शिवानंद तांडवम

मित्रों, सोचने की बात है कि शिव में उतने दिनों पहले शिवतांडव नृत्य ही क्यों किया था। क्यों कि उसके पूर्व कोई भाषा यहां थी ही नहीं। इसी नृत्य में लघुसिद्धांत कौमुदी के 32 मूल अक्षर अय, उण, लड़, लृच... आदि जन्म लिए। इस प्रकार नृत्य ही वह नैसर्गिक विधा है जिससे हम किसी से भी भाव का लेन देन कर सकते हैं चाहे वह अपरिचित या अज्ञानी भी हो। इसी पर आज की लाइने की 

शब्द फीके* हो गए हैं,
भाषा ये बौनी* हो गई, 
नृत्य जगमग 
चल रहा मस्तिष्क में। 
बता न, 
जब तांडवम* था 
चल रहा, 
तो नृत्य, 
वह क्या मात्र
केवल बाहरी था, 
अंदर कहीं, 
झँझा* नहीं था, बह रहा।

और अब "शिवानंद तांडवम"  

रसमेलि*.. हो, 
तुम! 
रससिक्त हो, रससनी हो,
आभर*... भरी, आकंठ.... हो, 
भाव... ही... 
हो.., संपुटित*..
निरवयव*, अवयव रहित 
तुम
भाव से भी, अनछुई हो।

प्रीति.. ही 
तुम, शुद्ध.. हो,
हस्तांतरित, 
अंतरित* तुम्हे कर सकें
पूर्णता में..
अक्षरों... की, सामर्थ्य ही क्या ? 
हे प्रभो! निकलते ही 
मर्त्य* होते 
इन अक्षरों में नहीं.. रे! 

अक्षर भी क्या हैं...
मात्र! प्रेशर,
पेशियों पर, होष्ठ पर, 
इन अधर ऊपर
रसरंजिका* पर, तालु पर।

केंद्र पर, जो पांच हैं, 
रीढ़ की 
इन हड्डियों पर, 
मूल से ले, स्वमणि*, अनहद, 
विशुद्धि, ऊपर आज्ञा 
तक
भाव, ढोते...
निर्देशनों.. में, मस्तिष्क के...
मोड* कितने अरे! इसमें! 

इससे आगे, 
भाष, भाषा, और मात्रा, 
झंडे हैं कितने...?
और जब यह 
शक्ति की भी, युज्यता*..., 
अनुकूल हो
जाने न कितनी 
बाड़* रे! 
बहुत ज्यादा ग्रंथि* रे! 
इसलिए 
शुद्धता संभव नहीं, इस "विधा*"  में ! 

तो... 
इससे सुंदर, 
और सीधा, भाषा रहित.. 
और तार्किक.. 
एक "मेथड"  है...
भाव के, विचार के इस अंतरण* का
यह नृत्य है, 
एक ही,सबके लिए
ज्ञान.. भूषित.., 
पराज्ञानी* से लगायत
मूर्ख...तक 
के, भी... लिए।

इस लिए इस तांडवम* को 
चुना प्रभु ने...,
नय* निपुण, नव  
अंग उनके, सरस कितने! 
मुड़ रहे, हर कोण से, 
ये... धीरता.. ले! 
कह रहे हैं
छोड़ सब कुछ, मुक्त हो
एक बार दिन में।

विचारों से,
ज्ञान की इस मूढ़ता* से
स्वार्थ की इन रज़्ज़ुओ* 
को तोड़ रे!
आ..! प्रकृति के, साथ.. आ!
छोड़ यह, घर.. बार, आ..!
डूब खुद में..!.
पूर्ण.. है, 
तूं, 
बिन किसी के...!

साथ मेरे, तांडवम,...! 
यह नृत्य कर तो... 
आनंद में स्नान कर तो
देख!  तूं संतुष्ट खुद में... !

नृत्य भी तो मंत्र* है
रस बरसता हर पोर से..!
नस नाड़ियों से...
मस्त कैसा, 
तूं,  देख.. इसको.
तरंगें हैं, निमंत्रण है,
भाव है, 
कस तैरते... इस देह ऊपर!
भीग इसमें...!

लास्य* से, वासना से दूर यह...
शक्ति का संचार है 
आ मिल तूं इससे..
तांडवम यह...
जागरण है, चेतना का 
आ...
परख इसको...!

आनंद का उत्सव है ये आ
नहा इसमें...!
और अंत में विश्रांति* ले, 
शून्य.. ले
यह मृत्यु... जैसी शांति ले! 
तुम जिंदगी को "फुल"  जियो 
आनंद से, तुम मत डरो।
यही तो है, तांडवम, वह भरत नाट्यम*
यही तो है, तांडवम, वह भरत नाट्यम।

जय प्रकाश मिश्र
फीके: हल्के, अप्रभावी, बेकार 
तांडवम: शिव का अनूठा नृत्य जिससे संस्कृत भाषा का उद्भव हुआ उसके सूत्र निकले।
बौनी: छोटी, कम महत्व का 
झंझा: आंधी, तेज विचारों का बहना
रस मेलि: रस से जिसकी मित्रता है, जो रसों में रहती है
आभर: भरा हुआ
संपुटित: एक जगह ठोस रूप से, कस कर इकठ्ठा करना
मर्त्य: मरण शील
निरवयव: कण रहित, अभौतिक, सूक्ष्म, बिनारूप का
अंतरित: भेजना संपूर्णता में देना
रस रंजिका: जीभ, रस का स्वाद लेने वाली
स्वमणि: स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्र का शॉर्ट
मोड: तरीके, रास्ते, विधियां
युज्यता: जुड़ना, योग, एक साथ मिलकर
बाड: रोक, बाधाएं
ग्रंथि: जटिलता, कठिनाई, समझ से परे
पराग्यानी: अहंकार की सीमा तक जानकारी वाला 
नय निपुण: कमनीय, झुकने की शैली, नम्र, मुलायम
मूढ़ता: मूर्खता, नादानी
रज़्ज़ुओं: रस्सी के बंधनों से 
मंत्र: शॉर्ट कट, बड़े प्राप्ति का छोटा और प्रूव्ड विधि
लास्य: मनोहारी, चित्ताकर्षक
विश्रांति: विश्राम की स्थिति, आराम की अवस्था
भरत नाट्यम* भरत मुनि ने शिव के अनूठे नृत्य को शब्दों में उसे भावार्थ सहित लिपि बद्ध किया, वह तरीका है भरत नाट्यम।



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