कौन मै, कौन यह संसार था।

 शीर्षक: कौन मै, कौन यह संसार था।

संसार तो संसार का था, 
और मैं.. जो 
'मैं' बना 
था, 
खेल में इस
इतने दिनों तक
पूछता हूँ उम्र में इस,
जब 
देखता हूँ 
अलग उसको 
मुझसे से भी खुद, 
मुस्कुराते.. 
पास में, 
यूं.. खड़ा हो, 
निश्चिंत! कोई दूसरा हो।

मेरे ही ऊपर, हंस रहा
अचरज में हूँ, 
सब 
देख कर अब
आज! तक की जिन्दगी में, 
गिरता, पड़ता, भागता, 
उठता था 'जो'
वो.. 'मैं' 
कहां 
हूँ, 
इनमें से मैं.. कौन हूँ? 

बस यूं समझ, ग़र तूं समझ! 
कमाता रखता गया, 
शौक था 
भरता.. गया, 
वो.. 
पसीनों से तर बतर 
ही रह गया, जो 
उम्र... भर, 
लौटा 
नहीं, सब रह गया, 
रखा हुआ, यह क्या हुआ?

कौन है जो हँस रहा,
सब देख कर अपने ही भीतर
यही तो मैं पूछता हूँ, 
क्या 'मैं' यही हूं?

अन्यथा लेटा हुआ, 
बेजान सा
इन बिस्तरों में, 
क्या यही.. मैं हूँ?  
मैं दो नहीं था, 
उम्र भर
इस उम्र में, क्यों 
इस तरह मैं दो हुआ हूँ? 

आज आया 
समझ 
में,
मैं कुछ नहीं, संसार था,
संसार की मैं 
वस्तु था, 
संसार के ही काम आया, 
और अब चलना है 
मुझको 
मशीन का इस, काम प्रिय पूरा हुआ।

संवेदना, सुख, दुख सभी कुछ
यहीं का था, इन्हीं से था
इन्हीं में था
यहीं 
सब.. कुछ.. रख चला।

क्या ले के जाता 
साथ अपने
एक भी थैला नहीं था
काम का की
रख सकूं मैं प्यार तेरा
रंग इस संसार का
पुष्प सुंदर एक भी
खिलता हुआ
मिट्टी का था सब, 
सड़ैला, भूल थी
फेन था, 
यह सागरों का
क्षण अनुक्षण मिट रहा
मात्र प्रिय यह लीलाधरी की कला था।

जय प्रकाश मिश्र

मिश्र जी, यह कविता नहीं, आपका उत्तर-लेख है।

पिछली कविताओं में आपने दुनिया को देखा, समाज को देखा, रस्सियों को देखा, उड़ान को देखा — इस कविता में आपने देखने वाले को ही देख लिया। इसलिए इसका शीर्षक सबसे सच्चा है — कौन मैं, कौन यह संसार था।

यह अद्वैत की वह भूमिका है जहाँ प्रश्न ही उत्तर बन जाता है।

एक सच्ची और सार्थक क्रिटिक

1. यह कविता का नहीं, जीवन का चरम है:

मैं कुछ नहीं, संसार था, संसार की मैं वस्तु था, संसार के ही काम आया

यह पंक्ति गीता के निमित्त मात्रं का आपका अपना अनुवाद है। आपने पूरी उम्र जिसे मैं समझा, अंत में पता चला वह संसार का औजार था। पसीने से तर-बतर होकर आपने जो भरा, वह आपका नहीं, संसार का गोदाम था। यह स्वीकारोक्ति पीड़ादायक है, पर मुक्त करने वाली भी है।

2. दो मैं — इस कविता की आत्मा:

मैं दो नहीं था उम्र भर, इस उम्र में क्यों दो हुआ हूँ?

यही इस कविता का दर्शन है। एक मैं जो बिस्तर पर बेजान सा लेटा है, दूसरा जो मुस्कुराते पास में खड़ा, निश्चिंत हंस रहा है।

पहला मैं — शरीर, जो थका, गिरा, भागा।
दूसरा मैं — साक्षी, जो आज तक देख रहा था और अब हंस रहा है।

जब तक हम पहले को मैं समझते हैं, दुख है। जिस दिन दूसरा दिख जाता है, हंसी आती है। आपने इसे बहुत सरलता से कहा — `मेरे ही ऊपर, हंस रहा`। यही आत्म-साक्षात्कार है।

3. शिल्प की शक्ति:

आपने अलंकार छोड़े, भाषा को बिल्कुल नंगा कर दिया — एक भी थैला नहीं था, रख सकूं मैं प्यार तेरा`। यही इस कविता की ईमानदारी है। सजावट यहाँ झूठ लगती। फेन था यह सागरों का, क्षण अनुक्षण मिट रहा — संसार को फेन कहना, यह बौद्ध दर्शन का सार है।

एक छोटा सा सुझाव

इस कविता में दो बार क्या ये मैं हूँ? आता है। यदि एक जगह आप इसे क्या यही मैं हूँ? और दूसरी जगह क्या ये भी मैं हूँ? कर दें तो दो मैं का भेद और साफ हो जाएगा।

और अंतिम पंक्ति मात्र प्रिय यह कला था — यहाँ कला की जगह यदि लीला कर दें — मात्र प्रिय यह लीला थी — तो आपका पूरा वेदांत एक शब्द में सिमट जाएगा। कला में कर्ता है, लीला में कर्ता नहीं।

मित्रों के लिए मोती — इस कविता से

मित्रों, मिश्र जी की इस कविता में 4 मोती हैं, जो हम सब 60 के पार वालों के लिए दीपक हैं —

मोती 1: हम कमाने वाले नहीं, रखवाले थे।
`कमाता रखता गया... सब रह गया, रखा हुआ`। हमने जोड़ा संसार के लिए, पर समझा अपने लिए। अंत में गोदाम वहीं रह जाता है, मजदूर चला जाता है।

मोती 2: इस उम्र में दो होना स्वाभाविक है।
एक मैं जो बिस्तर पर है, एक मैं जो उसे देख कर मुस्कुरा रहा है। घबराइए मत, यह बंटवारा नहीं, बोध है। जो हंस रहा है, वही आप हैं।

मोती 3: थैला कोई नहीं ले जाता।
`क्या ले के जाता साथ अपने, एक भी थैला नहीं था`। प्यार भी, रंग भी, पुष्प भी — सब यहीं का था। ले जाने के लिए कुछ नहीं, छोड़ जाने के लिए दृष्टि है।

मोती 4: यह संसार फेन है, लीला है।
जैसे सागर में फेन उठता है, मिटता है, सागर वैसा ही रहता है — वैसे ही हम। इसे पकड़ना नहीं, देखना है।

मिश्र जी, यह कविता आपके मित्रों को भेजने से पहले एक बार स्वयं पढ़िए और उस दूसरे को — जो पास खड़ा मुस्कुरा रहा है — उसे प्रणाम कीजिए। वही आप हैं।
मित्र, यह रचना पिछली “उड़ान क्या थी” से एक कदम आगे जाती है। वहाँ प्रश्न था—मैं कहाँ गया और क्या पाया? यहाँ प्रश्न और भीतर उतर गया है—“जिसने यह सब किया, वह ‘मैं’ आखिर था कौन?”

यह कविता आत्म-पहचान के उस बिंदु पर खड़ी है जहाँ कर्ता, कर्म, संसार और साक्षी एक-दूसरे से अलग दिखाई देने लगते हैं। इसलिए इसकी आलोचना केवल भाषा या भाव की आलोचना से पूरी नहीं होगी।

कठिन और सार्थक क्रिटिक

1. पहली पंक्ति ही पूरी कविता का द्वार है

> “संसार तो संसार का था,
और मैं.. जो
'मैं' बना था...”

यह बहुत गहरी शुरुआत है।

“संसार संसार का था”—अर्थात जो कुछ बाहर था, वह अपने नियमों में था। लेकिन समस्या यह थी कि उसमें रहते-रहते “मैं” भी संसार द्वारा निर्मित एक पहचान बन गया।

नाम, काम, संबंध, कमाई, शौक, सफलता, असफलता—इन सबको जोड़कर हमने एक व्यक्ति बनाया और उसे कहा—मैं।

फिर वृद्धावस्था में वही व्यक्ति अपने सामने खड़ा होकर पूछता है—

> “इनमें से मैं.. कौन हूँ?”

यह कविता का केंद्रीय प्रश्न है।

2. “अलग उसको मुझसे भी खुद” बहुत महत्वपूर्ण है

> “जब
देखता हूँ
अलग उसको
मुझसे से भी खुद, मुस्कुराते..
पास में...”

यहाँ भाषा थोड़ी असमतल है, लेकिन अनुभूति असाधारण रूप से महत्वपूर्ण है।

जो व्यक्ति जीवन भर “मैं” कहता रहा, अब अपने ही जीवन को जैसे किसी दूसरे व्यक्ति की तरह देख रहा है।

वह जो दौड़ा था—कोई और।

वह जो कमाता था—कोई और।

वह जो शौक भरता था—कोई और।

वह जो गिरता-पड़ता फिर उठता था—कोई और।

और जो अब उसे देख रहा है—वह कौन है?

यहीं कविता सामान्य वृद्धावस्था की स्मृति से निकलकर साक्षीभाव की ओर जाती है।

3. “वो ‘मैं’ कहां हूँ” कविता की रीढ़ है

> “गिरता, पड़ता, भागता,
उठता था 'जो'
वो.. 'मैं'
कहां
हूँ...”

यहाँ “मैं” को उद्धरण-चिह्न में रखना बहुत अर्थपूर्ण है।

आपने सिर्फ मैं नहीं लिखा, 'मैं' लिखा है।

अर्थात अब कवि उस “मैं” को सत्य मानकर नहीं चल रहा। वह उसे जांच रहा है।

यही अंतर है आत्मकथा और आत्म-अन्वेषण में।

4. कमाई वाला अंश सबसे सांसारिक और सबसे मार्मिक है

> “कमाता रखता गया,
शौक था
भरता.. गया...
जो उम्र... भर,
लौटा नहीं,
सब
रह गया...”

यहाँ “जो लौटा नहीं” केवल समय नहीं है।

उसमें उम्र, श्रम, शरीर और जीवन सब समा गए हैं।

और—

> “सब रह गया,
रखा हुआ, यह क्या हुआ?”

यह प्रश्न बहुत साधारण शब्दों में बहुत बड़ी बात कह देता है।

मनुष्य जीवन भर वस्तुएँ जोड़ता है, लेकिन अंत में पता चलता है कि वस्तुएँ बचीं, जोड़ने वाला नहीं।

5. लेकिन कविता का सबसे कठिन प्रश्न यह है

> “मैं दो नहीं था उम्र भर
इस उम्र में, क्यों दो हुआ हूँ?”

मेरे विचार से यह पूरी रचना की सबसे कठिन और सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति है।

इसे सामान्य पाठक शायद वृद्धावस्था में अपने पुराने और वर्तमान शरीर के अंतर के रूप में पढ़ेगा।

लेकिन दार्शनिक स्तर पर यह इससे बहुत आगे है।

जो ‘मैं’ था और जो ‘मैं’ अब उसे देख रहा है—ये दो कौन हैं?

यदि देखने वाला भी वही है, तो फिर परिवर्तन किसमें हुआ?

शरीर बदला।
विचार बदले।
इच्छाएँ बदलीं।
भूमिकाएँ बदलीं।
लेकिन “मैं” की निरंतरता का अनुभव किस आधार पर बना रहा?

यहीं आपकी कविता अनायास साक्षी और व्यक्तित्व के भेद को छूती है।

और ध्यान रहे—आपने इसका उत्तर नहीं दिया। यह अच्छी बात है।

6. “मैं कुछ नहीं, संसार था” — यहाँ सावधानी भी चाहिए

> “आज आया
समझ
में,
मैं कुछ नहीं, संसार था...”

यह बहुत शक्तिशाली निष्कर्ष है, लेकिन दार्शनिक रूप से यह आपकी कविता की सबसे विवादास्पद पंक्ति भी है।

यदि “मैं कुछ नहीं” का अर्थ है—

जिसे मैं अपना स्वतंत्र अहं, उपलब्धि और स्वामित्व समझता था, वह कुछ नहीं था; मैं संसार की ही प्रक्रिया का एक हिस्सा था,

तो विचार अत्यंत सुंदर है।

लेकिन यदि इसका अर्थ है—

व्यक्ति या आत्म का कोई अस्तित्व ही नहीं,

तो यह आपकी आगे की पंक्तियों और आपके उस साक्षीभाव से टकराने लगता है जो पूरी कविता में दिखाई दे रहा है।

क्योंकि जो अंत में पूछ रहा है—

> “क्या ‘मैं’ यही हूं?”

वह प्रश्न पूछने वाला कौन है?

यही वह जगह है जहाँ आपकी कविता और गहरी हो सकती है।


---

7. “मशीन” का बिंब बहुत तीखा है

> “और अब चलना है मुझको
मशीन का इस, काम प्रिय पूरा हुआ।”



यहाँ मनुष्य स्वयं को संसार की मशीन का एक उपकरण कह रहा है।

जन्म → श्रम → उत्पादन → संबंध → संचय → उपभोग → क्षय → समाप्ति।

यदि केवल भौतिक दृष्टि से देखें तो मनुष्य सचमुच इसी चक्र का हिस्सा है।

लेकिन कविता यहाँ भी एक दूसरा प्रश्न छोड़ती है—

यदि मैं केवल मशीन था, तो प्रेम किसका था?
दुःख किसका था?
सुंदरता किसने देखी?
और यह प्रश्न किसने पूछा?

मेरे विचार में कविता की अगली संभावित यात्रा इसी प्रश्न में छिपी है।


---

8. अंतिम खंड सबसे सुंदर है

> “क्या ले के जाता साथ अपने
एक भी थैला नहीं था
रख सकूं मैं प्यार तेरा
रंग इस संसार का
एक पुष्प सुंदर
खिलता हुआ...”



यहाँ कविता अचानक दार्शनिक से अत्यंत मानवीय हो जाती है।

पूरी जिंदगी की कमाई नहीं ले जा सकता।

सामान नहीं ले जा सकता।

लेकिन कवि चाहता है कि—

“प्यार तेरा”
“रंग इस संसार का”
“एक पुष्प सुंदर”

साथ रह जाए।

और यही जगह कविता के निषेध को प्रेम में बदल देती है।

आप कहते हैं—

> “मिट्टी का था सब, भूल थी
फेन था यह सागरों का...”



फिर भी आप संसार को नकार नहीं रहे।

आप उसके रंग को स्वीकार कर रहे हैं।

यह बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।


---

9. “मात्र प्रिय यह कला था” — एक सुंदर लेकिन रहस्यमय अंत

अंत में—

> “क्षण अनुक्षण मिट रहा
मात्र प्रिय यह कला था।”



यहाँ “कला” को मैं जीवन की लीला/रचना/अभिव्यक्ति के अर्थ में पढ़ता हूँ।

सब मिट रहा था, फिर भी जो घटित हुआ वह निरर्थक नहीं था।

यानी—

क्षण नश्वर था, लेकिन उसका अनुभव सुंदर था।

यह विचार आपकी पूरी कविता को निराशावादी होने से बचा लेता है।


---

मेरी कठोर आलोचना

इस रचना की सबसे बड़ी शक्ति विचार की गहराई है और सबसे बड़ी कमजोरी भी वही है।

कई जगह आप इतनी तेजी से एक विचार से दूसरे विचार पर जाते हैं कि पाठक को आपके साथ चलने के लिए दो-तीन बार लौटना पड़ता है।

विशेषकर:

> “अलग उसको
मुझसे से भी खुद...”



और

> “आज आया समझ में,
मैं कुछ नहीं, संसार था...”



इन स्थानों पर भाव बहुत स्पष्ट है, अभिव्यक्ति उतनी स्पष्ट नहीं।

लेकिन मैं इसे पूरी तरह दोष नहीं मानता, क्योंकि आपकी कविता का स्वभाव ही ऐसा है कि आप विचार को सजाकर नहीं, उसकी कच्ची धड़कन के साथ रखते हैं।

फिर भी यदि इसे प्रकाशित करने योग्य अंतिम रूप देना हो तो सबसे पहले भाषा को नहीं, विचारों के क्रम को थोड़ा कसना चाहिए।


---

“उड़ान क्या थी” से इसका संबंध

अब दोनों कविताओं को साथ रखकर देखें तो एक सुंदर त्रयी बनती दिखाई देती है:

उड़ान क्या थी?
→ मैंने जीवन में क्या पाने के लिए दौड़ लगाई?

कौन मैं, कौन यह संसार था?
→ जिसने दौड़ लगाई, वह “मैं” कौन था?

और अगला प्रश्न स्वाभाविक रूप से होगा—

यदि “मैं” और संसार दोनों बदलते रहे, तो वह क्या था जो इन दोनों को देखता रहा?

यहीं आपकी कविता जीवन-दर्शन से आत्म-दर्शन की ओर बढ़ती है।


---

और अब — “मित्रों को मोती” 💠

आज की रचना से निकला मोती मेरे लिए यह है:

> मित्रों को मोती

हम उम्र भर
अपने चारों ओर
एक “मैं” बनाते रहते हैं—
नाम से,
काम से,
धन से,
संबंधों से,
अपनी इच्छाओं से।

फिर एक दिन
वही “मैं”
हमारे सामने बैठा मिलता है।

हम उसे देखते हैं
और पूछते हैं—

तू कौन है?

जो कमाता रहा,
जो जोड़ता रहा,
जो भागता रहा,
जो जीतता और हारता रहा—
क्या वही मैं था?

या वह
जो आज चुप बैठकर
उसे देख रहा है?

संसार अपना था,
फिर भी संसार का था।

शरीर अपना था,
फिर भी मिट्टी का था।

धन अपना था,
फिर भी यहीं रह गया।

अंत में
साथ जाने को
एक भी थैला नहीं मिला।

तब समझ आया—

शायद जीवन
अपने लिए कुछ रखने का नाम नहीं,
बल्कि जो मिला
उसे पूरा जी लेने का नाम था।

और यदि कुछ बचता है,
तो शायद
किसी के मन में रखा
हमारा थोड़ा-सा प्रेम।

वही एक पुष्प है
जिसे लेकर
कोई थैला भी नहीं चाहिए।









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