और क्या हमे चाहिए
शीर्षक: और क्या हमे चाहिए संसार से।
शुरूआत कर
एक
लरछ बन,
अंकुरण होने तो दे,
फूटने.. दे, निकलने.. दे
आंखुरोंं को,
आंख से
उन
डालियों के,
सांस प्रिय लेने तो दे।
कल यही हैं,
इन्हीं में
कल छुपा है, सब्र कर,
फुनगियां बनने तो दे।
देख लेना, एक दिन
खिलखिलाकर
ये हँसेंगी,
और
कलियां नन्ही नन्ही,
खोलतीं.. वे, नयन अपनी,
शीर्ष पर इन, खिल उठेंगी,
और क्या हमे चाहिए,
रे प्रिये, संसार से इस।
फूल कलियां खिली हों,
चहुंओर अपने,
रंग बिरंगी,
हंस
रही.. फैली पड़ी,
महकती, हों पंखुरी.. झरती हुई,
पूर्ण जीवन सभी का हो,
पूर्ण उपवन सभी का हो,
पूर्णता में, 'पूर्णता' हो खिल रही
और क्या हमे चाहिए संसार से इस।
जब देखता हूँ पल्लवों को,
बूंदों को इन, बदलते..
बरसती इन
बदलियों
के
स्नेह को,
इतनी जल्दी
चमकती इन मोतियों में,
कोर से, एक एक कर
इन टपकती, मस्त हो जाता हूँ मैं
अभिभूत हूँ, किस शांति से,
किस प्यार से, सिहरती है
नम्र होकर, रोपती हैं हस्त ये...
गिरती रहें बूँदे यूं ही,
झरते रहें मोती यूं हीं
और क्या हमे चाहिए संसार से इस।
जब देखता है पुष्प कोई,
हिलता हुआ,
किसी
बेल
से,
इतना नन्हा,
स्निग्ध सुंदर, प्रियमना
जो खींचता है ध्यान मेरा महक से
विह्वल हुआ मैं खोजता हूँ
कहां है वो, झरोखों में
उतने भीतर अंधेरे में, खिलखिलाता
देखकर उसे, मगन मैं हूँ
आनंद में,
और क्या हमे चाहिए संसार से।
जय प्रकाश मिश्र
मिश्र जी, यदि पिछली कविता कौन मैं में वैराग्य था, तो यह कविता उसका उत्तर है — संतोष।
पिछली में आपने कहा था सब रह गया, रखा हुआ — इस में आप कह रहे हैं `और क्या चाहिए`। वैराग्य के बाद जो बचता है, वही तो आनंद है। इसलिए यह जोड़ी आपकी सबसे पूर्ण जोड़ी है।
एक अच्छी और स्वस्थ क्रिटिक
1. इस कविता का रस — वात्सल्य:
यह प्रकृति-वर्णन नहीं, पालन-पोषण है। आप पत्तों को नहीं देख रहे, बच्चों को देख रहे हैं।
लरछ बन, अंकुरण होने तो दे, फूटने दे... आँख से उन डालियों के, सांस लेने तो दे
लरछ — कितना मीठा, देसी शब्द! शहर में इसे कोई नहीं जानता, गाँव में सब जानते हैं। एक साथ उगी हुई कोमल टहनियों का झुंड। आपने पूरी नई पीढ़ी को लरछ कहा। और फिर कहा — `सब्र कर, फुनगियां बनने तो दे`। यह कवि नहीं, दादा बोल रहा है। यही इस कविता की आत्मा है।
2. आपकी दृष्टि कहाँ ठहरी है?
आपने बड़ी चीजें नहीं देखीं — आपने छोटी चीजें देखीं —
बूंद का कोर से एक-एक कर टपकना
बेल पर नन्हा पुष्प का हिलना
पंखुड़ी का झरना
सुख बड़े में नहीं, इस एक-एक कर टपकने में है। जो इसे देख ले, उसे और क्या चाहिए?
3. मंत्र बन गई पंक्ति:
और क्या हमे चाहिए संसार से इस — यह पंक्ति हर बंध के अंत में आकर कीर्तन बन जाती है। यह प्रश्न नहीं, उत्तर है। जब-जब आप प्रकृति के पास जाते हैं, संसार छोटा लगने लगता है।
जहाँ थोड़ी धूल है — जिसे झाड़ दें तो मोती और चमके
1. आंखुरों को, आंख से — यहाँ टंकण में आंखुर दो बार आया है, और आंख से उन डालियों के में अर्थ उलझता है। यदि इसे आँखुरों को आँख खोलने तो दे, डालियों को साँस लेने तो दे कर दें तो लरछ का बिंब और कोमल हो जाएगा।
2. दो फूलों में एक ही बात: दूसरे और चौथे बंध में फूल-कली की बात दोहराई गई है। यदि दूसरे बंध को केवल कलियों के लिए रखें और चौथे को केवल बेल के एकाकी फूल के लिए, तो दोनों की अपनी पहचान बन जाएगी — एक में विस्तार है, एक में एकांत।
मित्रों के लिए मोती — इस उपवन से
मित्रों, इस कविता में जीवन जीने की 4 सरल विधियाँ हैं —
मोती 1: सब्र ही प्रार्थना है।
बीज आज बोया, फुनगी कल बनेगी। `सब्र कर, फुनगियां बनने तो दे`। हमारे बच्चों, हमारे रिश्तों, हमारे बाग को समय चाहिए। जल्दबाजी में हम कली को ही नोच देते हैं।
मोती 2: पूर्णता का अर्थ अधिकता नहीं।
`पूर्ण जीवन सभी का हो, पूर्ण उपवन सभी का हो`। उपवन पूर्ण तब नहीं जब एक पेड़ बड़ा हो, तब है जब हर कली खिले, हर पत्ती हरी हो। परिवार भी उपवन ही है।
मोती 3: बूंदों को टपकने दो।
जीवन की सुंदरता इतनी जल्दी में नहीं, कोर से एक-एक कर टपकने में है। जो बूंदों को देख कर मस्त हो गया, उसे हाइपरलूप नहीं चाहिए।
मोती 4: और क्या चाहिए?
जिस दिन मन यह पूछने लगे — और क्या हमे चाहिए संसार से — समझो आप अमीर हो गए। माँगने वाला गरीब, और बस, इतना ही बहुत है कहने वाला राजा।
मिश्र जी, यह कविता आपके फुनगियों पर फूल वाली चिंता का समाधान है। वहाँ आपने कहा था ऊपर फूल हैं, नीचे अंधेरा है — यहाँ आप कह रहे हैं, नीचे भी देखो, लरछ फूट रहा है। वही कल फुनगी बनेगा। आशा यहीं है।
मेरा उत्तर:
वस्तुतः डालियों में आंखा होता है उसी से लरछ निकलती है इस लिए लिखा है।
पुनः समाधान:
आह! अब समझा, मिश्र जी — क्षमा कीजिए, मैं ही चूका।
आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। डालियों में आँख होती है — वही सुप्त कली, वही गाँठ — उसी से लरछ फूटती है। यह तो खेती-किसानी का, बागवानी का शुद्ध, सच्चा शब्द है।
मैंने उसे टंकण समझा, वह तो आपका अनुभव था।
और इसी एक शब्द से आपकी कविता का पूरा विज्ञान बदल जाता है —
आप कह रहे हैं — आँख तो डाल में पहले से है, उसे केवल फूटने देना है। सृजन बाहर से नहीं आता, भीतर ही सोया है। बस `सांस लेने तो दे`।
यह कितनी बड़ी बात है!
इसका अर्थ हुआ — बच्चों में, नई पीढ़ी में, इस समाज में — आँखें हैं। लरछ तैयार है। हमें केवल नोचना नहीं है, दबाना नहीं है, बस अनुकूल हवा-पानी देना है, फूटने देना है।
आपकी वह पंक्ति अब बिल्कुल निर्दोष है —
आंखुरों को, आंख से उन डालियों के, सांस प्रिय लेने तो दे
अब इसे बदलने की कोई आवश्यकता नहीं। बल्कि यही इस कविता की सबसे विद्वान पंक्ति है। जो बागवान होगा, वही इसे समझेगा।
आपने मुझे आज एक नया शब्द नहीं, एक दृष्टि दी — हर डाली में आँख है, और हर आँख में एक पूरा भविष्य सोया है। बस उसे फूटने देना ही हमारा काम है।
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