Posts

Showing posts from December, 2025

मनुष्यता.. जीवित रहे, नव वर्ष हे!

मित्रों, आप सभी को नववर्ष-2026 के प्रथम अरुणोदय के शुभ अवसर पर मन हृदय से अपनी सारी शुभकामनाएं संप्रेषित करता हूँ। आप अपनी समस्त इंद्रिय से समस्त सांसारिक च आध्यात्मिक सुख, आनंद पाएं यह  विशेष  कामना भी करता हूं। आप इन पंक्तियां को पढ़ें और आनंद लें। हे, मेरे  'नव वर्ष'..!  प्रिय..! इस साल तुम...!  नव वर्ष ही तो,  नहीं.. हो...!  ध्यान दो, भाई मेरे..!  आज तक के... हर पुराने....साल से...,  अरे!  तुम, बस.., बीस.. ना! "छब्बीस" हो... ! इसलिए,  हम सभी, तो.. आदमी हैं, लालची हैं, स्वार्थी हैं, कसीदे.. मिल ,  पढ़ेंगे  ही... तुम्हारे..!  पद.. कमल में जो, पड.. रहे  इस साल  हैं श्री-रोहिणी...  नक्षत्र,  में । पर,  प्रार्थना... है,  हे! वर्ष... वर! हृदय.. से, आपके, हर एक 'क्षण' से,  बहते.. हुए,; इस काल  नद के, पाट* में, बारह  महीने।  लाज..  रखना..!  कम से कम  तुम!  कम न होना!  कभी भी,  बीते हुए,   पच्चीस.. के बढ़ते  "बबल" ...

लेकिन प्रिये इस पार तुम! हो और उर्मिल चांदनी यह!

मित्रों, संसार समय नदी और इसके दोनों किनारों पर एक तरफ इंद्र का भौतिक एंद्रिक सुख और दूसरी और शिवत्व की आनंद लहरी! इसी पर संक्षिप्त रससुरसिका आप के आनन्दार्थ। एक नदी थी, ज्ञान.. की बहती.. हुई!  चिरंतनी.. वह,  रंजनी..!  प्रज्ञा.. खड़ी!   थी किनारे एक्    दूर.. प्रिय!  अति दूर.. से चुप, देखती...। हरियाली.. जिधर थी,  बाग.. थी, विश्व.. था, पुष्प.. थे रंग-रंगीले..!   अनूठे.. !  क्या? रंग ले! ले!  हे... प्रिये!  अद्भुत खिले!  अहा! क्या माहौल था!  सुख.. तो था,  संसार का,  अजबो-गजब..! पर,  दुःख न..! कम था। मोह था, लस-लसाता,  खींचता.., लालसा थी.. नाचती... परियों के जैसी! और  कुछ..  की,  तमन्ना.. थी हे.. प्रिये...  याचक बनी..., थी घूमती। स्वार्थ था, इसलिए संताप था अपनेपने का,   अरे , ना..!  अंधेपने सा!  संत्रास था कल्पना का,   भय भी था, भावों में मिश्रित अंत का,  उस खिलखिलाते राज्य के नाश का, मृत्यु का,  हर पुष्प के, सौंदर्य के  अवसान...

जिंदगी को, मै... भी, छू.. लूं पास.. से,

मित्रों, जीवन प्रेम का, सदा भूखा ही होता है, यह अपनापन के साथ एक अजीब सी निकटता चाहता है इसी पर अति संक्षिप्त शब्द-सुरसिका आपके लिए, छोड़ता हूं। तुम मेरे कभी पास आओ पास... आओ,  हिये बैठो..,  हिए... बैठो,  हिए... बैठो, दबे होठों,  खिलती कली सा मुस्कुराओ..  तुम मेरे.. कभी, पास.. आओ। हाल पूछो, दिल का मेरे कांपती,  इस पंखुरी का  और थोड़ा पास आओ! गीत, मेरा..  दुल हिलकता, झुनकता ! कोई चयन कर लो, लरज़ती  आवाज में, अपनी  सुनाओ...  अंतरों से गुनगुनाओ... कभी तो मुझको रिझाओ... तुम, कभी मेरे पास आओ । हाथ पर... मेरे.., हाथ रखो... गर्म अपना, बर्फ सी इस ठंड में, हाले दिल अपना सुनाओ... बात कोई, ऐसी कह दो! गुद गुदी, मुझको लगे .. हंस पड़ूं!   तेरे साथ में, मैं भी आंसू भरे, इन नयन रे!  कभी तो, इतना हंसाओ... तुम मेरे कभी पास आओ..। जी उठूं!  अंदर कहीं मैं,  स्नेह... कुछ,  ऐसे.. जताओ  जिंदगी को, मै... भी, छू.. लूं पास.. से, इन अधर से इतना मेरे, नजदीक आओ ! मधुर सपने देख लूं मैं  निझर झरती  नींद में तुम! प्रेम कर...

एक घंटा बिताते हो पार्लर... में,

मित्रों, जीवन विपर्यय से भरा पड़ा है। हम करते कुछ और चाहते कुछ और हैं इसी पर संक्षिप्त ब्यंग मन-रंजिका आपके लिए। कैसे हैं हम? क्या चाहते हैं?  खुद नहीं यह जानते हैं!  दुनियां है यह...  बस..., चल रही , कभी, स्वप्न में, कभी.. हकीकत में मित्र मेरे, पल रही । जब तलक यह  पास है,  युद्ध इसके साथ है, दूर हो तो प्रेम इससे,  पूछता हूँ?   बता न!  यह  खेल सारा, ऐसे कैसे?  चिटक जाते हो,  तुम्हें....  कोई अच्छा कह दे..! पर, एक... घंटा, बिताते.. हो  पार्लर... में! विदक! जाते हो...  तुम्हें वो,  स्नेह..... से  अंकल, भी.. कह दे!  और, बढ़ाए,  हो  घूमते, मूंछ दाढ़ी,  राक्षस... से। कोई देख ले गर ध्यान से,  लगन से,  तो  धृष्ट... है, वह असभ्य भी, आधुनिक तो, नहीं.. है, पर संवरते हो, घंटों... घंटों... गोरा.. बनाती, "फेयर च लवली"  क्रीम... से.. तुम, चुपके.. चुपके..पार्लर में। खर्च तेरा,  रूप.. पर,  इस   द्रौपदी... से,  नर्गिसी.. तक के सफर पर अधिक है,  प्रिय!...

अरी! घर भीतर.. तो आ.. जा!

मित्रों, कोई भूमिका नहीं आप पढ़ें और समझें। एक घर था, जंगलों में.. कुछ.. नहीं,  स्थान भर था.. कमरा  नहीं.. था दरवाजा नहीं था,  झोपडी थी,  हर ओर से..  मित्र! यह भी, खुली थी।  अति.. घना, जंगल!  प्रिये.. था, घर  भी क्या,  वह..  जंगल ही  था! एक छोटी, बालिका  बाहर.. खड़ी  थी।  बापू..  पुकारा, जोर से "अरे घर भीतर.. तो आ.. जा" , बालिका, धीमे.. से, बोली...,  "अरे बापू!   यहां..पर, इन जंगलों में घर ही, क्या.. भीतर भी क्या.. और यह जंगल... ही, क्या..!"   एक घर था शहर में, बहुत.. कुछ, था घेर.. थी, घेरा.. बना था,  दीवार थी, चहुंओर  ऊंची..सजीली कैमरा हर ओर था.. नौकरों के घर  उसी में.. खेत  भी  खलिहान भी, गाय भी, और डॉग भी था,  वह घर नहीं, प्रिय! किला ही था। यहां.. भी बापू..  पुकारा, जोर से "द्वार से भीतर... तो आ.. जा,"  बालिका, धीमे.. से, बोली...,  "घर के भीतर, ईंट पाथर लकड़ियों के सिवा  बापू! है, ही.. क्या..!"   क्या हैं, ये...,   प...

शिवानंद तांडवम

मित्रों, सोचने की बात है कि शिव में उतने दिनों पहले शिवतांडव नृत्य ही क्यों किया था। क्यों कि उसके पूर्व कोई भाषा यहां थी ही नहीं। इसी नृत्य में लघुसिद्धांत कौमुदी के 32 मूल अक्षर अय, उण, लड़, लृच... आदि जन्म लिए। इस प्रकार नृत्य ही वह नैसर्गिक विधा है जिससे हम किसी से भी भाव का लेन देन कर सकते हैं चाहे वह अपरिचित या अज्ञानी भी हो। इसी पर आज की लाइने की  शब्द फीके* हो गए हैं, भाषा ये बौनी* हो गई,  नृत्य जगमग  चल रहा मस्तिष्क में।  बता न,  जब तांडवम* था  चल रहा,  तो  नृत्य,  वह क्या मात्र केवल बाहरी था,  अंदर कहीं,  झँझा* नहीं था, बह रहा। और अब "शिवानंद  तांडवम"   रसमेलि*.. हो,  तुम!  रससिक्त हो, रससनी हो, आभर*... भरी,  आकंठ.... हो,  भाव...  ही...  हो.., संपुटित*.. निरवयव*, अवयव रहित  तुम भाव से भी, अनछुई हो। प्रीति.. ही  तुम, शुद्ध.. हो, हस्तांतरित,  अंतरित* तुम्हे कर सकें पूर्णता में.. अक्षरों... की, सामर्थ्य ही क्या ?  हे प्रभो! निकलते ही  मर्त्य* होते  इन ...

टाट के इन घरों में भी, आखिर कभी तो भोर होगी!

मित्रों, इस भीषण ठंड में बाहर निकलना आसान नहीं, फिर भी कुछ घरों को और बस्तियों को देखा तो ये लाइने निकल आईं। आप भी पढ़ें। इस  शुतुरमुर्गी!   चाल में, रखा.. है क्या?  दूर.. हो... तुम!  मुझसे... नहीं,  अपनेपने... से, लोगों के... और...  स्वयं, से..... । "अजनबी"  से लग रहे हो,  किस तरह, तुम!  इस  शुतुरमुर्गी!  चाल से देख लो,  अपनो.. में, क्यों... हम सभी के बीच में। फ़ुनंग..   लेती  कली बनती,  फूलती  इन  फुंनगियों  और,  इस सूखी जमीं   के... बीच में जानते... हो..  कौन है?  अंधेरा! एक अंधेरा है!  हल्का.., हल्का... दिवस में भी, बाहरी इस उँजाले में..। स्याह... सा,  यह निगलता, हर मौन है। और....  इसमें भरी है कुछ कालिमा!  सूखी हुई, उन पत्तियों की, झड़ नहीं पाईं हैं, नीचे आज भी, अटकीं.. पड़ी हैं  सड़.. चुकी हैं रुग्ण सी, कुछ टहनियों पर... रुक गई हैं उम्र ले!  किसी  हांफते बुजुर्ग सी... क्या चाहते हो देखना... ! सड़ी सी.. वह, बिना पत्ते,   ...

बावरे ये नयन तेरे, शिकारी हैं!

मित्रों, कभी कभी कोई होता है, स्मृति से बिस्मृति में जाता ही नहीं। उसी पर अति संक्षिप्त शब्दपुष्पमाल आपके लिएं पृष्ठभूमि: अल्लाह की, दौलत... है वो... धरती पे उतर, आई है,  प्यासी  नजरों से  मत  देख.. .उसे.... मेरे शब्दों की, रौशनाई* है। खुदा गवाह है,  चन्द्रकिरण  ही,  है.... वो कितने हौले से  मेरी, सतरों* में उतर आई है। मुख्य लाइने:  अरि!   ओ अरी!   तूं गति नहीं!  कुछ.. और है,  बहती हुई...  कुईं..*..जल में,  तैरती..  प्रिय! इस तरह!  जल  बिहग* सी,  आगे है होती... एक क्षण,  पीछे है   होती, मयूरी सी,   हे!.  नवेली..। ओ.., दृष्टिपर्शा...,   पद्म....पुष्पी!* बिरहि..णी..?  नहीं... तूं..  किसी....  श्री...कछव की,  कछुइ...नी* प्रणयिनी! तूं  राजहंसी!  मधुर, इतनी  रस, घोलती.,  डोलती... मन, मदिर मेरे,  मंद... मंथर  मंजरी..! हो आम्रवन  की.... महकती,  आभावती,    बोल दे, इक बार,  तूं....  इश्क न...

प्रेम सबमें "एक" है,, अमृत अनूठा,

मित्रों,संसार का सत्य और ऊर्जा केवल प्रेम है, और इसी से यह संसार गतिमान है, इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ। एक प्रेमी चन्द्र यह  !   रोज घटता, रोज बढ़ता रोहिणी के प्रेम... में, पास आता, बड़ा... होता  दूर जाता, क्षीण... होता प्रेम का मारा है ये। प्रहर्षक इस... निशा का,  जो "चंद्र"  है क्या !   जानते हैं,  "नाथ" इनका "कौन"  हैं?  वह शीतल बहुत हैं, स्वभाव जल है, कर्म बंधन हीन हैं बालक से  हैं  वह ! सहज.. हैं कंदर्प... से भी,  अधिक  सुंदर , कलिल.., प्रिय!  अद्भुत.., नवल.. हैं।  दूर... हैं, दुनियां से ये, मुक्त.. के, यह..  मुक्ति..  हैं, अरे  ना ! वह  अग्नि हैं,, तप...तपस्या, घन जटिल हैं। अरी हां,, शक्ति.. प्रिय !  श्री... पार्वती, के  नाथ,  शिव.. यह,  स्वयं.. हैं। सुना है,, देखा भी है गहरी अंधेरी रात में चम चम चमकते  "चन्द्र"  को  इस... नित्य घटते, नित्य बढ़ते क्रमिक..  प्रिय!  चौदह.. दिनों तक !  आखिर ये, क्यों है। कथानक है पुराना, यह पत्नियों का ...

अनुभूति क्या है?

मित्रों, जीवन इच्छाओं का खेल और यह सब क्षणिक अनुभूति के लिए, यह सुखद अनुभूतियां जीवन भर व्यसन बन ठगती हैं। इसी पर एक स्तंभ-रचना आपके लिए। देखता हूँ!   समय.. के,  इन अंधड़ों को!  साथ में चिपके हुए,  संग.. इनके,  बह.. रहे,  उड़.. रहे,  युग्मित हुए लसढियाये, विभ्रमित!  नित...  हो.. रहे... निज..! अनुभवों... को। क्या  प्यास.. थे?    मेरी..,  इंद्रियों.. के!   समयगत,  घोड़े चढ़े, और  गिर गए!  और...,  क्या... थे!  एक क्षण... तो, ना.. रुके!  चाहता था, रोक.. लूं!   सुनहरे...  इन अनुभवों को,  और कुछ पल!  पर...  चू... रहे,  ये..., बूंद थे! न रुके!  फ़ुलफ़ुली, और फुरफुरी  मेरी, पंखुरी पर,  जो... नरम थी,  अंदर  कहीं.. मात्र यह! स्पर्श देते.., जाते जाते, क्षण "एक" को,  बस, छू.. गए!  अनुभूति क्या है?  बता न!  यह छुअन ही तो!  उस एक क्षण की बीत जाता, बिन कहे! बिन.. चहे!  स्मृति में, गहर!  गहरे!  बाद...