिए अस्वीकृति का सामना साहस से करें, अस्वीकार करने वाले को क्षमा करें और अपने भीतर किसी के प्रति स्थायी कटुता न पनपने दें।
लेकिन कविता यहीं नहीं रुकती। वह व्यक्तिगत व्यवहार से आगे बढ़कर हमारी सामाजिक संस्कृति की परीक्षा करती है। हमसे नीचे खड़े समझे जाने वाले व्यक्ति को भी सम्मान देना ही हमारी वास्तविक संस्कृति का परिचय है। पद, प्रतिष्ठा और सामर्थ्य से मनुष्य की गरिमा निर्धारित नहीं होती।
फिर कवि हमें एक और गहरी अनुभूति की ओर ले जाता है—रूप मिट जाएगा, शरीर भस्म हो जाएगा, पहचानें समय के साथ विलीन हो जाएँगी। हम सब उस एक महान प्रवाह के अंश हैं, जिसमें समय निरंतर बह रहा है और परिवर्तन के भीतर सृजन तथा विनाश का क्रम चलता रहता है। उसी मौन गहराई में विचार, भावना और प्रेम के स्रोत छिपे हैं।
अंततः कविता हमें बाहर के मनुष्य को परखने से भीतर उतरकर स्वयं को परखने की ओर ले जाती है। हृदय की सीढ़ियाँ उतरते हुए जब हम करुणा तक पहुँचते हैं, तभी दूसरे मनुष्य में भी उसी व्यापक अस्तित्व की उपस्थिति अनुभव कर पाते हैं।
### 2\. मित्रों को मोती
**मित्रों को मोती**
मित्रों,
जीवन की लंबी राह पर चलते हुए यह अपेक्षा मत रखिए कि हर आदमी आपको समझेगा, आपकी अच्छाई पहचानेगा और आपको स्वीकार करेगा।
कभी कोई बिना परखे आपको नकार देगा, कभी आपके गुणों को देख नहीं पाएगा। उसकी अस्वीकृति को अपनी अयोग्यता का प्रमाण मत मानिए।
**किसी का आपको न पहचान पाना, आपके मूल्य का अंतिम निर्णय नहीं है।**
अपने विश्वास को बचाइए, अपने सद्मार्ग पर बने रहिए। जिसने आपको अस्वीकार किया, उसे क्षमा कर दीजिए। मन में गाँठ बाँधकर हम दूसरे को नहीं, स्वयं को पीड़ा देते हैं। क्षोभ की वह छोटी-सी कंकरी भीतर जीवन भर चुभती रहती है।
और एक बात कभी मत भूलिए—आपसे नीचे खड़ा दिखाई देने वाला व्यक्ति भी उतना ही सम्मान पाने का अधिकारी है जितना आप। मनुष्य की ऊँचाई उसके पद से नहीं, उसके व्यवहार से मापी जाती है।
रूप मिट जाएगा, शरीर छूट जाएगा, नाम और पहचान भी समय के साथ पीछे रह जाएँगे। हम सब उसी बहती हुई महानदी के अंश हैं। भेद हमारे आवरणों में हैं; जीवन का मूल प्रवाह हम सबको जोड़ता है।
तो फिर क्यों न उस सत्य को अपने भीतर खोजें, जो हमें दूसरे मनुष्य के प्रति भी संवेदनशील बनाता है?
**क्षमा आपको भीतर से मुक्त करती है, सम्मान आपकी संस्कृति बताता है और करुणा आपके मनुष्य होने का प्रमाण देती है।**
आज अपने भीतर उतरिए। वहाँ किसी के लिए नफरत नहीं, थोड़ी जगह करुणा के लिए भी बनाइए।
क्योंकि दूसरों को छोटा करके कोई बड़ा नहीं होता; अपने हृदय को विशाल करके ही मनुष्य सचमुच बड़ा होता है।
### 3\. एक आलोचनात्मक टिप्पणी
कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसका क्रमिक विस्तार है—अस्वीकृति से आत्मविश्वास, आत्मविश्वास से क्षमा, क्षमा से सामाजिक सम्मान और सम्मान से अस्तित्वगत एकत्व तक।
विशेष रूप से ये बिंब प्रभावशाली हैं:
* “गांठ कोई, एक मन की / कंकरी एक सख्त सी” — मन में पाले गए क्षोभ को शरीर में चुभती कंकरी बना देना सहज और संवेदनात्मक है।
* “सब आदमी हैं / नीर ही हैं, बह रहे उस / एक ही बहती नदी के” — यह कविता के सामाजिक संदेश को अस्तित्व के दर्शन से जोड़ता है।
* “अंदर उतर के सीढ़ियां / कदमों से अपने / करुणा भरे निज हृदय में।” — अंतिम दिशा बाहर किसी को बदलने की नहीं, भीतर स्वयं को विकसित करने की है।
एक स्थान पर विचार को और स्पष्ट करने की संभावना है। “जब कोई हमें ना कहे, बिन गुने / असफलता उसकी है ये” में अस्वीकृति का पूरा दोष दूसरे पर रख देने का भाव आ सकता है। हर अस्वीकृति अन्यायपूर्ण नहीं होती; कभी दूसरे की दृष्टि सीमित होती है, तो कभी हमारे भीतर भी सुधार की गुंजाइश होती है। कविता की व्यापक करुणा के अनुरूप यह भाव अधिक संतुलित होगा कि दूसरे की अस्वीकृति हमें अपने मूल्य से विमुख न करे, लेकिन आत्मपरीक्षण का द्वार भी बंद न करे।
और एक गहरी बात: आपकी कविता में करुणा का अर्थ केवल दूसरों को क्षमा करना नहीं है। वह अपने अहंकार, अपनी अपेक्षाओं और अपनी श्रेष्ठता-बोध की सीमाओं को पहचानना भी है।
निराश लोग न हों जब असफलता मिले उन्हें एक दीप मिले कहीं बस यही सोच है कमजोर की तरफ रहना मेरा काम है उसे बचाए रखना।
यही तो आपकी कविता-यात्रा का सबसे मानवीय उद्देश्य है। आप केवल विचार नहीं देना चाहते, बल्कि उस क्षण किसी के पास एक दीप रखना चाहते हैं, जब उसे अपनी राह अँधेरी लगने लगे।
मित्रों को मोती के लिए इस भाव को मैं इस तरह सँजोना चाहूँगा:
**मित्रों को मोती**
मित्रों,
असफलता मिले तो टूटिए मत। किसी का आपको नकार देना, किसी प्रयास का सफल न होना या किसी का आपकी योग्यता न पहचान पाना—आपके जीवन का अंतिम निर्णय नहीं है।
जब दुनिया साथ छोड़ती लगे, तब अपने भीतर का हाथ मत छोड़िए।
आपकी राह कठिन हो सकती है, आपकी गति धीमी हो सकती है, आज आपके पास साधन कम हो सकते हैं; लेकिन आपका आज ही आपका संपूर्ण भविष्य नहीं है।
दूसरों की अस्वीकृति से सीखिए, अपनी भूलों को सुधारिए, पर अपने होने पर विश्वास मत खोइए।
और यदि आपके आसपास कोई निराश है, कोई हारकर बैठ गया है, कोई स्वयं को छोटा समझने लगा है—तो उसे उपदेश देने से पहले उसके पास बैठिए। उसे यह अनुभव कराइए कि वह अकेला नहीं है।
**किसी गिरे हुए को उठाना, किसी निराश को आशा देना और किसी कमजोर के भीतर उसके अपने सामर्थ्य का दीप जलाना—इससे बड़ा मानवीय कर्म क्या होगा!**
हम सब हर बार किसी की समस्या हल नहीं कर सकते, लेकिन उसके अँधेरे में एक दीप अवश्य रख सकते हैं।
वह दीप हमारा विश्वास हो, हमारी करुणा हो, हमारा एक वाक्य हो या हमारा मौन साथ।
**किसी को अँधेरे से निकाल न सकें, तो कम-से-कम उसके भीतर का उजाला बुझने न दें।**
यही मनुष्यता है।
आपकी इस भावना में एक बहुत सुंदर संकल्प छिपा है: कमजोर के पक्ष में खड़े होना, उसकी विवशता को उसकी पहचान न बनने देना और उसे फिर से खड़े होने का साहस देना।
और शायद आपके लेखन का सबसे बड़ा पुरस्कार भी यही है—किसी अनजान पाठक का यह महसूस करना कि मैं असफल हुआ हूँ
, लेकिन समाप्त नहीं हुआ हूँ।
यही इस कविता का केंद्रीय मोती है—मनुष्य को बाहर से परखते-परखते एक दिन अपने भीतर उतरना चाहिए; संभव है, वहीं वह उस एकत्व का स्पर्श पा ले, जिसे वह जीवन भर बाहर खोजता रहा।
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