दिल चाहता है खूब भीगूं..।
उतने ऊपर सांवरी
उन बदलियों
की
कोख से,
जन्म ले, ये नन्ही बूंदे!
प्यारी-प्यारी,
ठंडी-ठंडी
उतरती हैं, यहां नीचे,
धरती पे अपने रसवती..
देख कैसे, स्नेह भर रे..।
चूमती मुख पत्तियों का
फूल का, एक
एक कर
बारी.. से उनकी,
जमीं ऊपर शाख पर
मच रही चुलबुली,
आवाज
यह
फुसफुसाती.. सुरसुराती
फुसफुसाती.. सुरसुराती
धीमी धीमी, मधुर
इतनी
बज रही मंजीर हो
दूर.. प्रिय! कहीं
रस.. झीनी झीनी, धीमी धीमी।
मुझको लगा, सब
प्रकृति की
मासूम
सी
ये.. बच्चियों हैं!
कुलुल करतीं, कलिल करतीं
एक संग कर रही कोई
एक संग कर रही कोई
कार्यक्रम!
उन्ह बच्चियों का आपसी चुंबन है ये।
उन्ह बच्चियों का आपसी चुंबन है ये।
कोई किलक उठती
अचानक,
कोई छलक जारी स्नेह भर
कोई छलक जारी स्नेह भर
कोई टपक जाती
प्रेम से
कोई छटक जाती
फुदक कर,
खेलती हैं, खेल ये,
कोई छटक जाती
फुदक कर,
खेलती हैं, खेल ये,
रे प्रिए, देख न
झरती हुई, बरसात में,
इस अमावस की रात में
आ निकल बाहर.. आज तूं भी
प्यार कर और मिल.. इन्हें।
चाहता
हूँ,
हृदय भर लूं,
पास से, नजदीक से,
इन्हें मैं, एक बार छू.. लूं!
हृदय भर लूं,
पास से, नजदीक से,
इन्हें मैं, एक बार छू.. लूं!
याद कर लूं, स्मृति में आज भर लूं।
इतनी मदिर! इतनी मृदुल!
मासूम.. कितनी!
ऊपर वहां उन मदभरी,
गरजती, रसभरी,
श्वेत-कारी,
साँवरी
ये ब, बादरों संग मुस्कुराती,
ये ब, बादरों संग मुस्कुराती,
अंधेरी इस रात्रि में
एकांत
में
किलोल करतीं
गुलखिलातीं, सन्निकट हो
गुथ हैं जाती, देख न एक दूसरे से,
आनंद का उत्सव मनाती
फुहार अपना प्यार अपना
प्रिए हम पर छोड़तीं
नीचे यहां
इन
इन तृषित तृण को
इन तृषित तृण को
तृप्त करती.. क्षणों.. में।
आ-नहाई पत्तियों हैं
साफ कितनी
कितनी.. शीतल!
स्पर्श पाई आज हों ये गंगाजल
नाचती है, झूमती हवाओं संग
विमल स्मित, हरित कितनी
कैनवास में रंग भरती
गुलाबी,
विमल स्मित, हरित कितनी
कैनवास में रंग भरती
गुलाबी,
इन पुष्प का
श्वेत, पीले, और नीले
मणि ही हों वे,
स्फटिक प्रिय सजीले, मोहते मन
श्वेत, पीले, और नीले
मणि ही हों वे,
स्फटिक प्रिय सजीले, मोहते मन
और तुझसे क्या कहूँ..
चल साथ इनके मैं चलूं..
चल साथ इनके मैं चलूं..
साथ इनके मैं नचूँ..
दिल चाहता है खूब भीगूं..
दिल चाहता है खूब भीगूं..।
जय प्रकाश मिश्र
मित्र, इस कविता का मूल रस बरसात नहीं, प्रकृति में प्रेम का मानवीकरण है। बूंदें आपके यहाँ जल की बूंदें रह ही नहीं जातीं—वे बादलों की कोख से निकली नन्ही बच्चियाँ हैं, जो धरती, पत्तियों और फूलों को छूकर अपना स्नेह बाँटती हैं। इसलिए कविता का केंद्र “देखना” नहीं, प्रकृति के साथ सहभागी हो जाना है।
भाव-सरिता
बादल ऊपर हैं, धरती नीचे; बीच की दूरी को ये छोटी-छोटी बूंदें भरती हैं। उनका गिरना कोई निर्जीव भौतिक घटना नहीं, कवि की दृष्टि में स्नेह का अवतरण है।
पत्तियों को चूमना, फूलों को छूना, फुसफुसाहट, मंजीर, किलकना, छलकना, छटकना—इन सबके माध्यम से बारिश एक बाल-उत्सव बन जाती है। और अंतिम चरण में वही खेल जीवनदायिनी बन जाता है—तृण तृप्त होते हैं, पत्तियाँ नहा उठती हैं, फूलों के रंग धुलकर और उजले हो जाते हैं।
इसलिए अंतिम आग्रह—
> दिल चाहता है खूब भीगूं..
सिर्फ शरीर के भीगने की इच्छा नहीं है। यह प्रकृति के आनंद में अपने अलग अस्तित्व को कुछ देर के लिए भिगो देने की इच्छा है।
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अब निर्मोही क्रिटिक
यह कविता भाव में बहुत सहज है, लेकिन आपकी सबसे बड़ी समस्या फिर वही है—आप सुंदर दृश्य देखकर रुकते नहीं, उसके ऊपर लगातार सुंदरता चढ़ाते जाते हैं।
जहाँ कविता चमकती है
> कोई किलक उठती अचानक,
कोई छलक जारी स्नेह भर
कोई टपक जाती प्रेम से
कोई छटक जाती फुदक कर
यह बहुत अच्छा है। यहाँ बूंदें सचमुच व्यक्तित्व पा जाती हैं। चार क्रियाएँ चार अलग बच्चियों का चरित्र बना देती हैं। इसे बचाइए।
और—
> बज रही मंजीर हो
दूर.. प्रिय! कहीं
श्रव्य बिंब सुंदर है। बारिश को केवल देखा नहीं, सुना गया है।
जहाँ कुल्हाड़ी चाहिए
> मदिर! मृदुल! मासूम..
मदभरी, गरजती, रसभरी,
श्वेत-कारी, साँवरी...
यहाँ विशेषणों की भीड़ है। पाठक को सौंदर्य महसूस करने का समय नहीं मिलता, कवि लगातार उसे बता रहा है कि सुंदर कितना सुंदर है।
यहीं 20–30% काटने पर कविता और सुंदर होगी।
इसी तरह—
> गुलाबी,
श्वेत, पीले, और नीले
मणि ही हों वे,
स्फटिक...
यह चित्र सुंदर है, लेकिन अंत तक आते-आते बिंबों की थकान हो जाती है।
एक और जरूरी बात
“बादलों की कोख” और “बच्चियाँ” बहुत सजीव मानवीकरण हैं। लेकिन बाद में बूंदों का “आपसी चुंबन”, “प्यार”, “आनंद उत्सव” आदि बार-बार आने से वही मूल कल्पना दोहरती है।
एक बार संकेत दीजिए, फिर पाठक को स्वयं देखने दीजिए।
यही कविता को अधिक परिपक्व बनाएगा।
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और सबसे महत्वपूर्ण
आपकी यह कविता दर्शन समझाने की कविता नहीं है।
इसे वैसा ही रहने दीजिए।
आपकी दूसरी कविताओं में जहाँ आप द्रव्य, चेतना, आत्मा, मृत्यु आदि के भीतर जाते हैं, यहाँ आपकी उपलब्धि उलटी है—आपने विचार को पीछे कर दिया और आँख को आगे कर दिया।
बारिश को देखकर बच्चा बन जाना—यही इसकी आत्मा है।
मेरे हिसाब से कविता का सबसे मूल्यवान सूत्र है:
बूंदें गिर नहीं रहीं—वे अपना स्नेह बाँटने उतर रही हैं।
और अंत में कवि स्वयं दर्शक नहीं रहना चाहता—
वह भीगना चाहता है।
यहीं कविता पूरी होती है।
इन नन्ही बूंदों को मासूम बच्चियों कहना, यह कविता का सबसे प्यारा मोड़ है।
बादलों की कोख से जन्म, पत्तियों का मुख चूमना, किलकना-छलकना-टपकना-छटकना, यह शब्द-ध्वनि ही बरसात की भाषा बन जाती है।
"आ निकल बाहर आज तूं भी, प्यार कर और मिल इन्हें" में प्रकृति से वह आत्मीयता है जो आपकी रचनाओं की पहचान है। और अंत में "दिल चाहता है खूब भीगूं" दोहराना, मानो भीगना नहीं, भीतर उतर जाना हो।
अमावस की रात में यह फुहार, यह स्नेह, यह उत्सव, पढ़कर ठंडक महसूस हुई।
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