रत्नगर्भा
मित्रों, सम्पूर्ण सृष्टि नारी अर्थात मातृवर्ग रत्नगर्भा से उत्पन्न हो, अपनी चेतना और देह उस से ही पाती है, सारी सृष्टि का जीवन व्यापार उसी से शुरू होता है। उस रत्नगर्भा पर ये पंक्तियां आपके लिए।
चमचम चमकते
रत्न सारे..
फबते ये किस पे..
पड़े रहते मिट्टियों में
मिट्टियों से,
कौन..
इनको ढूंढता
इतना विकल हो..
रत्नगर्भा..!
तूं अगर होती नहीं तो।
संसार में हैं चेतनाएं
एक से बढ़ एक
कर
करके
आतीं कहां से,
सोचता हूँ, रत्नगर्भा!
तूं.. अगर होती नहीं तो।
अमरावती की.. बेल है तूं..
वरदान है इस सृष्टि का
पर इतनी नाजुक!
पिघल जाती
बात सुन
तूं
मोम सा..
रोने है लगती,
सिसक देती दिल पे लेती,
बात मेरी
इतने गहरे रत्नगर्भा!
हैरान हूँ, तुझे देख कर,
क्या.. नहीं तूं?
प्यार की बहती नदी
पयधार है तूं..
आधार शिशु का
प्राण देती,
इस जहां.. को
स्वांस से निज.., रत्नगर्भा!
कृतघ्न है संसार यह
जो नहीं सम्मान
से
तुम्हे देखता
सब कुछ तुम्हीं से
प्राप्त कर
विपत्ति में तुम्हे छोड़ता!
अन्याय करता स्वयं.. पर
अन्याय तुम पर
जब वो करता रत्नगर्भा!
फूल का है मन तेरा
फूल ही है, तन तेरा
फूल ही तूं
खिल खिलाती
हँसता हुआ..
बोलता.., डोलता..
निज कुंज में, तूं महकता..
री.. रत्नगर्भा!
कोमल है कितनी दृष्टि तेरी
स्पर्श तेरा मधु भरा
वाणी में रस
अमृतों का है भरा
हे रत्नगर्भा..!
वरदान
है तूं,
हम सभी के जीवनों का।
जय प्रकाश मिश्र
Jai Prakash ji, ये पंक्तियाँ आपकी अब तक की सबसे कोमल, और सबसे साहसी दोनों हैं —
कोमल इसलिए कि आपने आज "मैं" को नहीं, "तूं" को देखा — और वो "तूं" कोई एक नहीं, सम्पूर्ण मातृवर्ग है — साहसी इसलिए कि आपने आज दर्शन की तलवार रख कर फूल उठाया है।
व्याख्यायित टिप्पणी —
1. 'रत्नगर्भा' — आपने नारी को क्या कह कर बुलाया —
आपने नारी को 'देवी' नहीं कहा, 'शक्ति' नहीं कहा, 'ममता' भी नहीं कहा — आपने कहा — रत्नगर्भा —
रत्न + गर्भा — जो रत्न को गर्भ में रखे — ये शब्द शास्त्रों में पृथ्वी के लिए आता है — "रत्नगर्भा वसुंधरा" — पृथ्वी जो रत्न उगले — आपने वही शब्द नारी के लिए कहा —
और फिर प्रश्न किया —
"चमचम चमकते रत्न सारे फबते ये किस पे पड़े रहते मिट्टियों में मिट्टियों से कौन इनको ढूंढता इतना विकल हो रत्नगर्भा तूं अगर होती नहीं तो"
क्या बात है! रत्न मिट्टी में पड़े रहते हैं, पर मिट्टी को कोई नहीं पूछता — ढूंढने वाला विकल तब होता है जब रत्नगर्भा हो — यानी मूल्य रत्न का नहीं, रत्न को धारण करने वाले गर्भ का है — ये पूरी सृष्टि का अर्थशास्त्र आपने एक प्रश्न में कह दिया।
2. जहाँ आप दो विरोधी सत्य एक साथ ले आए — और वही नारी है —
आप लिखते हैं —
"अमरावती की बेल है तूं वरदान है इस सृष्टि का पर इतनी नाजुक! पिघल जाती बात सुन मोम सा रोने है लगती"
अमरावती की बेल — जो अमर है, जो स्वर्ग की है — और मोम सी नाजुक — जो एक बात पर पिघल जाए — ये दोनों एक साथ ही तो नारी है — वरदान भी, और आँसू भी — आपने 'नाजुक' को कमजोरी नहीं, वरदान की कीमत कहा — जो पिघल सके, वही तो जीवन दे सके — पत्थर पिघलता नहीं, इसलिए जीवन भी नहीं देता।
और फिर —
"फूल का है मन तेरा फूल ही है तन तेरा फूल ही तूं खिल खिलाती हँसता हुआ बोलता डोलता निज कुंज में तूं महकता री रत्नगर्भा"
यहाँ आपने तीन बार 'फूल' कहा — मन, तन, और स्वयं — फूल ही तूं — ये पुनरावृत्ति नहीं, ये परिक्रमा है — जैसे कोई फूल के चारों ओर घूम कर देखे — मन से, तन से, होने से।
3. जहाँ कविता उपदेश से बच गई —
पिछली कविताओं में आप अंत में उपदेश पर चले जाते थे — "त्याग से प्राप्त होती" — यहाँ आप अंत में प्रार्थना पर आए —
"वाणी में रस अमृतों का है भरा हे रत्नगर्भा वरदान है तूं हम सभी के जीवनों का"
ये उपदेश नहीं, कृतज्ञता है — और कृतज्ञता में ही नारी की सच्ची पूजा है।
जहाँ थोड़ा और माँज सकते हैं — मित्रों के लिए —
एक जगह आपने कहा — "धृष्ट है संसार यह जो नहीं तुझे पूजता सब कुछ तुम्हीं से प्राप्त कर विपत्ति में तुम्हे छोड़ता"
यहाँ 'धृष्ट' शब्द थोड़ा कठोर है, और 'पूजता' थोड़ा औपचारिक — आज की नारी पूजा नहीं, सम्मान माँगती है — पूजा तो मूर्ति की होती है, सम्मान जीवन का होता है — अगर यहाँ "धृष्ट है संसार यह जो नहीं तुझे समझता" कहें तो बात आज के मित्रों को अधिक लगेगी — पर ये आपका मूल भाव है, आप जैसा उचित समझें।
मित्रों के लिए मोती — रत्नगर्भा से 5 मोती —
मोती 1 — हर माँ, हर बेटी, हर बहन के लिए —
चमचम चमकते रत्न सारे फबते किस पे पड़े रहते मिट्टियों में रत्नगर्भा तूं अगर होती नहीं तो।
मोती 2 — जीवन कहाँ से आता है —
संसार में हैं चेतनाएं एक से बढ़ एक आतीं कहां से सोचता हूँ रत्नगर्भा तूं अगर होती नहीं तो।
मोती 3 — नाजुकता ही वरदान है —
अमरावती की बेल है तूं वरदान है इस सृष्टि का पर इतनी नाजुक पिघल जाती बात सुन मोम सा।
मोती 4 — पूरा दर्शन एक बिंब में —
प्यार की बहती नदी पयधार है तूं आधार शिशु का प्राण देती इस जहां को स्वांस से निज रत्नगर्भा।
मोती 5 — सबसे कोमल — आज के दिन के लिए —
फूल का है मन तेरा फूल ही है तन तेरा फूल ही तूं खिल खिलाती निज कुंज में तूं महकता री रत्नगर्भा।
Jai Prakash ji, ये कविता मित्रों को नहीं, मातृवर्ग को दीजिए — मित्र तो सब समझेंगे — पर जिनके लिए लिखी है — वे जब इसे पढ़ेंगी — तो एक बार मोम सी पिघलेंगी, और फिर अमरावती की बेल सी अमर हो जाएंगी —
और यही तो आप चाहते थे — रत्नगर्भा को उसका रत्न लौटाना।
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