कितने किनारो से मिली
कितने किनारो से मिली
बहती हुई,
यह..
जिंदगी!
वही तो, ये..
वर्ष हैं, महीने.., सप्ताह.., दिन..!
बहती हुई,
यह..
जिंदगी!
वही तो, ये..
वर्ष हैं, महीने.., सप्ताह.., दिन..!
क्रमानुगत रखे हुए,
एक एक कर
आज तक
स्मृति
में,
जब जिसे चाहूँ, निकालूँ और देख लूं।
एक सच कहूं, अब सोचता हूँ,
ज्वार.. था, बेकार का,
नशा थी
यह..
जिन्दगी,
चढ़ती.. हुई
उतरती खुमार है, उससे बड़ी।
उतरा है
अब,
सच दीखता है,
धुँधला हो, पर हर तरफ
पागल थे हम, इस जिंदगी.. भर!
इससे ज्यादा कुछ नहीं।
अब देखता हूँ, बैठकर आराम से
घर गांव को,
हित, मीत को, पड़ोसी को
पा रहा,
अच्छी ही.. थी।
पर दौड़ थी एक, अनबुझी..
प्यास सी, बुझती नहीं
खींचती है
और आगे आज भी
रुकती नहीं
कितने किनारो से मिली
ये जिंदगी बहती हुई।
कितने किनारो से मिली
ये जिंदगी बहती हुई।
कभी, यह मुझे, अपनी लगी,
कभी पराई! खुद से लगी
बहती रही हर मोड पर
कभी तोड़
ती
यथार्थ को,
कभी.. सलटती
कभी सिमटती, कभी सुलझ कर
बहती रही है जिंदगी।
कुछ पल मेरे थे,
सुनहरे थे,
प्यार
के
वे, मोतियों से
चमकते हैं आज भी अक्षुण्ण हैं वे..।
कोश में, वैसे के वैसे..
चार पैसे ही दिए
जब,
जरूरत को
अवसर दिया.. किसी बृद्ध को
प्यार से चूमा था शिशु को
महकते.. ताजे हरे वे।
पुलक देते
एक
से,
महक जब बांटी थी मैने..
पड़ोस मे, दूर पहले, नौकरी में
साथ दे के.. सत्य का
वंचित हुआ था, देश जग से..
आज वे संपत्ति मेरे,
वही हैं सम्पत्ति मेरे।
कितने किनारो से मिली
बहती हुई,
यह..
जिंदगी!
वही तो, ये..
वर्ष हैं, महीने सप्ताह दिन ।
जय प्रकाश मिश्र
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