टाट के इन घरों में भी, आखिर कभी तो भोर होगी!
मित्रों, इस भीषण ठंड में बाहर निकलना आसान नहीं, फिर भी कुछ घरों को और बस्तियों को देखा तो ये लाइने निकल आईं। आप भी पढ़ें।
इस
शुतुरमुर्गी!
चाल में, रखा.. है क्या?
दूर.. हो... तुम!
मुझसे... नहीं, अपनेपने... से,
लोगों के...
और... स्वयं, से..... ।
"अजनबी" से लग रहे हो,
किस तरह, तुम!
इस शुतुरमुर्गी! चाल से
देख लो,
अपनो.. में, क्यों...
हम सभी के बीच में।
शुतुरमुर्गी!
चाल में, रखा.. है क्या?
दूर.. हो... तुम!
मुझसे... नहीं, अपनेपने... से,
लोगों के...
और... स्वयं, से..... ।
"अजनबी" से लग रहे हो,
किस तरह, तुम!
इस शुतुरमुर्गी! चाल से
देख लो,
अपनो.. में, क्यों...
हम सभी के बीच में।
फ़ुनंग..
लेती कली बनती,
फूलती इन फुंनगियों
और, इस सूखी जमीं
के...
बीच में
जानते... हो..
बीच में
जानते... हो..
कौन है? अंधेरा!
एक अंधेरा है! हल्का.., हल्का...
दिवस में भी, बाहरी इस उँजाले में..।
दिवस में भी, बाहरी इस उँजाले में..।
स्याह... सा,
यह निगलता, हर मौन है।
यह निगलता, हर मौन है।
और....
इसमें भरी है
कुछ कालिमा!
सूखी हुई, उन पत्तियों की,
झड़ नहीं पाईं हैं, नीचे आज भी,
अटकीं.. पड़ी हैं
सड़.. चुकी हैं
रुग्ण सी, कुछ टहनियों पर...
रुक गई हैं उम्र ले!
कुछ कालिमा!
सूखी हुई, उन पत्तियों की,
झड़ नहीं पाईं हैं, नीचे आज भी,
अटकीं.. पड़ी हैं
सड़.. चुकी हैं
रुग्ण सी, कुछ टहनियों पर...
रुक गई हैं उम्र ले!
किसी
हांफते बुजुर्ग सी...
क्या चाहते हो देखना... !
हांफते बुजुर्ग सी...
क्या चाहते हो देखना... !
सड़ी सी.. वह, बिना पत्ते,
मरी.. सी...
बिचारी
अंधेरों में, कुपोषित
किसी बालिका सी...
जीर्ण.. शीर्णा....
वस्त्र भीतर, छुप छुपी सी...,
बूढ़ी भी समझो, घर में, चुप हैं
दबी सी...,
अजी, ये तो हर जगह हैं
पड़ी ही...।
अंधेरों में, कुपोषित
किसी बालिका सी...
जीर्ण.. शीर्णा....
वस्त्र भीतर, छुप छुपी सी...,
बूढ़ी भी समझो, घर में, चुप हैं
दबी सी...,
अजी, ये तो हर जगह हैं
पड़ी ही...।
तुम जहां हो,
ऊंचाई... है
जानता... हूँ!
ऊंचाई यह, और क्या है
बता, न! बस..., हवा ही है,
तेरे... मेरे सीध में,
और क्या है?
इस शुतुरमुर्गी! चाल में
सोच न!
तूं..., दूर है, किन! हकीकत से।
जानता... हूँ!
ऊंचाई यह, और क्या है
बता, न! बस..., हवा ही है,
तेरे... मेरे सीध में,
और क्या है?
इस शुतुरमुर्गी! चाल में
सोच न!
तूं..., दूर है, किन! हकीकत से।
नेता है तूं! इस देश का
नीचे उतर...,
शतुरमुर्गी चाल से
कभी जमीं पर....!
देख, कैसे जी रहा है, देश यह...!
कांपता इस ठंड में....,
प्रचंड है तूं....!
मानता हूं!
जानता है, सकल जग!
मैं क्या करूं....?
इस नाम का....
इस बात को, तूं सोच! तो
मैं...
कैसे कहूं? तेरे लिए वह शब्द!
घूम ले एक बार,
अपने क्षेत्र में
रात में,
देख कैसे सो रहे हैं
नग्न वे...
भूख लेकर, चिंता ग्रसित हो
पन्नियों में, टाट में।
किस प्रतीक्षा में,
क्या कभी भी भोर होगी।।।
उनके लिए भी....
रात में,
देख कैसे सो रहे हैं
नग्न वे...
भूख लेकर, चिंता ग्रसित हो
पन्नियों में, टाट में।
किस प्रतीक्षा में,
क्या कभी भी भोर होगी।।।
उनके लिए भी....
(विराम जानकर नहीं लगा है आप सोचे क्यों)
जय प्रकाश मिश्र
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