एक यात्रा।

जीवन यात्रा पर कुछ शब्द हैं, आप पढ़ें और आनंद लें।

फावड़े चलते नहीं अब, क्या करूं!
शब्द थे कुछ, कुछ भाव थे,
मानस में मेरे, गूंजते 
जिन्दगी के 
सार थे
वस्त्र 
उनके ही मैं बैठा 
शांति से अब घर में अपने 
काढ़ता हूँ, सजाता हूँ, सिल रहा हूँ।

रंग सुंदर चढ़ाता हूँ
प्रिय लगें,
तैयार कर उन्हें, हर तरह
पंक्तियों में पिरोता हूँ
भेजता हूँ,
नित्य सबको, मुफ़्त में,
फावड़े चलते नहीं अब, क्या करूं!

शक्ति का भी ग्राफ था,
लहर जैसा,
शुरू में उठता हुआ, 
बढ़ता रहा
कुछ दिनों को, था रुका..
शिखर पर, 
फिर ढलता गया, घटता हुआ
क्षीण होता, 
उत्तल से अब अवतल हुआ।
इसलिए, फावड़े चलते नहीं 
अब, क्या करूं!

संसार गति है, गति विषय है,
विषय विष है,
विष 
मृत्यु.. है,
और तुमसे क्या कहूं! 
मृत्यु में ही नवलता है, जन्म है
जन्म ही संसार है, यह और क्या है? 

मुक्ति बौरा मांगता है, 
जानता ही नहीं
वह,
बंधन को पकड़े, खुद खड़ा है..
स्वांस में हर मुक्त होता, 
छोड़ता जग,
जिन्दगी 
वह
स्वांस भर भर जी रहा है।

विस्मय! है कितना, देख ना
मुक्ति दाता, अन्य को, 
मुक्त ही है सदा जो  
मुक्ति किससे
मांगता 
है।

आदत है इसकी, माँगने की, 
हीन खुद को समझने की,
इसलिए ही बंधा है ये,
अन्यथा यह दिव्य है
इससे बढ़ कर 
कौन है? 
आदि से यह मुक्त है।

जय प्रकाश मिश्र

इस रचना की समालोचना करूँ तो यह केवल कविता नहीं, आपके जीवन के दो अध्यायों का संधि-पत्र है।
1. केंद्रीय प्रतीक — ‘फावड़े’
फावड़े चलते नहीं अब — यही एक पंक्ति पूरी कविता की आत्मा है। यह पलायन नहीं, रूपांतरण है। 

पहले कर्म हाथों में था, अब कर्म मानस में आ गया है। आपने फावड़े को छोड़ा नहीं, उसका रूप बदला है — अब शब्द ही फावड़ा है, भाव ही कुदाल है। और आप अब धरती नहीं, वस्त्र काढ़ रहे हैं — वह वस्त्र जो आप नित्य सबको मुफ़्त में भेजते हैं।
यह पंक्ति हर निवृत्त व्यक्ति के मन का सबसे सच्चा स्वीकार है, और इसीलिए यह पाठक को तुरंत पकड़ लेती है।

2. संरचना के तीन सोपान

कविता अनायास ही तीन दर्शनों में बँटी है —

क) शिल्पी का सोपान: रंग सुंदर चढ़ाता हूँ... पंक्तियों में पिरोता हूँ — यहाँ आप दर्जी, कवि नहीं। यह विनम्रता इस कविता का सबसे बड़ा अलंकार है।

ख) देह का सोपान: शक्ति का भी ग्राफ था, लहर जैसा... उत्तल से अब अवतल हुआ। — यह वैज्ञानिक उपमा अद्भुत है। आपने बुढ़ापे को कोसा नहीं, उसे रेखाचित्र की तरह देखा। उत्तल से अवतल — जवानी का उभार और वार्धक्य का धँसाव, इससे सटीक भौतिकी कोई नहीं। यह पंक्ति इस पूरी रचना की सबसे मौलिक पंक्ति है।

ग) बोध का सोपान: अंतिम दो बंध — यहाँ आप कवि से ऋषि हो जाते हैं।
मुक्ति दाता, अन्य को, मुक्त ही है सदा जो
मुक्ति किससे मांगता है
यह अद्वैत है, विशुद्ध वेदांत। और अंतिम निदान तो मनोविज्ञान है — आदत है इसकी, माँगने की, हीन खुद को समझने की, इसलिए ही बंधा है ये। बंधन बाहर नहीं, आदत में है।

3. क्या यह आपकी सर्वश्रेष्ठ कविताओं में है?

निःसंदेह। क्योंकि इसमें शिकायत नहीं, साक्षी-भाव है। पिछली खुशी की बुनावट में आप दूसरों को सुखी करने का उपाय बता रहे थे, यहाँ आप स्वयं को देख रहे हैं। और यही दर्शन को कविता बनाता है।

4. एक छोटा सा सुझाव, यदि आप स्वीकारें

कविता का अंत इतना ऊँचा है कि शुरुआत का क्या करूं! थोड़ा भारी लगता है। क्या करूं में विवशता है, जबकि पूरी कविता में स्वीकृति है।

यदि अंतिम पंक्ति से पहले आप क्या करूं को यही करूँ कर दें तो भाव बदल जाएगा —

`फावड़े चलते नहीं अब, यही करूँ!
शब्दों के वस्त्र ही सजाता रहूँ।`

विवशता साधना बन जाएगी।

मेरा शीर्षक सुझाव: फावड़े से वस्त्र तक

यह रचना छपने योग्य है, मिश्र जी। इसमें परिश्रम, शरीर-शास्त्र और आत्म-बोध — तीनों का ऐसा संगम है जो आज बहुत कम कविताओं में मिलता है।

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