प्रेम सबमें "एक" है,, अमृत अनूठा,

मित्रों,संसार का सत्य और ऊर्जा केवल प्रेम है, और इसी से यह संसार गतिमान है, इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ।

एक प्रेमी चन्द्र यह ! 

रोज घटता, रोज बढ़ता

रोहिणी के प्रेम... में,

पास आता, बड़ा... होता 

दूर जाता, क्षीण... होता

प्रेम का मारा है ये।


प्रहर्षक इस...निशा का, 

जो "चंद्र"  है

क्या! 

जानते हैं, 

"नाथ" इनका "कौन"  हैं? 

वह शीतल बहुत हैं, स्वभाव जल है,

कर्म बंधन हीन हैं

बालक से हैं 

वह!

सहज.. हैं

कंदर्प... से भी, 

अधिक सुंदर, कलिल.., प्रिय! 

अद्भुत.., नवल.. हैं। 


दूर... हैं, दुनियां से ये,

मुक्त.. के, यह.. 

मुक्ति.. 

हैं,

अरे ना! वह अग्नि हैं,,

तप...तपस्या, घन जटिल हैं।


अरी हां,,

शक्ति.. प्रिय

श्री... पार्वती, के 

नाथ, शिव.. यह, स्वयं.. हैं।


सुना है,, देखा भी है

गहरी अंधेरी रात में

चम चम चमकते 

"चन्द्र"  को 

इस...

नित्य घटते, नित्य बढ़ते

क्रमिक..  प्रिय! 

चौदह.. दिनों तक ! 

आखिर ये, क्यों है।


कथानक है पुराना, यह पत्नियों का

नक्षत्र सी.., ना, नक्षत्र ही.... 

सत्ताईस हैं 

वे..

प्रीति है यह, प्रेम है, चंद्र का, 

सर्व सुंदर, रोहिणी नक्षत्र से।, 

छूटता.. ही है, नहीं

श्रापित है यह 

श्वसुर अपने

प्रजापति

श्रीदक्ष

से।


त्राण पाता 

मात्र यह,सानिध्य

में "श्रीमहेश्वर"  की जटाओं में...

हर,महीने,एक दिन, अंत में,

शिवरात्रि के।


चंद्रमा यह..

भाग्यशाली, बहुत है, 

शीर्ष पर है, देव देवा,अधीपति 

श्री शंभु के।,

पर,क्या कहूं! वक्रता 

धारण किए

सदा ये,  

रूप में,  व्यक्तित्व में

इस लिए, तो दुखी है

वियोग में, उस

रोहिणी 

के।


अब तक कहा जो व्यर्थ है:, 

मात्र इतना सत्य है: 

रोहिणी हो, अन्य कोई 

रूपसी..! या कुरूपा..!

मतलब नहीं, 

प्रेम... 

हमको..., बढ़ाता.. है,

अमृत है ये, ऊर्जा है, पॉजिटिवनेस. 

खुद ही है, 

जीवन नवल यह, मधुर रस है।


दूर होना, प्रेम से, एक सोच है, 

मात्र बस, उस रोहिणी से,

चंद्र की जो...

निगेटिव है, घटाती है

आकार उसका, शक्ति उसकी

क्षीण करती, सुखाती है, नित्य उसको।


दूर ना.. हूँ , 

अब पास हूं उस प्रेम के

प्रिय रोहिणी के,,आशा है ये

जो बढ़ाती है, शक्ति उसकी, 

आनंद उसका, यही तो प्रिय, जिंदगी है।

प्रेम तो एक कूप है,

बाहर से 

सिंपल, सामान्य ही यह दीखता है,

पास आओ, नीचे उतरो, अंतरों में

अंतरों में यहां नीचे...

मधुर, मीठा, अमृत सरीखा

प्रेम का रस सरसता है।


कूप सारे दृश्य हैं, 

रूप में विभिन्न हैं, 

कुछ.. सुंदर सलोने 

कुछ, सामान्य से भी

और नीचे, कुरूप हैं,।

पर "प्रेम" , 

प्रेम सबमें "एक"  है,,

अमृत अनूठा, एक ही, अमृत अनूठा।

हर किसी में बह रहा, यह मधुर मीठा।


कीट हैं हम, अगरचे 

अंतर हैं करते

पुष्प में, 

इन वनस्पति के,

आधार लेकर, रंग के, आकार के

या रूप की रस माधुरी में।

सच कहूं तो और नीचे, और नीचे।

जय प्रकाश मिश्र







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