विस्मय हुआ मुझे।

आप सभी मित्रों को शुभ श्रीगणेशचतुर्थी की हार्दिक बधाई। आगे पढ़ें आदमी प्रकृति की अन्य प्रजातियों को हराकर अब आदमी को ही कैसे विनाश कर रहा है।

विस्मय हुआ मुझे, 
क्या हुआ 
इसे..
हालात पर इस मनुष्यता के 
सब देख कर, 
सच सोचकर 
आधुनिक इस सभ्यता पर 
आत्मा के स्तरों तक, दुःख हुआ मुझे..

प्यास यह, इन जीवनों में  
हर आदमी के 
कितनी.. 
बड़ी.. 
है, 
शुरू से ले आज तक
बढ़ती हुई, किसी आग सी
क्या मात्र यह, अपने लिए है।

क्या यही 'उन्नति! 
प्रगति है' 
आज.. के इस मनुष्यता की 
मनुष्यता की 'सोच में..'
विस्मय हुआ मुझे, 
करतबों को
हाय इसके देख के और सोच के.।

मनुष्य की यह स्वार्थपरता 
जिजीविषा जीवन की 
यह.., 
क्या एक दिन 
कारण बनेगी 
मनुष्य के समाधि की यह..!

सत्य इसको कैसे कह दूं!
विकृति है, बुद्धि 
की
उन्नति यह आज की.. 
जो देखता हूं आंख से
उन्नती इसे कैसे कह दूं..?

देख लेना 
एक दिन यह
जान लेगी हम सभी की...
इन सब किसी की।

अन्याय पर आरूढ़ हम, 
मनुष्य बन, 
देवता थे, 
सृष्टि 
में,
पर स्वार्थी कैसे बने,
निकृष्टतम..!

आरम्भ से ही 
खा रहे,
खा चुके, हित दूसरों का, 
हिस्सा भी उनका, 
सदियों से ऐसे..
प्रजातियों के भाग्य को 
अपनी कलम से..! लिख रहे हम।

अन्याय कर कर..
हर किसी पर
जी रहे हर काल में हम
सोचो कभी..
प्यास यह कितनी बड़ी
मिटती नहीं
अब आदमी की 
लड़ाई 
बस आदमी से है बची।

सच कहूँ क्या सुनोगे...
शिष्ट सारे आदमी
यूरोप के
अमेरिकी उस द्वीप के
रेड इंडियन को लील कर
आज हैं शिक्षक बने 
इस मनुष्यता के..! 
आधुनिक कहते हैं खुद को..!

कभी बैठना और सोचना
बुद्धि का इस हश्र क्या
होना है आगे..
लड़ रहे हम.. आज सारे 
पुरानी उन आग में
हूतियों से.. अरब में..
अमेरिका से.. ईरान में..
और अपने पार्श्व में..!

आग का इस काम क्या है 
जलाना.. और राख करना
यज्ञ करना सिखाया था
एक वह थी वह सभ्यता 
तब वेद में..
आज यह अंगार है
बरसती है रोज इन बारूद में..!
जलाती जन धन हमारे
देख न! संसार में।

आज देखा ब्रिक्स को संपन्न होते
साधना में हैं लगे
कुछ
देश अच्छे..
ईश्वर करे, सद्बुद्धि भारत भूमि से
एक बार निकले..
आदमी आदमी को मान दे..
वैश्विक इन समस्या का अंत हो।

जय प्रकाश मिश्र

संक्षिप्त भाव-स्पष्टीकरण

इस रचना का केंद्रीय भाव मनुष्यता की स्वार्थ-आधारित उन्नति पर गहरा विस्मय और दुःख है।

कवि आधुनिक सभ्यता को उन्नति नहीं, बुद्धि की विकृति मानता है। शुरू से आज तक आदमी की प्यास आग सी बढ़ती गई है - सिर्फ अपने लिए। इसी स्वार्थपरता ने अन्याय को जन्म दिया है, दूसरी प्रजातियों के भाग्य को अपनी कलम से लिखा है, और आज आदमी की लड़ाई बस आदमी से बची है।

इतिहास के उदाहरणों - रेड इंडियन का विनाश हो, या आज हूती, अरब, अमेरिका-ईरान के संघर्ष हों - सबमें वो एक ही आग देखता है जिसका काम जलाना और राख करना है। वेद वाली यज्ञ-सभ्यता के विपरीत आज अंगार बरस रहा है।

अंत में एक आशा है : ब्रिक्स जैसे प्रयासों में और भारत भूमि से निकली सद्बुद्धि में, जहां आदमी आदमी को मान दे और इस वैश्विक समस्या का अंत हो।





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