मन को समझ कर क्या करूंगा?
मित्रों यह रचना सबके लिए नहीं है। पर आप के लिए है। पढ़ें आपको अच्छी लगे तो अन्यथा छोड़ दें।
मन को समझ कर
क्या करूंगा?
रीता हुआ
रीता हुआ
अब,
कुछ.. समय से,
कुछ.. समझ से, बीता.. हुआ अब।
चल छोड़
ये..
पालें
पुरानी हो चुकीं
नाव का रुख मोड.., संझा हो गई अब।
लालिमा आकाश की यह सुरमई!
पंछियों की चहचहा-हट
गूंजती..
सब
लौटतीं
खुश घोंसलों में,
किस तरह ये देख अब..।
शांति को ले अंक में
अकेले..
अभ्यास कर..
प्रस्थान का उस परा में..
साथी बना, और साथ कर
उन कुछ जनों
का
जाल से जो
विश्व के इस, मुक्त हों अब..।
समेटने का विश्व को .
इसकी परिधि
से,
इस रंग से, इस रूप से
इन इंद्रियों से
उस
नाद का अवधान कर अब
केंद्र का तूं ध्यान कर अब।
छोड़ तृष्णा, प्यास.. सारी
बिमारी.. है,
मुक्त..
हो,
खिलता हुआ
कोई कमल बन अब
अंतरों में, दूर जल.. से,
दूर जग.. से विलग हो अब !
महक..! अपनी महक से,
आशीष दे,
संसार
को,
गहरे समझ अब..
नदी से
इस काल की
बाहर निकल अब..।
मुक्त क्या होता है हममें
मुक्ति क्या है,
मिल बैठ
संग
सत्संग कर अब...।
मन को समझ कर
क्या करूंगा?
रीता हुआ
कुछ
समय.. से,
कुछ समझ से, बीता हुआ अब।
जय प्रकाश मिश्र
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