कितने निमंत्रण बाँटती हो।

जीवन के कुछ गूढ़ तत्व हैं उन्हीं में से एक पर यह लाइने आपके लिए।

कितने निमंत्रण बाँटती हो, 
ख्वाब के तुम, 
निमिष 
भर 
में,
पर लगा तुम
कल्पना के उड़ाती मुझे 
दूर उस नीले... गगन में।
 
दृष्टि के निक्षेप में
जोड़ा कभी 
है, 
मासूम मन,
कितने गिराती 'हरीले' तुम!
 
जो देखते चितपावनी 
चितवन तेरी.. 
आह भरते 
सभी 
हैं 
अंदर कहीं..! से।

कभी सोचना 
मेरे कहे
हृदय कितने.. तोड़ती हो, 
फूल.. से तुम,
मुस्कुराती . 
तुम्हे.. देख लें जो..
बचा कोई.. एक, 
होगा
शक मुझे है..आज तक, 
आहत हुए बिन!

कौन हो तुम! 
क्यों है ये..
प्रिय..
नहीं लगता मन 
सभी का इस जहां में..
देख लें 
जो 
दृष्टि भर.. तुम्हे.  
आभरण में, स्वस्थचित्ता 
किसी.. भी दिन।

मन है क्या यह..
रूप है क्या
संबंध 
इनके बीच कैसा..
प्यास यह, और आस है क्या..
सांस का कोई खेल है क्या..
एकाग्रता इस दृष्टि की
शून्यता संवेग की
शांत मन में
मेल
है क्या..
आनंद इनके बीच बसता 
कहीं है क्या..?

तुम और क्या हो..
सोचता हूँ
पास से तुम्हे देखता हूँ
दूर.. जग अब, आप में हम..
समाधि की सी चाह में.. हम
मिलन है वह..
पिघलना 
है, 
स्वांस ही खेल है सब..
शांति ही तो चाह थी, 
और उसकी
ललक तुम प्रिय!
कितने निमंत्रण बाँटती हो, 
ख्वाब के तुम।

जय प्रकाश मिश्र

मित्र, यह कविता आपके यहाँ बार-बार लौटने वाले “प्यास–आकर्षण–मिलन–शांति” के सूत्र को इस बार बहुत सूक्ष्म स्तर पर पकड़ती है। यहाँ प्रिय केवल कोई सुंदर व्यक्ति नहीं रह जाता; धीरे-धीरे वह मन को उसकी अपनी एकाग्रता, विस्मृति और अंततः शांति की ओर ले जाने वाला निमंत्रण बन जाता है।

कविता का गूढ़ भाव

आरंभ में आकर्षण बहुत मानवीय है—

> “कितने निमंत्रण बाँटती हो,
ख्वाब के तुम,
निमिष भर में...”



एक दृष्टि, एक पलक, एक चितवन—और मन के भीतर कितनी संभावनाएँ जन्म ले लेती हैं। आप इसी को आगे—

> “कितने गिराती 'हरे' हो तुम!”



कहकर सुंदर ढंग से पकड़ते हैं। यहाँ “हरे” को मैं केवल रंग नहीं मानता; हरापन = मन में नई कल्पना, नई आशा, नई कोमलता उगना भी पढ़ा जा सकता है।

फिर कविता प्रेम से आगे निकलती है। प्रश्न उठते हैं—

> “मन है क्या यह..
रूप है क्या
संबंध
इनके बीच कैसा..
प्यास यह, और आस है क्या..”



यहीं कविता अपने वास्तविक क्षेत्र में प्रवेश करती है। आप आकर्षण को समझना चाहते हैं—यह देह है, मन है, दृष्टि है, प्यास है, आस है, श्वास है या इन सबके पार कोई एकाग्रता?

और फिर बहुत सुंदर छलाँग है—

> “दूर.. जग अब, आप में हम..
समाधि की सी चाह में.. हम”



यहाँ “प्रिय” धीरे-धीरे वस्तु से अवस्था बन जाती है।

अंततः—

> “मिलन है वह..
पिघलना है,
स्वांस ही खेल है सब..
शांति ही तो चाह थी, और उसकी
ललक तुम प्रिय!”



मेरे लिए यही कविता का मर्म है।

हम जिसे प्रेम, आकर्षण या मिलन समझते हैं, उसके भीतर शायद मूल प्यास शांति की ही होती है। प्रिय उस शांति का कारण नहीं, उसका निमंत्रण बन जाता है।

और इसी कारण आरंभ की पंक्ति अंत में फिर लौटती है—

> “कितने निमंत्रण बाँटती हो,
ख्वाब के तुम।”



अब उसका अर्थ बदल चुका है। आरंभ में वह स्वप्न का निमंत्रण था; अंत में वह स्वयं से मिलने का निमंत्रण हो जाता है।

मेरी एक सच्ची आलोचनात्मक बात

इस कविता की ताकत उसका प्रश्नमय मध्य भाग है, लेकिन वहीं उसका जोखिम भी है।

“मन क्या है, रूप क्या है, संबंध क्या है, प्यास क्या है, श्वास क्या है, एकाग्रता क्या है...” — ये प्रश्न गहरे हैं, लेकिन बहुत सारे प्रश्न लगातार आने पर कविता कुछ क्षण के लिए कविता से दार्शनिक नोट की ओर झुकती है।

फिर भी मैं इन्हें हटाने के पक्ष में नहीं हूँ। क्योंकि यही आपकी खोज है। केवल इतना ध्यान रहे कि इनके बीच मौन की जगह बनी रहे। आपने वैसे भी “..” और छोटे-छोटे टूटे हुए पदों से वह जगह बनाई है।

विशेष रूप से—

> “शून्यता संवेग की
शांत मन में
मेल
है क्या..”



यह कठिन है, लेकिन इसी कठिनाई में कविता का गूढ़ द्वार है। इसे पाठक को तुरंत समझाना नहीं चाहिए।

और “स्वांस ही खेल है सब” के बाद “शांति ही तो चाह थी” बहुत अच्छा उतरता है। यहाँ देह, प्राण, मन और प्रेम एक ही धारा में आ जाते हैं।

भाव-संपुटिका

मेरी दृष्टि में इस पूरी कविता को एक सूत्र में ऐसे बाँधा जा सकता है:

एक चितवन पहले स्वप्न जगाती है,
स्वप्न प्यास जगाता है,
प्यास मन को एकाग्र करती है,
एकाग्रता में जग दूर होने लगता है,
और जहाँ ‘मैं’ थोड़ा पिघलता है,
वहीं मिलन शांति में बदल जाता है।

प्रिय तब केवल प्रिय नहीं रहता—
वह भीतर की उस शांति का निमंत्रण बन जाता है जिसे हम बाहर खोजते रहे।

मित्रों को मोती

कभी-कभी किसी की एक दृष्टि
हमारे भीतर इतने ख्वाब जगा देती है
कि हम उसे ही प्रेम समझ बैठते हैं।

पर शायद प्रेम की गहराई में
रूप से अधिक प्यास है,
प्यास से अधिक एकाग्रता,
और एकाग्रता के पार
वह शांति,
जहाँ ‘मैं’ थोड़ा पिघल जाता है।

शायद प्रिय वह नहीं
जिसे हम पा लेना चाहते हैं—

प्रिय वह है
जो हमें हमारे भीतर की शांति का
निमंत्रण दे जाता है।मित्र, इस कविता की सबसे सुंदर उपलब्धि मेरे लिए यही है कि आपने आकर्षण को दबाया नहीं, उसे सीढ़ी बनाया है—रूप से मन, मन से प्यास, प्यास से एकाग्रता और वहाँ से शांति तक। यही इसे केवल प्रेम-कविता न रहने देकर जीवन के “गूढ़ तत्व” की कविता बनाता है।



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