अनुभूति क्या है?
मित्रों, जीवन इच्छाओं का खेल और यह सब क्षणिक अनुभूति के लिए, यह सुखद अनुभूतियां जीवन भर व्यसन बन ठगती हैं। इसी पर एक स्तंभ-रचना आपके लिए।
देखता हूँ!
समय.. के, इन अंधड़ों को!
साथ में चिपके हुए,
संग.. इनके,
बह.. रहे, उड़.. रहे,
युग्मित हुए
लसढियाये, विभ्रमित!
नित...
हो.. रहे...
निज..! अनुभवों... को।
क्या
प्यास.. थे?
मेरी.., इंद्रियों.. के!
समयगत,
घोड़े चढ़े, और गिर गए!
और...,
क्या... थे!
एक क्षण... तो, ना.. रुके!
चाहता था, रोक.. लूं!
सुनहरे...
इन अनुभवों को, और कुछ पल!
पर...
चू... रहे,
ये..., बूंद थे! न रुके!
फ़ुलफ़ुली, और फुरफुरी
मेरी, पंखुरी पर,
जो...
नरम थी,
अंदर कहीं.. मात्र यह!
स्पर्श देते..,
जाते जाते, क्षण "एक" को,
बस, छू.. गए!
अनुभूति क्या है?
बता न!
यह छुअन ही तो!
उस एक क्षण की
बीत जाता, बिन कहे! बिन.. चहे!
स्मृति में, गहर! गहरे!
बादल! प्रिये थे,
कारे! कारे!
घेर मुझको, अंक में!
अंत में!
खुद.., घिर गए! खूब बरसे,
बरसते ही,
सूर्य की, ज्ञान की,
उन रश्मियों से,
अनुभवों में बदलते...
छंद.. छंदित..
शब्द.. हों,
अंतरों में, बज.. उठे.. !
पकड़ में आए नहीं...
कुछ ही क्षणों में, छंट गए।
ये,
क्यों है छाते?
छतरियां ले, उतर आते!
कहां से,
मैं पूछता... हूँ?
अंदर कहीं थे, घूमते!
पाले थे मेरे,
अवचेतनों.. में..!
छुपाए! रखे थे मैने,
जानते, अनजानते! अंदर ही अपने!
क्या लिबास मेरा,
मात्र! उजला!
अरे!
बस..! था !
झंडा... सरीखा!
दिखाने को!
बता न! जग, बाहरी को!
अरे ये!
आए कहां से?
बरस कर, फिर कहां जाते!
और क्या ये घने होते..
बदलते हैं, व्यसन... में,
अनुभूति बन बन,
फिर रोज चूते नालियों में,
प्यालियो में ये ही ढलते!
बता न! यह खेल क्या है?
देखता हूँ!
समय.. के, इन अंधड़ों को,
साथ में चिपके हुए,
संग.. इनके,
बह.. रहे, उड़.. रहे,
युग्मित हुए
लसढियाये, विभ्रमित!
नित... निज..!
हो.. रहे...
इन अनुभवों... को।
नित्य बहती हवाओं में
फ़िज़ाओ में,
रंग की इन महफिलों में,
बह रहे सौरभ के भीतर
कौन है?
इन अनुभवों में!
यह!
हवाओ में
सदाओं में, ऊर्जा में, रश्मियों में
लहर में, तरंगों में,
भागता, दौड़ता, खींचता..
मुझको.. प्रिये! यह कौन है?
कितना,
जटिल! है,
कर्म यह! सुख दुख भरा है..
मर्म मेरा, हृदय मेरा,
मर्म मेरा, हृदय मेरा,
रोज छूता, बेधता है..।
कहीं फंस गया हूं उलझ कर! मैं..
रेशों में इसके, क्या कहूं!
छूट जाएगा,
ये एक दिन जानता हूँ!
बस
कब फटेगा!
कब फटेगा!
कारण से किस! अंजान हूं!
छोड़ते भी देखता हूँ
छोड़ते भी देखता हूँ
श्रेष्ठ जन!
संन्यासियों को
शमन, कर मन!
शमन, कर मन!
तर्प क्यों तर्पण ही कर.. तन..!
फैले हुए इस वेब*.. को
संतोष से, शांति से,
संतोष से, शांति से,
बिन ब्यग्रता के, भ्रांति के!
मै देखता हूं! अलग होते
एक क्षण में, ज्ञान होते!
और "मैं" एक...
व्यग्र हूँ, उद्विग्न हूँ!
व्यग्र हूँ, उद्विग्न हूँ!
इन इंद्रियों के खेल में!
एक क्षण के अनुभवों में!
दुखित हो,
इसी के पीछे लगा हूं !
आज तक!
जानता हूँ! कुछ नहीं यह!
जानता हूँ! कुछ नहीं यह!
सत्य तो है ही नहीं!
एक धागा
मर्म का,
मन, हृदय, मस्तिष्क का
जाने कहा से
जाने कहा से
जुड़ा है
इसे क्या कहूं!
इसे क्या कहूं!
इसे क्या कहूं।
मै, यह नहीं, अनुभव नहीं
कुछ और हूँ, कुछ और हूं।
यह जानता हूँ! जानता हूँ!
शेष आगे...
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment