दर्पण! है, प्रिय.. यह व्यवस्था।

मित्रों आज बाढ़ से लोग बेहाल हैं, बच्चे और बूढ़े क्या करें और व्यवस्था पंगु है इस विभीषिका के आगे इसी पर कष्ट का यह स्राव ही है।

दर्पण!  है, प्रिय.. वह, 
मूक मुंह से
कैसे.. 
सुनेगा बात अपनी
चिकना है कैसा, कितना सुंदर
पर मात्र प्रिय, बस.. देखने में।

लोल है, 
पर अपारदर्शी.. 
हीर इसका, हृदय इसका, 
आज के इस, व्यवस्था.. सा
इसलिए 
भागती इस भीड़ की आवाज को... 
इस शोर को, कैसे सुने।

सोच न दर्पण है ये..
कुछ नहीं है पास इसके...
मात्र भ्रम है, बुद्धि का..
पास इसके दौड़ते हैं हम
कुछ.. मिलेगा,
सत्य सुन
यह परावर्तन दृष्टि का 
तेरी 
ही.. है, प्रिय...।
जग प्रिये इतना बड़ा, इसमें भरा
जो.. दीखता है, 
वर्चुअल है, पास इसके 
मुस्कुराता साफ़ सुंदर देखने को
मात्र मुख है..
लो पेट भर लो...

आज की इस व्यवस्था को 
लखनऊ में नहीं देखो
बाढ़ के 
किसी क्षेत्र में..
रो रहे, परिवार के 
उन आँसुओं में
भीग कर एक बार देखो।

जय प्रकाश मिश्र

पूरी रचना दो स्तरों पर चलती है। 

पहला स्तर: बाढ़ की विभीषिका, बच्चे-बूढ़े बेहाल, व्यवस्था पंगु। दूसरा स्तर: दर्पण का रूपक। 
दर्पण (mirror) यहाँ व्यवस्था/तंत्र का प्रतीक बनता है,
चिकना, सुंदर, पर मूक
वह केवल देखता है, सुनता नहीं। 
"मात्र भ्रम है, बुद्धि का" पंक्ति में आप कहते हैं कि 
व्यवस्था से उम्मीद रखना एक बौद्धिक भ्रम है; 

जो दीखता है वह virtual है, 
"मात्र मुख है, लो पेट भर लो" यानि दिखावा है, पोषण नहीं।

 अंत में आप व्यवस्था को लखनऊ के comfortable नज़रिए से न देखने की सलाह देते हैं, बल्कि बाढ़-क्षेत्र के रोते परिवारों के आँसुओं में भीगकर देखने को कहते हैं। यह moral turn रचना का सबसे सशक्त हिस्सा है।

समीक्षा जो अच्छा है • **दर्पण-रूपक मौलिक है**। व्यवस्था को दर्पण कहना, जो "देखने में" सुंदर पर "मूक" है, एक ताज़ा और असरदार image है। • "भागती इस भीड़ की आवाज को, इस शोर को, कैसे सुने" : लय और सवाल दोनों में दम है। • अंतिम खंड सबसे मजबूत है : "रो रहे, परिवार के उन आँसुओं में भीग कर एक बार देखो" में प्रत्यक्षता है, पाठक को action देती है।

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