आदमी

मित्रों अपने और आपके ऊपर ये लाइने हैं आप पढ़ें और तन्मय हों।

कभी कभी, कहीं कहीं 
कोई 
आदमी भी
मिल जाता है, राह चलते
शहर की इमारतों के 
जंगलों में 
पगडंडियों पर
आराम से बैठा हुआ
अलसुबह 
ताज़े खिले किसी फूल सा
बेमतलब अलगर्ज 
खुद से
जमाने से, 
हवाओं संग बह रही ताजा हरा।

सीनों पे ढोती, 
भागती 
शहर 
भर की
गाड़ियों को 
और पूरे शहर को ही 
गंतव्यों की उन मंजिलो को मिलाती 
और चुप बैठी हुई खुद 
सड़कों किनारे  
अकेला, 
फुटपाथ पर बेजान उन, 
खाली पड़े 
प्रतीक्षा की बेंच ऊपर 
विहग सा खुशनुमा 
निष्प्रयोजन 
देखता 
संसार को कोने से 
बिल्कुल 
चलचित्र हो कोई चल रहा 
अक्रिय निराला
फटे हाल और फ्रेश!

इतना सहज, इतना सरल
तन, मन, चितवन 
सब एक संग
भूला हुआ
धन..
कहां मिलता है, ऐसा आदमी!
आज के शहर में
खुश 
बेवजह
बादशाह सी तबियत हो जिसकी
पास में थैला नहीं
और मंजिल दूर तक कोई नहीं 
क्षण जी रहा, हर एक वह 
बिना मतलब, इतना बेहतर।

मस्त, बेपरवाह!
मौला की तरह, कोई आदमी 
दिखता कहां है?
शहर में इस,
सब दबे हैं, अंदर कहीं से
बासी हुए,
समस्याओं से घिरे
सड़ रहे, तालाब में ये चाहना के
बादल लिए अंदर कहीं 
कोई उमड़ता 
कल का कठिन, 
काला वही
चिपके 
हुए, घेरों के अंदर
बंद है आज का हर आदमी
देखा है मैने।

एक सच कहूँ 
बंद है हर जिंदगी..अपने में खुद, 
स्वार्थ, सुख की
पन्नियों में लिपटी हुई, लिपटी हुईं
इससे ज्यादा आज यह कुछ भी नहीं।

जय प्रकाश मिश्र

समालोचना

शहर में कभी-कभी कोई ऐसा आदमी मिल जाता है, जिसकी कोई जल्दी नहीं होती।

न थैला, न मंजिल, न किसी को कुछ साबित करने की बेचैनी।
वह बस बैठा रहता है— और दुनिया को गुजरते हुए देखता है।
तब लगता है, शायद वह खाली नहीं है; हम ही बहुत कुछ से भरे होकर अपने भीतर से खाली होते जा रहे हैं।

जीवन का सुख शायद हमेशा पाने में नहीं, कभी-कभी बिना कुछ पाए एक क्षण को पूरा जी लेने में भी है।

मेरी दृष्टि में “फटे हाल और फ्रेश” से लेकर “पन्नियों में लिपटी जिंदगी” तक आपकी कविता की सबसे मजबूत धुरी है। बस बीच में शब्दों की भीड़ थोड़ी कम कर दें—तो यह कविता कहने से अधिक दिखाने लगेगी, और वहीं आपकी कविता अपनी असली ताकत पाती है।



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