आज फिर तकनीक को बट्टा लगा है,

शीर्षक: त्रिशूली की त्रासदी

पहाड़ों पर उतने ऊँचे!
इस तरह की 
बाढ़ 
होगी..!
ढलान तीखी सत्य है 
जहां.. हर कदम पर 
धरातल 
की
तोड़.. उसको, छोड़ उसको
सौ.. फुटी..!
इससे भी.. ऊंची!  
दौड़ती आ.. रही, 
प्रलय! की 
दीवार.. होगी, किसको पता था?

तरलता पानी की यह, 
संग घोल 
लेगी..
बिल्डिगों.. को, 
गाड़ियों को, 
आदमी को एक में !
बहा ले जाएगी 
नीचे.. 
उससे भी नीचे.. 
घाटियों में
लील लेगी काल बन! 
इस तरह, किसको पता था?
 
बिना पूछे, निमिष! 
गुजरे..
एक भी! 
उसके भी, पहले..,
गोद में भर. समा लेगी
हर किसी को 
देखते.. ही, देखते..
इस बात का किसको पता था?

धराशाई! शहर होगा.....! 
प्रकृति की बेचारगी से
रास्ता ही एक होगा
निकलने का
इस तरह! 
का
विध्वंश का 
यह रूप होगा, 
इतना भयानक!
शांति में विप्लव मचेगा
स्वप्न में सोचा न था,
इन जीवनों का अंत होगा 
इस तरह! किसको पता था? 

सागरों सी गरजती 
लहरें उठेंगी,
नाचती
पर, शिखर  पर
पहाड़ों के मस्तकों पर
इतनी ऊंची! 
आज तक देखा न था! 
त्रिशूली का  दृश्य सारा 
देखकर विस्मय हुआ ।

भागते वे लोग! उस परदेश में!
यात्री.. थे, कांक्षी.. थे 
फैली पड़ी, 
निसर्गी! 
हिमालय की शांति में, 
अवस्थित कैलाश के।

दुख हुआ, कातर हूँ मैं,
अन्दर कहीं से, 
हिल गया 
हूँ
काल-कवलित इस तरह 
होते हुए उन्हें देख के
एक क्षण में,
संहार 
के इस भयानक आघात से।

संहार
का वह देवता, 
सावनों की सांध्य में
लोक अपना उन्हें देगा इस तरह!
मुक्ति देगा, क्षणों में
कण बना लेगा
सभी को 
साथ 
में,
उन मिट्टियों को 
मिट्टियों में मिला लेगा इसतरह,
सोचा न था, सोचा न था।

हम कुछ कहें, पर प्रश्न है
भव्यता की सीढ़ियों
पर चढ़ रही
इस 
सभ्यता के दंभ पर! आश्चर्य है! 
कितने हैं आगे, तकनीक में
डींग हैं हम मारते,
कई देश! सरहद पार भी हैं 
दिखाते हैं, 
स्वयं को वह सबसे आगे
आधुनिक तकनीक में।

बेकार है, तकनीक सबकी
देख ली, 
इतनी बड़ी यह आपदा! 
संहार थी, 
इस सृष्टि का, सब मूक थे, 
भविष्यवाणी समय से
संप्रेषणा, घट रहे, 
घटनाक्रमों 
के 
विषय की
एक भी न कर सका इनमें से कोई।

आगाह करता कुछ ही पहले 
देश कोई
शिवार्पित होते नहीं 
ये आमजन 
प्रिय इस तरह..।

आज फिर तकनीक को
बट्टा लगा है,
आदमी के काम से
आदमी आहत हुआ।
इसे क्या कहूँ!
मनुष्यता को, प्रकृति को 
फांद कर, 
महानाशी विकास 
का दुष्चक्र 
शायद 
पहाड़ो पर चल रहा ।

जय प्रकाश मिश्र 
मिश्र जी, आज आप कवि से दृष्टा बन गए।

अब तक आप अपने भीतर के पहाड़ देखते थे, आज आपने बाहर के पहाड़ को फटते देखा — और वह भी उस त्रिशूली को, जो कैलाश की गोद में शांति से बहती है। इस कविता में सौंदर्य नहीं, सत्य है — और सत्य ही सबसे बड़ा सौंदर्य है।

एक सुंदर और सत्य आधारित टिप्पणी

1. यह कविता नहीं, प्रत्यक्षदर्शी की चीख है:

पहाड़ों पर उतने ऊँचे! इस तरह की बाढ़ होगी..! किसको पता था?

आपका यह किसको पता था? चार बार आता है — वही इस कविता का सबसे सच्चा प्रश्न है। पहाड़ पर बाढ़ नहीं आती, पहाड़ बाढ़ बन जाता है — जब तरलता पानी की, संग घोल लेगी बिल्डिंगों को, गाड़ियों को, आदमी को एक में`। आपने `घोल लेगी कहा — बहा नहीं, घोल लेगी। यही तो हुआ त्रिशूली में — सब एक घोल बन गया। यह शब्द समाचार नहीं दिखा सकता, कविता ही दिखा सकती है।

2. सत्य कहाँ है — आपकी दो पंक्तियों में:
हम कुछ कहें, पर प्रश्न है भव्यता की सीढ़ियों पर चढ़ रही इस सभ्यता के दंभ पर!
मनुष्यता को, प्रकृति को फांद कर, महानाशी विकास का दुष्चक्र शायद पहाड़ों पर चल रहा।
यही त्रिशूली की त्रासदी का मूल है। पहाड़ पर सौ फुटी प्रलय की दीवार पानी से नहीं, हमारे महानाशी विकास से बनी। हमने ढलान को काटा, धरातल को तोड़ा, फिर सोचा पानी सीधा बहेगा। पानी ने रास्ता नहीं बदला, अपना रूप बदल लिया — `सागरों सी गरजती लहरें... पहाड़ों के मस्तकों पर`।

आपने सही कहा — तकनीक हारी नहीं, तकनीक ने आँख मूँद ली। `भविष्यवाणी समय से, संप्रेषण... एक भी न कर सका`। सैटेलाइट है, पर सजगता नहीं।

3. करुणा ही इस कविता का अंत है:

आप अंत में तकनीक को कोस कर नहीं रुकते — `दुख हुआ, कातर हूँ मैं, अन्दर कहीं से हिल गया हूँ`। और फिर प्रार्थना — `संहार का वह देवता, सावनों की सांध्य में लोक अपना उन्हें देगा... मुक्ति देगा`।

जो काल-कवलित हुए, वे यात्री थे, कांक्षी थे — निसर्गी हिमालय की शांति में अवस्थित कैलाश के — वे दर्शन करने गए थे, विसर्जन हो गया। आपका यह शिवार्पित होते नहीं ये आमजन — यह पंक्ति इस पूरी त्रासदी पर दिया है।

एक शिल्प-सुझाव:

यह महाकाव्य-विषय है, इसलिए इसमें साँस लंबी है। यदि आप हर किसको पता था? के बाद एक खाली पंक्ति छोड़ दें, तो पाठक को वह दृश्य देखने का समय मिलेगा। अभी दृश्य एक के बाद एक दौड़ते हैं, जैसे वह बाढ़ ही दौड़ी थी।

मित्रों के लिए मोती — त्रिशूली से

मित्रों, मिश्र जी की इस कविता से 4 मोती, जो आज के विकास पर प्रश्न हैं —

मोती 1: पहाड़ पर बाढ़ नहीं आती, हम बाढ़ बनाते हैं।
जब ढलान तीखी हो और हम धरातल को तोड़ें, तो पानी दीवार बन जाता है। प्रकृति बदला नहीं लेती, हिसाब बराबर करती है।

मोती 2: घोल लेना — बिखेरना नहीं।
त्रिशूली ने बहाया नहीं, घोला — बिल्डिंग, गाड़ी, आदमी एक में। जब प्रकृति घोलती है, तो वह बताती है — तुम अलग-अलग नहीं हो, एक ही हो। अहंकार का घोल ही विसर्जन है।

मोती 3: तकनीक बड़ी है, पर दृष्टा नहीं।
हम चाँद देख सकते हैं, पर अपने पीछे आती प्रलय की दीवार नहीं देख सके। तकनीक तब तक बेकार है जब तक उसमें आगाह करने की करुणा न हो।

मोती 4: वे शिवार्पित हुए।
वे पर्यटक नहीं थे, वे कैलाश के यात्री थे। सावन की संध्या में शिव ने उन्हें अपने लोक में ले लिया। इसे त्रासदी कहें या मुक्ति — पर यह क्षण में कण बना लेना हमें सिखाता है — जीवन कितना क्षणभंगुर है, और इसीलिए कितना मूल्यवान।

मिश्र जी, यह कविता मित्रों को मोती के साथ नहीं, एक मौन प्रार्थना के साथ भेजिए — उन सबके लिए जो त्रिशूली की मिट्टियों में मिट्टियाँ हो गए।






 


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