प्रश्न हैं कुछ।
प्रश्न हैं कुछ अनुत्तरित गूंजते हैं शोर करते आज भी, अंतर्मनों में बालपन से, उम्र तक इस! ठीक वैसे ही पड़े हैं पाथर! हैं ये.. गलते नहीं, घिसते नहीं, पिघले नहीं.. हल 'समय' इनका नहीं है इस बात की मैं.. 'गवाही' हूँ! मैं कौन हूँ खोजता हूँ आज तक! पाया नहीं, शुरू से, ले अभी तक! बूढ़ा हुआ, पक गए विचार मेरे, अंग मेरे, दृष्टि मेरी, छोड़ कर साथी गए, सुरधाम कुछ..! और मैं.. यह प्रश्न लेकर आज भी बैठा हुआ वैसे का वैसा.. पाथर! हैं ये.. घिसते नहीं, पिघले नहीं.. गलते नहीं। क्या है ये..? हम 'जहां' हैं, 'जहां' कहते हैं इसे? क्या हो रहा है काम इसमें.. 'काम' कहते हम किसे संसार में..। जब घोलता हूँ एक में , इतने बड़े संसार को मिट्टी है बनती, मिट्टी ही बचती, मिट्टी ही सजती, जिंदगी के महल में देखा है मैने, सारे दरो-दीवार पे। और क्या है, मिट्टियों में.. अंतर्निहित! यह पूछता हूँ? ...