जिंदगी को, मै... भी, छू.. लूं पास.. से,
मित्रों, जीवन प्रेम का, सदा भूखा ही होता है, यह अपनापन के साथ एक अजीब सी निकटता चाहता है इसी पर अति संक्षिप्त शब्द-सुरसिका आपके लिए, छोड़ता हूं।
तुम मेरे कभी पास आओ
पास... आओ,
पास... आओ,
हिये बैठो..,
हिए... बैठो,
हिए... बैठो, दबे होठों,
खिलती कली सा मुस्कुराओ..
तुम मेरे.. कभी, पास.. आओ।
हाल पूछो, दिल का मेरे
कांपती,
इस पंखुरी का
और थोड़ा पास आओ!
गीत, मेरा..
दुल हिलकता, झुनकता !
कोई चयन कर लो, लरज़ती
आवाज में, अपनी
सुनाओ...
अंतरों से गुनगुनाओ...
कभी तो मुझको रिझाओ...
तुम, कभी मेरे पास आओ ।
हाथ पर...
मेरे.., हाथ रखो...
गर्म अपना, बर्फ सी इस ठंड में,
हाले दिल अपना सुनाओ...
बात कोई, ऐसी कह दो!
गुद गुदी, मुझको लगे..
हंस पड़ूं!
तेरे साथ में, मैं भी
आंसू भरे, इन नयन रे!
कभी तो, इतना हंसाओ...
तुम मेरे कभी पास आओ..।
जी उठूं!
अंदर कहीं मैं,
स्नेह... कुछ, ऐसे.. जताओ
जिंदगी को, मै... भी, छू.. लूं
पास.. से, इन अधर से
इतना मेरे, नजदीक आओ !
मधुर सपने देख लूं मैं
निझर झरती
नींद में
तुम! प्रेम कर, मुझको सुलाओ...,
तुम मेरे कभी पास आओ
तुम मेरे कभी पास आओ।
चाहती हूँ!
देख लूं, एक बार
प्रिय!
मैं....
प्रेम के, उस पार.. क्या है..?
ऐसे उठूं मैं, झूलती,
झूमती
झूला तेरे संग,
पलट जाऊं! स्थिति से..!
और तुम मेरे,... आओ...।
इसलिए तो चाहती हूँ
तुम मेरे कभी पास आओ
तुम मेरे कभी पास आओ।
जय प्रकाश मिश्र
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