लेकिन प्रिये इस पार तुम! हो और उर्मिल चांदनी यह!

मित्रों, संसार समय नदी और इसके दोनों किनारों पर एक तरफ इंद्र का भौतिक एंद्रिक सुख और दूसरी और शिवत्व की आनंद लहरी! इसी पर संक्षिप्त रससुरसिका आप के आनन्दार्थ।

एक नदी थी, ज्ञान.. की

बहती.. हुई! 

चिरंतनी.. वह, 

रंजनी..! 

प्रज्ञा.. खड़ी!  

थी किनारे एक्  

दूर.. प्रिय! 

अति दूर.. से

चुप, देखती...।


हरियाली.. जिधर थी, 

बाग.. थी,

विश्व.. था, पुष्प.. थे

रंग-रंगीले..!  

अनूठे.. ! 

क्या? रंग ले! ले! 

हे... प्रिये! 

अद्भुत खिले! 


अहा! क्या माहौल था! 

सुख.. तो था, 

संसार का, 

अजबो-गजब..!

पर, 

दुःख न..! कम था।


मोह था, लस-लसाता, 

खींचता..,

लालसा थी.. नाचती...

परियों के जैसी!

और कुछ.. की, तमन्ना.. थी

हे.. प्रिये... 

याचक बनी..., थी घूमती।


स्वार्थ था, इसलिए संताप था

अपनेपने का,  

अरे , ना..! अंधेपने सा! 

संत्रास था कल्पना का,  

भय भी था, भावों में मिश्रित

अंत का, 

उस खिलखिलाते राज्य के

नाश का, मृत्यु का, 

हर पुष्प के, सौंदर्य के अवसान का।


उस पार.. भी, प्रिय! 

नदी.. के, 

इस.., 

बहुत.. कुछ था,

शांति.. अद्भुत! 

सौम्यता.. थी विरलतम...,

क्या सादगी! थी...

अनुपम..! मनोरम...!

मृत्यु थी, अवसान था लेकिन यहां...

यह सभी कुछ.. 

समझा हुआ, जाना हुआ,   

काल पट पर खेलता

विश्राम भर था।


मनोमय, यहां कुछ नहीं था, 

राग.. न था, 

भय...  

नहीं था।

विवेक था, विश्वास था।


एक संत था, 

इस पार से उस पार

प्रिय! वह जा रहा था,

प्रज्ञा.. से पूछा,

चलोगी..? 


मुनी.. जी, तुम्हीं.. जाओ, 

अरे..! 

क्या..

उस.. पार रखा? 

बदलता... कुछ है, नहीं,

सब पुराना है, 

वही.. 

शांति है, 

वही... सादगी है,  

एक ही, उबाऊ जीवन वहां है! 

आपाधापी, है.. नहीं

कर्म का अवसान है, 

वो भी, कोई जगह है 

मैं, क्यूं चलूं! 

उस पार?  

मुनि जी, तुम्हीं जाओ..।


यही तो 

यह विश्व है ! 

नदी बहती, जीवनों की

मृत्यु है उत्सव यहां, चिर मोक्ष है,

प्रेम नीरव, 

शांति छुल छुल बह रही,

आत्मता का देश यह 

उत्कृष्ट है।


लेकिन प्रिये इस पार... 

तुम...! हो

और उर्मिल चांदनी यह! 

खेलती.., इस धवल रज पर..

छद्म ही 

हो! 

एक क्षण की ही सही 

पर मोहती है, 

निछावर वह, सभी कुछ, 

हम मानवों का इसी पर है।

सोचे! मित्रों, 

हम सभी की, सीमा यहीं की।


जय प्रकाश मिश्र












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