मैं मुस्कुराहट! तेरी हूं, तेरी खुशी हूँ:

मित्रों पढ़ें और आनंद लें। 

खीझ कर हालात से, 
अलग होकर आप से,
एक दिन जब शाम को
बैठा अलग हो 
जिंदगी की दौड़ से,
और पूछ बैठा, 
उसी से
क्या चाहती है, 
अब बता तूं!
आखिर मेरी इस जान से..?

वह चुप रही, कुछ भी न बोली
देर तक, एकटक! 
मुझे देखती
चटकती कोई कली हो,
चटक कर मुस्कुरा कर बोल दी,
मैं मुस्कुराहट! 
तेरी हूं, तेरी खुशी हूँ।

हर शख्श में, मैं गूंजती हूँ,
सोच न! 
मैं न रहूं! तो क्या हो तुम! 
क्यूं परेशां है, 
क्या थक गया है? 
मुझसे तूं?

तो बोल न! आज़ाद कर दूं 
अभी इस क्षण 
क्या तुझे.. जंजाल से..?
आघात से, 
इन नश्तरों से कष्ट के..!

मैं हिल गया, अरे नहीं री..
ऐसा नहीं,
अभी काम है, 
सामान है, घर मेरा है
मेरी प्रेयसी है
कुछ पुराना है 
ठिकाने 
उसे लगाना है, 
बच्चे हैं मेरे.. छोटे छोटे
अच्छी है तूं.. अच्छी है तूं!

फिर खीझ कर हालात से, 
अलग होकर आप से,
एक दिन जब 
शाम को
बैठा हो
जिंदगी की दौड़ से
और पूछ बैठा, खुद से मैं 
क्या चाहता हूँ छोड़ना
उत्तर मिला.. 
अरे अभी ना.. अरे अभी ना।।।

एक बच्चा खेलता है,
खेल अपना,
मानकर
वह 
सत्य उसका, 
सत्व अपना डालता है
किस तरह, किस समर्पण से
ध्यान से कभी देखना..!

रोज उसको छोड़ता है, 
मिट्टी है यह..
यह जानता है
बनाता है, 
घेर 
अपनी बालुका में
उड़ा देती हवा उसको एक पल में..

रोता है कैसे,
हम 
रो रहे हैं, 
जिंदगी में आज जैसे..

फिर खीझ कर हालात से, 
अलग होकर आप से,
एक दिन जब शाम को
बैठा अलग 
हो 
जिंदगी की दौड़ से
देखकर रोते हुए बच्चे को उस 
मै..रो दिया, सत्य कहता हूँ मैं तुमसे..
माटी ही था सब, साफ मुझको दिख गया।


समय क्या है,
द्वंद्व उड़ता विचारों में,
संघर्ष खुद से
संघर्ष खुद में, 
संसार में..
और जीवन समय है, 
क्या इस लिए यह द्वंद्व है।

एक दिन जब 
शाम को
बैठा 
अलग 
अपने ही प्रिय मैं साथ में
जिंदगी को खोलता 
इसी में मैं डूबता
कहां जाता, 
इसी में ही खो गया..
बादल बना सा हवा में मैं मिल गया..।

अंत में 
मैं सोच था 
और क्या था जिंदगी में..
बोल न, सोच में ही मिल गया..
क्या एक बादल वहां ऊंचे बन गया।

जय प्रकाश मिश्र

मित्र, यह कविता मुझे आपकी अब तक की कई रचनाओं के बीच एक आंतरिक यात्रा जैसी लगती है। शुरुआत में आदमी जीवन से खीझकर जीवन से ही पूछता है—“तू चाहती क्या है?” और अंत तक वही आदमी समझता है कि जीवन कोई बाहर रखी हुई वस्तु नहीं, बल्कि समय, द्वंद्व, खेल, लगाव, छोड़ना और अंततः विलीन हो जाना—सबका एक साथ बहना है।

भाव-सरणिका

क्रम कविता का पड़ाव भीतर का भाव

1 “क्या चाहती है, अब बता तू!” जीवन से थका मन जीवन से ही उत्तर माँगता है
2 “मैं मुस्कुराहट! तेरी हूँ” जीवन का पहला उत्तर—जीवन का मूल स्वर दुःख नहीं, मुस्कुराने की क्षमता है
3 “आज़ाद कर दूँ अभी” जीवन यदि जंजाल है तो उससे मुक्त होने की संभावना भी उसी के भीतर है
4 “अभी काम है, सामान है...” मनुष्य जानता है कि छोड़ना है, पर संबंध और उत्तरदायित्व उसे रोकते हैं
5 “अभी ना.. अभी ना” मृत्यु/त्याग की अंतिम स्वीकृति अभी टलती रहती है
6 बच्चे का बालुका-घर बच्चा जानता है कि खेल मिट जाएगा, फिर भी पूरे समर्पण से बनाता है
7 “रोता है कैसे...” नश्वरता जानते हुए भी खोने पर हमारा रोना—मानव जीवन का मूल द्वंद्व
8 “समय क्या है?” समय स्वयं संघर्ष और द्वंद्व को जन्म देता हुआ अनुभव बनता है
9 “जिंदगी को खोलता / इसी में डूबता” जीवन को समझने की कोशिश में व्यक्ति उसी जीवन में विलीन होने लगता है
10 बादल बन जाना अंततः अलग “मैं” का विलय—जीवन को समझना शायद उसे पकड़ना नहीं, उसमें घुल जाना है


कविता का केंद्रीय सत्य

मुझे इसका सबसे सुंदर सूत्र बच्चे के खेल में मिलता है।

बच्चा जानता है कि—

> “मिट्टी है यह..
...उड़ा देती हवा उसको एक पल में..”



फिर भी वह पूरी तन्मयता से घर बनाता है।

यही तो जीवन है।

हम भी जानते हैं कि घर, सामान, संबंध, शरीर, उपलब्धियाँ—सब कभी न कभी छूटेंगे, फिर भी उन्हें प्रेम से बनाते हैं। यही विरोधाभास जीवन को केवल “माया” कहकर समाप्त नहीं होने देता।

और आपकी पहली बातचीत का प्रश्न—“क्या छोड़ना है?”—अंत में बदल जाता है:

कुछ छोड़ना नहीं था;
बस यह समझना था कि पकड़कर रखा हुआ कुछ भी स्थायी नहीं है।

इसलिए अंतिम बादल बहुत सुंदर है। पहले आदमी जीवन से अलग बैठकर उसे समझना चाहता है; अंत में वह स्वयं—

> “कोई बादल हवा में मैं मिल गया।”



अर्थात द्रष्टा और दृश्य के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।

एक आलोचनात्मक बात

कविता का भाव बहुत गहरा है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि अंतिम दो-तीन दार्शनिक अनुच्छेद कुछ जगह विचार को सीधे बोल देते हैं।

उदाहरण—

> “समय क्या है,
द्वंद्व उड़ता आप में,
संघर्ष खुद में, संसार में..”



यह विचार महत्वपूर्ण है, लेकिन बच्चा, बालुका-घर और हवा का बिंब इससे अधिक शक्तिशाली है। आपकी कविता जब दिखाती है, तब वह बहुत प्रभावशाली है; जब वह अपने अर्थ को समझाती है, तब थोड़ी कमजोर पड़ती है।

फिर भी इसे काटने की जल्दी मैं नहीं करूँगा। क्योंकि यह कविता आपकी चिंतन-धारा भी है और केवल दृश्य-कविता नहीं।

और बार-बार लौटती पंक्तियाँ—

> “फिर खीझ कर हालात से,
अलग होकर आप से...”



बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह refrain केवल पुनरावृत्ति नहीं है; हर बार लौटने पर “मैं” बदल चुका होता है।

पहली बार वह खीझा हुआ है।
दूसरी बार वह छोड़ने की सोच रहा है।
तीसरी बार बच्चे को देखकर पिघल गया है।
अंतिम बार वह स्वयं को खो चुका है।

यही पुनरावृत्ति कविता की आंतरिक सीढ़ी बनाती है।

संक्षिप्त भाव-संपुट

जीवन से थका आदमी जीवन से पूछता है—तू चाहती क्या है?
जीवन मुस्कुराकर कहता है—मैं तेरी खुशी हूँ।
वह छोड़ना चाहता है, पर बच्चे को खेलते देख समझता है कि नश्वरता जानते हुए भी पूरे मन से जीना ही जीवन है।
और अंततः जीवन को समझने वाला व्यक्ति जीवन से बाहर नहीं जाता—वह उसी में बादल की तरह घुल जाता है।

मेरे लिए इस कविता का अंतिम मोती है:

> जीवन को जीतना या छोड़ना नहीं है;
उसे इतना जीना है कि अंत में
“मैं” और “जीवन” के बीच की दूरी ही मिट जाए।


"मैं मुस्कुराहट! तेरी हूं, तेरी खुशी हूँ" :



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