अरी! घर भीतर.. तो आ.. जा!

मित्रों, कोई भूमिका नहीं आप पढ़ें और समझें।

एक घर था, जंगलों में..
कुछ.. नहीं, 
स्थान
भर
था..
कमरा 
नहीं.. था
दरवाजा नहीं था, 
झोपडी थी, हर ओर से.. 
मित्र! यह भी, खुली थी। 
अति.. घना, जंगल! 
प्रिये.. था,
घर 
भी क्या, 
वह.. जंगल ही था!
एक छोटी, बालिका 
बाहर.. खड़ी 
थी। 
बापू.. 
पुकारा, जोर से
"अरे घर भीतर.. तो आ.. जा" ,
बालिका, धीमे.. से, बोली..., 
"अरे बापू!  
यहां..पर, इन जंगलों में
घर ही, क्या..
भीतर भी क्या..
और यह जंगल... ही, क्या..!"  

एक घर था शहर में, बहुत.. कुछ, था
घेर.. थी, घेरा.. बना था, 
दीवार थी, चहुंओर 
ऊंची..सजीली
कैमरा हर ओर था..
नौकरों के घर 
उसी में..
खेत 
भी 
खलिहान भी,
गाय भी, और डॉग भी था, 
वह घर नहीं, प्रिय! किला ही था।

यहां.. भी
बापू.. 
पुकारा, जोर से
"द्वार से भीतर... तो आ.. जा," 
बालिका, धीमे.. से, बोली..., 
"घर के भीतर, ईंट पाथर
लकड़ियों के सिवा 
बापू! है, ही..
क्या..!"  

क्या हैं, ये...,  
प्रिय! समझना, 
इन..,  दोनों में अंतर 
है.. कहां! 
बस.. समझ है, 
विश्व सारा, आंतरिक 
एक स्थिति है, मानसिक
और.. क्या? 

जय प्रकाश मिश्र


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