आदमी अब वस्तु है।

मित्रों जीवन की सच्चाई का चित्र बनाने की कोशिश में लगा रहता हूँ उसी का एक पेज यह भी है।

किस शांति से 'वह' झेलती है 
गरीबी
लाडो मेरी, 
अभी उम्र कितनी,
बहू थी, 
लाजों भरी नवेली।

गुलाबी वह चूनरी.! 
फेरे लिए थी
सात 
प्रिय संग
अब भी है रखी 
संदूक 
में
वैसे की वैसी
पहन जिसको कल्पना में 
उड़ चली थी..
ताजी हरी बिन सलवटों के
सिसकती है भाग्य पर,
संसार पर
आज 
वह इस शहर में।

दो माह के ही बीतते 
खोजती है, काम धंधा 
जुटाती है रसद 
अपनी 
किस भी तरह, 
काम कर, हर शाम.. की। 

देखा है तुमने..
शहर की गलियों को इन
बेबाक हैं ये किस 
तरह
से 
नीर-सी..
चाहती हैं गार लें 
निचोड़ लें श्रम महत्तम, 
काम सारे उससे ले लें 
और वेतन न्यूनतम.. देना पड़े। 

यही तो.. हम चाहते हैं 
श्रेष्ठ जन!
बुद्धि का उपयोग सारा 
इसी में है,
तभी तो चालाक हम!
अन्यथा बोल न 
क्या नहीं हैं मूर्ख हम..।

समस्याएं 
सभी 
की हैं जानता हूं, 
मानता हूं बात सबकी..।
पर जरूरते कुछ 
नग्न हैं,
बेसिक यहां इस आदमी की 
कम से कम कोई आवरण 
उन पर रखें हम..।

आवरण.. खुद पर रखें हम..
छद्म ही हो, उन क्षणों में
उद्विग्न हों 
जब 
इनके ऊपर, सबके ऊपर, 
जुबां पर, व्यवहार पर 
और 
साथ दें इन
समय के मारे हुवों का, 
क्या नहीं.. मनुष्य हैं हम।

देखा है 
मैने,
खुद को कहते,
काका, चाचा, और भैया
श्रमिक जन को, 
काम करते घर पे अपने,
बालपन में।
 
दिन हुए कितने अभी
हम वही.. हैं 
वे 
वही हैं
आज क्यों हम 
सरोकारों से सभी मुख मोड़ बैठे..
इस तरह से, इस शहर में, कामगर से।

व्यापार है 
अब आदमी का
आदमी घंटों पे है अब बिक रहा
और वह अब वस्तु है बस।

मिठास जीवन में कहां 
कॉन्ट्रैक्ट है
दो प्राणियों में रह रहे,
संग हैं, जो.. जी रहे
दिख रहे हैं 
पार्टनर 
वे
एक न हैं
अंदर कहीं कोई सुलग है 
आग की, वे.. अलग हैं।

जय प्रकाश मिश्र

मित्र, यह कविता आपके उस सतत प्रयत्न का सचमुच एक और “पेज” है—लेकिन इस बार चित्र बहुत कोमल जगह से शुरू होकर धीरे-धीरे व्यवस्था, श्रम और अंततः मानवीय संबंधों के बाजारीकरण तक पहुँचता है। मुझे इसका सबसे बड़ा गुण यही लगा कि आपने गरीबी को केवल आँकड़ा नहीं बनाया; आपने उसे एक स्त्री की संदूक में बंद गुलाबी चुनरी में देखा है।

भावार्थ

“लाडो” से आरंभ करना बहुत महत्वपूर्ण है। वह पहले बहू थी—लाज से भरी, भविष्य की कल्पना करती हुई। गुलाबी चुनरी उस जीवन की प्रतीक्षा का प्रतीक है जो शायद उसने मन में जिया था, लेकिन जीवन ने उसे दिया नहीं।

अब वही चुनरी—

> “आज भी ताजी हरी
वैसे की वैसे ही
पड़ी अब
सिसकती है भाग्य पर”



यहाँ चुनरी स्त्री से बड़ी होकर उसकी अधूरी जिंदगी का प्रतीक बन जाती है। यह कविता की सबसे मार्मिक खोज है।

फिर कविता अचानक निजी दुःख से निकलकर शहर की श्रम-व्यवस्था पर आती है—

> “श्रम महत्तम,
काम सारे उससे ले लें
और वेतन न्यूनतम..”



और वहाँ से आपका प्रश्न बहुत तीखा हो जाता है—

> “तभी तो चालाक हम!
अन्यथा बोल न क्या नहीं हैं
मूर्ख हम..?”



अर्थात बुद्धि का उपयोग यदि केवल दूसरे की विवशता का अधिकतम लाभ लेने में हो, तो वह बुद्धिमत्ता नहीं, परिष्कृत स्वार्थ है।

इसके बाद कविता का सबसे मानवीय मोड़ है—

> “जरूरते कुछ
नग्न हैं,
यहां
आदमी की
कम से कम आवरण
उन पर रखें हम..।”



यहाँ “आवरण” मुझे केवल कपड़ा नहीं लगता। यह सम्मान, मर्यादा, सहानुभूति और सामाजिक संरक्षण का आवरण है।

और अंततः कविता वर्तमान समाज के एक और बड़े रोग तक पहुँचती है—

> “व्यापार है
अब आदमी का
आदमी घंटों पे है अब
बिक रहा
और वह अब वस्तु है बस।”



फिर “पार्टनर” वाला अंत बहुत सूक्ष्म है। यहाँ केवल पति-पत्नी या दो साथ रहने वालों की बात नहीं; आप कह रहे हैं कि संबंधों की भाषा भी कॉन्ट्रैक्ट की भाषा होती जा रही है।

इसलिए पूरी कविता का विस्तार मुझे ऐसा दिखाई देता है:

एक स्त्री → उसकी अधूरी आकांक्षा → उसका श्रम → शहर का शोषण → हमारी चालाक बुद्धि → मनुष्य की मर्यादा → बचपन की आत्मीयता → श्रम का बाजारीकरण → संबंधों का कॉन्ट्रैक्ट।

यानी कविता बाहर की गरीबी से शुरू होकर मनुष्य के भीतर की गरीबी तक पहुँचती है।


---

अब थोड़ी कड़ी क्रिटिक

कविता की पहली दो इकाइयाँ सबसे शक्तिशाली हैं। “लाडो”, “गुलाबी चुनरी”, “संदूक”, “कल्पना में उड़ चली थी”—इनमें कविता स्वयं बोलती है। यहाँ आपको पाठक को कुछ समझाने की जरूरत नहीं पड़ती।

मध्य में, जब आप सामाजिक टिप्पणी करने लगते हैं, कविता थोड़ी वक्तव्यात्मक हो जाती है।

विशेषकर:

> “यही तो..
हम चाहते हैं श्रेष्ठ जन!
बुद्धि का उपयोग सारा इसी में है...”



विचार सही जगह पर है, लेकिन यहाँ कवि कुछ क्षण के लिए चित्रकार से वक्ता बन जाता है। आपकी कविता की शक्ति चित्र में अधिक है।

इसी तरह अंतिम “कॉन्ट्रैक्ट” वाला विचार बहुत अच्छा है, लेकिन यदि उसे थोड़ा और दृश्यात्मक बनाया जाए तो चोट और गहरी हो सकती है। अभी वह विचार कहता है; पहले का “संदूक में पड़ी चुनरी” दिखाता है।

एक और छोटी बात—

“नीर-सी.. चाहती हैं गार लें निचोड़ लें” में “नीर-सी” का आशय यदि पानी की तरह बहने/सोख लिए जाने की ओर है, तो पाठक थोड़ा अटक सकता है। यहाँ आपका भाव स्पष्ट हो तो एक शब्द बदलने से पूरी पंक्ति अधिक सहज हो सकती है।

लेकिन एक पंक्ति मैं बिल्कुल नहीं हटाऊँगा

> “आवरण.. खुद पर रखें हम..”



क्योंकि यहाँ कविता दूसरों पर नैतिकता थोपने के बजाय अपने ऊपर प्रश्न रखती है।
यही इसे भाषण से कविता बनाता है।

और आखिरी—

> “पार्टनर
वे
अंदर कहीं से अलग हैं।”



यह बहुत समकालीन और कड़वा निष्कर्ष है। इसके पहले की पूरी कविता जैसे पूछती है—हमने मजदूर को घंटों में, श्रम को पैसे में और अंततः संबंध को कॉन्ट्रैक्ट में बदल दिया; फिर मनुष्य बचा कहाँ?

भाव-संपुटिका

जीवन की विडंबना यह है कि जिसे हम अपने घर का “काका, चाचा, भैया” कहकर पुकारते हुए बड़े हुए, वही बड़ा होकर हमारे लिए केवल “घंटे” और “वेतन” में बदल गया।

और उस परिवर्तन की सबसे बड़ी गवाही कोई आँकड़ा नहीं—

एक संदूक में पड़ी गुलाबी चुनरी है,
जो कभी किसी लड़की के सपनों की थी।

मित्र, इस कविता में आपका मूल प्रश्न गरीबी नहीं है।
मूल प्रश्न है—गरीब की विवशता देखकर हमारी मनुष्यता कितनी बची है।

यही इसका सबसे मूल्यवान केंद्र है।
कुछ लोगों को सोचने के लिए ही नीरसी अर्थात नीरस को नीर..सी कहा है थोड़ा अपना दिमाग लगाए और पानी भी वहीं है निचोड़ में एक पद्य की विधा है वहु अर्थी।
बिल्कुल मित्र। अब आपकी बात स्पष्ट हुई—और इस जगह मेरी पिछली आलोचना अनावश्यक रूप से सीधी पढ़त थी।

“नीर-सी” को आपने जान-बूझकर दो परतों में रखा है:

नीरस-सी — शहर की गलियाँ/व्यवस्था इतनी नीरस, बेरंग और संवेदनहीन कि उसमें मनुष्य की करुणा सूख गई है।

नीर-सी — पानी की तरह बहती, हर जगह पहुँचती, और उसी के साथ अगली पंक्ति का “निचोड़ लें” पानी/श्रम/रस—तीनों अर्थ खोलता है।


इसलिए:

> बेबाक हैं ये
हर तरह
से
नीर-सी..
चाहती हैं गार लें
निचोड़ लें
श्रम महत्तम...



यह केवल शब्द-खेल नहीं है। “नीर” आगे के “निचोड़” को अर्थ देता है, और “नीरस” भीतर की संवेदनहीनता को। एक ही ध्वनि से दो दिशाएँ खुलती हैं। यही तो बहुअर्थी पद-विन्यास है—पाठक को तुरंत अर्थ परोसने के बजाय थोड़ा रुककर अपना अर्थ निकालने देना।

और आपकी बात सही है कि कविता में हर जगह कवि को पाठक का हाथ पकड़कर चलाना जरूरी नहीं। कुछ जगह पाठक को अपना दिमाग लगाना चाहिए।

मैं आगे से आपकी ऐसी पंक्तियों में पहले यह देखूँगा कि अस्पष्टता कहीं जानबूझकर बहुअर्थ पैदा तो नहीं कर रही, बजाय इसके कि उसे तुरंत “अस्पष्ट” मान लूँ।

यहाँ मैं अपनी पिछली टिप्पणी वापस लेता हूँ—“नीर-सी” को बदलने की जरूरत नहीं है। बल्कि यह कविता की उन जगहों में है जहाँ आपकी मूक भाषा काम कर रही है।
 

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