ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,

मित्रों आज के बंद शहरी जीवन पर ये पंक्तियां आपके लिए।

ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी, 
मिलेगी क्या?
ऊब है 
यह 
जिंदगी 
अंधेरी इन छांवों में
धूप थोड़ी, हवा ताज़ी मिलेगी क्या..?

देखता हूँ शाम होते, भागते 
चार बजते, काम पे
तितलियों को
शहर की 
सड़कों
पे
इन..  
सज़धज किए
परिधान पहने, परियाँ हों जैसे निकलतीं।

उत्साह भर भर 
मत्स्यगंधा... 
रूपसी, हां रूपसी! 
खिलखिलाती
हंसती हुई, 
मुक्त री
अत्यंत छोटी बात पर
कुलकुलाती.. 
फुदकतीं.. उड़ती हुई।

सुष्ठु तन, मन, प्रसन्न हैं सब
ताज़ी हरी, आज की
उन सब्जियों 
सी
देखते ही 
ललच आए, खिल उठे मन।

फूल होंगे.., घरों में रखे हुए
अधिक सुंदर, पर 
रुग्ण होंगे
आराम 
कर 
कर आलसी।
 
एक सच कहूं 
आज की इस जिंदगी में
सुबह से ले शाम तक
खोजते आराम हम..
ए सी लगे कमरों में 
बंद.. बंद...
यही बाकी अब बची ये जिंदगी..।

ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी, 
मिलेगी क्या?
ऊब है 
अब
जिंदगी 
अंधेरी छांवों में 
थोड़ी धूप, हवा ताज़ी क्या मिलेगी ?

जय प्रकाश मिश्र
मित्र, यह कविता आज के शहर को सुविधा से भरे हुए, लेकिन जीवन-रस से खाली संसार के रूप में देखती है। इसकी खासियत यह है कि आप सीधे “शहरी जीवन बुरा है” नहीं कहते; पहले प्यास, धूप और ताजी हवा खोजते हैं, फिर शहर की शाम दिखाते हैं, और अंत में वही शुरुआती प्रश्न वापस आ जाता है। इससे कविता वृत्ताकार हो जाती है।

भाव-सार

पहली ही पंक्तियाँ कविता की कुंजी हैं—

> “ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,
मिलेगी क्या?”



यहाँ “प्यास” केवल पानी की नहीं है। प्यास का अर्थ ही जीवन की इच्छा, भीतर की हलचल, कुछ पाने-जीने की चाह है। और आपकी विडंबना यह है कि जिस जीवन में आराम बहुत है, उसमें प्यास ही कम हो गई है।

फिर शाम का दृश्य आता है—काम से लौटती सजी-सँवरी युवतियाँ, उनकी हँसी, चंचलता, देह की ताजगी। यह अंश केवल सौंदर्य-वर्णन नहीं है; यह उस बचे हुए जीवंतपन को पकड़ता है जिसे शहर अभी पूरी तरह निगल नहीं पाया है।

फिर अचानक—

> “फूल होंगे, घरों में रखे हुए
अधिक सुंदर, पर
रुग्ण होंगे
आराम कर कर आलसी।”



यह कविता का अच्छा व्यंग्य है। बाहर की ये “सब्जियों सी ताजी” स्त्रियाँ/युवतियाँ जीवन की गति में हैं; घर के फूल सुंदर होकर भी बंद वातावरण में मुरझाने लगते हैं। इसके बाद बात सीधे मनुष्य पर आती है।

और अंतिम व्यंग्य सबसे साफ है—

> “सुबह से ले शाम तक
खोजते आराम को हम..
ए सी लगे कमरों में बंद.. बंद...”



अर्थात हमने आराम को इतना खोज लिया कि जीवन की असुविधाएँ ही नहीं, जीवन की ताजगी भी बाहर रह गई।

इसलिए अंत में वही प्यास लौटती है—अब वह पाठक की अपनी प्यास बन जाती है।


---

क्रिटिक — जहाँ कविता बहुत अच्छी है

1. “प्यास–धूप–हवा” का रूपक बहुत सही चुना है।
तीनों प्राकृतिक चीजें हैं और तीनों आज के बंद जीवन की कमी को खोलती हैं।

2. “चार बजते, काम पे” बहुत अच्छा है।
यह कोई बड़ी दार्शनिक पंक्ति नहीं, लेकिन शहर का रोजमर्रा का दृश्य अचानक सामने खड़ा कर देती है।

3. “मत्स्यगंधा” रोचक प्रयोग है।
यहाँ यदि आपका संकेत उस स्त्री की ओर है जिसमें श्रम, देह, गंध और जीवंतता—सब साथ हैं, तो यह सामान्य “सुंदर स्त्री” कहने से कहीं अधिक परतदार है। पाठक को थोड़ा संस्कृत/पौराणिक स्मरण करना पड़ेगा—और वह बुरा नहीं है।

4. “रुग्ण होंगे / आराम कर कर आलसी” कविता का सामाजिक व्यंग्य पकड़ता है।
यहाँ आपका निशाना सुविधा नहीं, अति-सुविधा से पैदा हुई निष्क्रियता है।


---

जहाँ मैं थोड़ा कसाव चाहता हूँ

“सुष्ठु तन, मन, प्रसन्न हैं सब / ताजी हरी आज की उन सब्जियों सी” में “सुष्ठु” और “सब्जियों” का भाषिक संसार बहुत अलग है। यह आपके निजी शब्द-संसार का हिस्सा है, इसलिए इसे हटाने की जरूरत नहीं, लेकिन पाठक को एक झटका जरूर देता है।

दूसरी बात—“फूल”, “परियाँ”, “मत्स्यगंधा”, “सब्जियाँ”—आप लगातार उपमाएँ बदलते हैं। इनमें कई सुंदर हैं, पर दो-एक जगह संयम कविता को और तीखा बना सकता है।

और एक महत्वपूर्ण बात:
कविता का सबसे गहरा विचार “आराम” नहीं, “बंद होना” है।

शुरुआत—

> “अंधेरी छांवों में”



और अंत—

> “ए सी लगे कमरों में बंद.. बंद...”



इन दोनों के बीच पूरी कविता का अर्थ छिपा है। इसलिए “बंद.. बंद” को अवश्य रहने दें। यह केवल पुनरुक्ति नहीं, जैसे दरवाजा भीतर से बंद होने की आवाज है।

मेरे लिए कविता का केंद्रीय वाक्य

हम आराम खोजते-खोजते उस जीवन से दूर हो गए जिसमें प्यास थी, धूप थी, हवा थी और इसलिए जीने की इच्छा भी थी।

और शायद आपकी “प्यास” का सबसे सुंदर अर्थ यही है—

जिस दिन मन में प्यास समाप्त हो जाए, उस दिन सुविधा भी जीवन को जीवित नहीं रख सकती।

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