काशी है क्या?
एक दिन डगमग हुई,
उल्लास भर
उद्यत हुई,
उद्यत हुई,
वह..,
नाचने को,
डमडम-डमाते डमरूओं
नाचने को,
डमडम-डमाते डमरूओं
की थाप पर,
नाथ, भोले.. नाथ के।
नाथ, भोले.. नाथ के।
कौन है?
कुछ बता तो
बोलती, क्यों है नहीं,
मुस्कुराती खड़ी है, इतने दिनों से
श्रीनाथ जी की नाच को
इस तरह
तूं देखकर बस नाचते।
काशी है क्या! जो डोलती है,
पिनाकी के, घुंघरुओं संग,
डमरूओं की,
डमडमाती,
थाप पर..
उन आदि शिव के,
हुलसती है नित्य ही तुम भोर में।
हुलसती है नित्य ही तुम भोर में।
लहरियां, गंगा की जिसको जगाती हैं
क्या वही काशी है तूं?
लोग कहते,
शूल
शूल
पर अटकी पड़ी तूं
आदि से, उन आदिशिव के,
शूल तीनों, बे-असर
आदि से, उन आदिशिव के,
शूल तीनों, बे-असर
क्या इसलिए तेरे लिए।
देखता हूं,
सत्व, तम, रज,
सत्व, तम, रज,
राज अपना खोलते हैं!
सामने तेरे! खड़े हैं
और तूं भागीरथी की गोद में
मस्त खुद में,
साथ पा अन्नपूर्णा संग आदिशिव का।
बोल तो, कौन है तूं..
काशी है क्या..
स्पर्श
कर…
जिसको है, गंगा बह रही
आदि से ले, आज तक पावनमयी,
बह रही है आदि से संग ले
इन गंग को
बांधे हुए है हृदय उसका
पाश से, शिव जटा में
कौन है तूं बोलती कुछ क्यों नहीं!
काशी है क्या..
स्पर्श
कर…
जिसको है, गंगा बह रही
आदि से ले, आज तक पावनमयी,
बह रही है आदि से संग ले
इन गंग को
बांधे हुए है हृदय उसका
पाश से, शिव जटा में
कौन है तूं बोलती कुछ क्यों नहीं!
काशी है क्या?
मुक्ति है,
जो अंत है, हर अंत का
हर हर हराता शंभु का शिवनाद है तूं
कौन है तूं बोल कुछ तो।
हर हर हराता शंभु का शिवनाद है तूं
कौन है तूं बोल कुछ तो।
जय प्रकाश मिश्र
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