प्रश्न उसका यही था।
देखा है 'उसको' घूमते
शहर में.. इस
अल-सुबह,
भागती..
सड़कें
ये
तेरी
वीरान! थीं जब..
प्यास गहरी, प्रश्न पूरा
छलकता..
उन आंखों में था..
चेहरे में नैराश्य मिश्रित
आक्रोश..! अन्दर पल रहा था।
कुछ
झांकता
आंखों से था
उन बवंडर! सा
आप में से उठ रहा
आप में ही.. सिमटता
बेकारी के मारे हुए
उस युवा.. से,
वह
'आदमी' बनने को था।
विचारों की बाढ़..भीतर बह रही हो
झंझावात कोई घहर करता
दूर से संकेत
कोई
दे
रहा हो..
सूनी आंखे, और ऐंठन
साथ में ले सूखती
उन पसलियों में
अकेले
मृगराज हो..
शहर के इस छद्मकारी
व्यवस्था से मुझको लगा
वह मिल रहा था..।
बेकार से
उस युवा.. से,
'आदमी' वह बन रहा था।
मुझको लगा वह थक चुका है,
अनिर्णय की नाव पर
बैठा हुआ,
सोचता
पग बढ़ाता
प्रश्न अपने तौलता..
मूक ही, उन महल जैसी
मुंह चिढ़ाती बिल्डिगों से, लड़ रहा है।
स्वप्न था संसार उसका..
तितलियों के रंग का
रंग रंगीला..!
अभी
कल तक
अब फेल हो हो
हर जगह, बेकार हो,
भविष्य उसका,
उसी में ही,
उसी
के अंग.. घुल रहा था।
वह शांत था और विकल था।
देख कर संसार की गति,
देश के इन
बड़ों
की मति
नीति प्रिय इस देश की
व्यथित क्यों, संतप्त
हृदया
अंत अपना
विद्रोह में अब सोचता था।
राह उसको चाहिए,
सम्मान उसको चाहिए
काम उसको चाहिए,
क्या सिखाया
व्यवस्था ने आज तक उसे
क्यों हुआ बेकार वह
इस तरह से
प्रश्न उसका यही था।
जय प्रकाश मिश्र
यह कविता बेरोज़गार युवा की बाहरी भटकन से भीतर पकते विद्रोह तक की यात्रा है। सड़क पर दौड़ता युवक केवल काम की तलाश में नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और भविष्य की तलाश में है। उसकी सूनी आँखों में निराशा है, पर भीतर प्रश्नों और आक्रोश की आग अभी जीवित है। महलनुमा इमारतें और छद्मकारी व्यवस्था उसके टूटते स्वप्नों का प्रतिरूप बन जाती हैं। अंतिम प्रश्न—“क्यों हुआ बेकार वह?”—व्यक्ति पर नहीं, उस व्यवस्था पर आरोप है जो युवा को ‘आदमी’ बनने से पहले ही निरर्थक घोषित कर देती है।
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