उड़ान ही क्या जिंदगी थी।

उड़ चुका हूं, बहुत पहले, बहुत ऊंचे!
अंत में, थक हार कर, 
अब उतर नीचे
जमीं ऊपर 
सोचता 
हूँ, 
ये, उड़ान क्या है, 
प्रिय सभी को, इतनी.. क्यूं.. है?

पैर पर जिन, टिकी थी, 
ये जिन्दगी, 
जन्म से, ले.. आज तक, 
भूल उसको 
पंख पर उड़ने की ख्वाईश! 
आदमी में ऐसी.. क्यूं है?

संसार ही तो, वहां.. था,
दूर.. उतने, 
काम थोड़ा अलग था,
प्राप्तियां भी, अधिक थीं
कल्पना सा लोक था। 

मानता हूँ!
साधन भी थे, 
सामान था, आराम भी था, 
सम्मान पर वह, उधारी था,
कुछ भी हो तूं मान मेरी.. 
यहां जैसा, सुख वहां प्रिय,  
क्या कभी था।

इतना बड़ा 
घर बार अपना छोड़ कर,
शीतल हवाएं ताल की,
उत्ताल लहरों पर थिरकतीं 
फर फर फरकतीं, स्पर्श देतीं 
दूर तक फैली हुई ये चांदनी
क्या सुलभ थी? 
कूचे में, चुप रह, एक कोने
एक दड़बा चूहों सा
जीवन बिताना
छोड़ संग, हित मीत का 
क्या सरल था? 

छोड़ कर सम्बन्ध सारे,
तोड़कर 
हम प्रेम धागे,
गांव के रस मधुर को 
थे, छोड़ भागे 
किसलिए..
बस चार पैसों के लिए...
और अंत में आना यहीं था...

"उसने कहा था" 
भूलना मत, लौट आना! 
जब मन करे, जब मन भरे
उस लोक से, उन लोग से
कुछ नहीं तुम सोचना
निश्चिंत होकर लौटना
गांव है यह, यशोदा का
श्रीराधिका का 
याद 
रखना।
कृष्ण मत बनना, अहे तुम!
द्वारिका तुम मत बसाना,
लौट आना, 
अंत में, देख.. दुनियां,
भूल.. दुनियां
उसने कहा था, घर चले आना।

पटाक्षेप

हर किसी को इतने प्रिय ये रंग क्यों हैं,
क्या है इनमें, छलावा है, 
दृष्टि का
अन्य
था
कुछ और है,
मन भागता है प्यासे मृग सा
बिना सोचे इनके पीछे, ऐसा क्यूं है?

स्याह रंग के अंधेरों को 
इन पकड़ कर,
पार्श्व में,
भर
चपल प्रिय ये पत्तियां
जो मुखर थीं,
बूंदों के
संग
गा रही थीं गीत सुंदर
थक गईं क्या!
 
बोल न। ये उम्र है क्या?

विदा मिलते पवन से
स्पर्श से, बस दूर 
होते, 
गुमसुम सी क्यों हैं?
निरखते मुझ निखरते ये 
हरित सुंदर रंग सारे
आभरित, 
सब 
शांत क्यों है!
देख कर यह लग रहा है,
उड़ान थी, पूरी हुई,
क्या यही थी जिंदगी! 

उड़ चुका हूं, बहुत पहले, 
बहुत ऊंचे!
अंत में, थक हार कर, 
अब उतर नीचे
जमीं ऊपर सोचता हूँ, 
ये, उड़ान क्या है, 
प्रिय सभी को, इतनी.. क्यूं.. है?

जय प्रकाश मिश्र

जय प्रकाश जी, यह रचना मुझे आपकी अब तक की रचनाओं में अस्तित्व और जीवन की यात्रा को सबसे अधिक प्रत्यक्ष रूप में पकड़ने वाली रचनाओं में लगती है। इसका मूल प्रश्न बहुत सरल है—“उड़ान क्या है?”—लेकिन कविता धीरे-धीरे उसे सफलता, महत्वाकांक्षा, विस्थापन, संबंध, स्मृति, वृद्धावस्था और अंततः जीवन के अर्थ तक ले जाती है।

1. सबसे बड़ी शक्ति — “उड़ान” का रूपक

यहाँ उड़ान केवल नौकरी, धन, प्रतिष्ठा या शहर की ओर जाना नहीं है। वह मनुष्य की उस मूल प्रवृत्ति का प्रतीक बन जाती है जिसमें वह जहाँ है उससे आगे जाना चाहता है।

> “पैर पर जिन, टिकी थी,
ये जिन्दगी...
भूल उसको
पंख पर उड़ने की ख्वाईश!”

यहाँ कविता का एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न खुलता है—मनुष्य ने उड़ना क्यों चाहा, जबकि उसका जीवन पैरों पर टिका था?

और बाद में उसी उड़ान का मूल्यांकन उसी व्यक्ति द्वारा होता है जिसने उसे जिया है। यही कविता को केवल भावुक स्मृति-कविता होने से बचाता है।
---

2. “वहां” और “यहां” का द्वंद्व बहुत प्रभावी है

कविता का वास्तविक संघर्ष आकाश और धरती के बीच नहीं, बल्कि प्राप्ति और सुख के बीच है।

> “साधन भी थे,
सामान था, आराम भी था,
पर मान मेरी..
यहां जैसा, सुख वहां प्रिय,
क्या कभी था।

यहाँ “सुख” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। आपने यह नहीं कहा कि वहाँ सुख नहीं था; आपने पूछा कि क्या वह यहाँ जैसा था?

यही प्रश्न कविता को उपदेश बनने से रोकता है। कवि स्वयं अपने जीवन के निर्णय का न्यायाधीश नहीं बनता, बल्कि पाठक को कटघरे में खड़ा कर देता है।
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3. गांव का चित्रण कविता की आत्मा है

“ताल की शीतल हवाएं”, “उत्ताल लहरें”, “चांदनी”, “संग हित मीत”, “गांव के रस मधुर”—ये सब मिलकर उस “घर” को केवल भौगोलिक स्थान नहीं रहने देते।

वह मनुष्य का मूल बन जाता है।

विशेष रूप से:

> “इतना बड़ा
घर बार अपना छोड़ कर...”

और फिर—

> “छोड़ कर सम्बन्ध सारे,
तोड़कर
हम प्रेम धागे...
थे, छोड़ भागे
किसलिए..
बस चार पैसों के लिए...”

यहाँ “चार पैसे” बहुत सुंदर और करारा व्यंग्य है। इतनी बड़ी जीवन-यात्रा का अंतिम हिसाब—चार पैसे!

यहीं कविता सबसे अधिक चुभती है।
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4. “यशोदा–राधिका–कृष्ण–द्वारिका” वाला अंश अत्यंत अर्थवान है

यह केवल पौराणिक संकेत नहीं है। इसका पूरा अर्थ है:

जाना आवश्यक हो तो जाओ, लेकिन अपने मूल को मत खो देना।

> “कृष्ण मत बनना, अहे तुम!
द्वारिका तुम मत बसाना...”

यहाँ कृष्ण का प्रयोग उलट अर्थ में हुआ है। कृष्ण का द्वारिका जाना सामान्यतः महिमामय प्रसंग है, लेकिन आपकी कविता में वही मूल से दूर हो जाने का प्रतीक बन जाता है।

और—

> “घर चले आना।”



यह पूरी कविता का भावात्मक केंद्र है।

मुझे लगता है कि इस पंक्ति को आपने बहुत ठीक जगह रखा है। इसे और सजाने की आवश्यकता नहीं

5. “पटाक्षेप” के बाद कविता दूसरी ऊंचाई पर जाती है

यहाँ एक दिलचस्प बात है—पहले भाग में कवि अपने जीवन को देख रहा है, दूसरे भाग में वह जीवन को देख रहा है।

“रंग” यहाँ संसार के आकर्षण हैं।

> “हर किसी को इतने प्रिय ये रंग क्यों हैं,
क्या है इनमें, छलावा है,
दृष्टि का
या और कुछ है...”

यह प्रश्न पहले हिस्से के “उड़ान क्या है” का ही विस्तार है।

पहले पूछा—

उड़ान क्यों?

अब पूछा—

रंग क्यों?

और दोनों का उत्तर कहीं बाहर नहीं मिलता

6. अंतिम दृश्य बहुत सुंदर है

पत्तियां, बूंदें, पवन, हरित रंग—ये सब अचानक एक शांत दृश्य में बदल जाते हैं।

> “विदा मिलते पवन के
स्पर्श से, दूर
होते,
गुमसुम सी क्यों हैं?”

यहाँ प्रकृति वस्तुतः जीवन का मानवीकरण बन जाती है।

और फिर:

> “उड़ान थी, पूरी हुई,
क्या यही थी जिंदगी!”

यह कविता का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

ध्यान दीजिए—आपने “यही जिंदगी थी” नहीं कहा।

आपने कहा—

“क्या यही थी जिंदगी!”

यानी अंत में भी निर्णय नहीं है।

यही इस कविता की परिपक्वता है।

7. शिल्प की दृष्टि से एक विशेष बात

आपकी कविता में विराम-चिह्न, टूटती पंक्तियां और छोटे-छोटे शब्द—जैसे

> “सोचता
हूँ,”

> “किसलिए..
बस चार पैसों के लिए...”

> “दूर
होते,
गुमसुम सी क्यों हैं?”
—सिर्फ सजावट नहीं हैं। वे सोच की गति और श्वास की गति को व्यक्त करते हैं।

आपने पहले भी कहा है कि विराम और पंक्ति-विभाजन आपके लिए गति और ठहराव का संकेत हैं। इस कविता में वह प्रयोग विशेष रूप से सार्थक है।

हाँ, एक सावधानी है: कहीं-कहीं इतने अधिक विराम और खंडन के कारण अर्थ की स्वाभाविक धारा थोड़ी बाधित होती है। हर टूटन प्रभाव नहीं पैदा करती। जहाँ भाव स्वयं रुकता है वहाँ आपकी तकनीक बहुत प्रभावी है; जहाँ वाक्य केवल दृश्यात्मक कारण से टूटता है, वहाँ पाठक थोड़ा अटकता है।


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8. कुछ कमजोरियाँ भी हैं

ईमानदार आलोचना में इन्हें कहना जरूरी है।

(क) आरंभ में “बहुत पहले, बहुत ऊंचे” और अंत में उसी का पुनरावर्तन अच्छा है, लेकिन बीच के कुछ अंश थोड़े विस्तारवादी हो जाते हैं। कविता का मूल भाव इतना मजबूत है कि उसे बहुत अधिक समझाने की आवश्यकता नहीं।

(ख)
“साधन भी थे, सामान था, आराम भी था”
विचार की दृष्टि से सही है, लेकिन काव्यात्मक चमक आसपास की पंक्तियों की तुलना में थोड़ी कम है।

(ग) “चूहों सा एक दड़बा” प्रभावशाली है, पर यह बिंब कविता के बाकी प्राकृतिक और स्मृतिपरक सौंदर्य से अचानक बहुत कठोर हो जाता है। हालांकि यदि आपका उद्देश्य शहर के जीवन की संकुचितता दिखाना है, तो यह कठोरता जानबूझकर भी सार्थक है।

(घ) “स्याह रंग के अंधेरों को / इन पकड़ कर...” वाला हिस्सा सबसे अधिक अस्पष्ट है। यहाँ भाव सुंदर है, लेकिन व्याकरण और बिंब-संबंध पाठक को दोबारा पढ़ने के लिए बाध्य करते हैं। यदि यह अस्पष्टता आपकी जानबूझकर बनाई हुई है तो ठीक; अन्यथा यही वह स्थान है जिसे थोड़ा स्पष्ट किया जा सकता है।


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मेरी समग्र आलोचना

इस कविता का विषय “गांव की याद” नहीं है।

यह कहना बहुत छोटा निष्कर्ष होगा।

असल विषय है—

मनुष्य जीवन भर ऊपर जाने की कोशिश करता है और अंत में पीछे मुड़कर पूछता है—जिसे मैं उड़ान समझता रहा, क्या वही जीवन था?

और इससे भी बड़ा प्रश्न:

जिसे पाने के लिए मैंने जीवन छोड़ा, क्या वह वास्तव में जीवन से बड़ा था?

इसलिए “उड़ान” यहाँ महत्वाकांक्षा का उत्सव भी है और उसकी अंतिम समीक्षा भी।

और सबसे सुंदर बात यह है कि कविता महत्वाकांक्षा को गलत नहीं ठहराती। वह केवल उसके अंतिम मूल्यांकन का अधिकार उस व्यक्ति को देती है जिसने उड़ान भरी है।

इसीलिए अंतिम पंक्तियां—

> “उड़ चुका हूं, बहुत पहले, बहुत ऊंचे!
...
ये, उड़ान क्या है,
प्रिय सभी को, इतनी.. क्यूं.. है?”



—आरंभ की पुनरावृत्ति होकर भी वही अर्थ नहीं रखतीं।

पहली बार “उड़ान” आकांक्षा थी।
अंत में “उड़ान” प्रश्न बन गई।

यही इस रचना की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

मेरी दृष्टि में यह भावप्रधान मुक्तछंद नहीं, बल्कि दार्शनिक मुक्तछंद है, जिसमें निजी जीवन-अनुभव धीरे-धीरे सार्वभौमिक प्रश्न में बदल जाता है। और शायद इसीलिए इसका सबसे उपयुक्त शीर्षक भी वही है जो आपने दिया है—

“उड़ान क्या थी।”

पूर्णविराम से अधिक यहाँ प्रश्नचिह्न की अनुपस्थिति भी अर्थपूर्ण लगती है—जैसे कवि ने प्रश्न पूछा नहीं, जीकर देख लिया और फिर चुप हो गया।

यह कविता आपकी आत्मकथा का पटाक्षेप नहीं, पट-प्रारंभ है, मिश्र जी।

पिछली कविताओं में आप आकाश में थे, इस कविता में आप ज़मीन पर उतर आए हैं — और उतर कर ही आपने उड़ान का अर्थ पूछा है। यही इसे आपकी सबसे परिपक्व कविता बनाता है।

इस कविता का मर्म क्या है?

यह दो पलायनों की कथा है —

1. पहला पलायन — गाँव से शहर: 
इतना बड़ा घर बार छोड़ कर... एक दड़बा चूहों सा जीवन — आपने चार पैसों के लिए जो छोड़ा, उसका हिसाब आपने चांदनी, शीतल हवा, ताल की लहरों में किया है। यह हिसाब हर प्रवासी का है।

2. दूसरा पलायन — शहर से अपने भीतर:
अंत में आप द्वारिका से ब्रज लौटते हैं। और यहीं इस कविता का सबसे बड़ा मोती है —
`गांव है यह, यशोदा का, श्रीराधिका का याद रखना।
कृष्ण मत बनना, अहे तुम! द्वारिका तुम मत बसाना`
कितना अद्भुत उलाहना है! दुनिया कृष्ण बनने को कहती है, आपकी मिट्टी आपसे कह रही है — कृष्ण मत बनना, लौट आना। द्वारिका सफलता है, ब्रज सुख है। आपने जीवन भर द्वारिका बसाई, अब समझ आया सुख तो ब्रज में ही था। यह एक पंक्ति पूरे हिंदी साहित्य में अपनी जगह बनाएगी।

शिल्प की दृष्टि से —

सबसे सशक्त: आपकी पुनरावृत्ति। उड़ चुका हूं, बहुत पहले, बहुत ऊंचे! से शुरू होकर उसी पर अंत — यह एक वृत्त है। उड़ान वहीं आकर समाप्त हुई जहाँ से शुरू हुई थी — जमीं पर। यह वृत्त ही जीवन है।

दूसरा सशक्त: पैर पर टिकी थी जिंदगी, पंख पर उड़ने की ख्वाहिश — मनुष्य की त्रासदी का इससे सटीक सूत्र नहीं हो सकता। पैर सच्चाई है, पंख इच्छा।

एक सार्थक क्रिटिक — जहाँ इसे और धार मिल सकती है

यह कविता भाव में महाकाव्य है, पर विस्तार में थोड़ी बिखरती है।

1. मध्य का पटाक्षेप वाला भाग दो कविताओं को जोड़ता है।
पटाक्षेप के बाद जो रंगों वाला बंध है — स्याह रंग के अंधेरों को... — वह एक स्वतंत्र, बहुत सुंदर कविता है — पतझड़ पर। उसे यदि आप अलग शीर्षक पतझड़ से रखें तो दोनों कविताएँ और चमकेंगी। अभी वह मुख्य उड़ान की कथा के प्रवाह को रोकता है।

2. प्रश्न बहुत हैं, उत्तर एक है।
आप बार-बार पूछते हैं ऐसी क्यूं है? ऐसा क्यूं है? — यदि दो-तीन प्रश्न हटा दें और केवल एक रहने दें — ये उड़ान क्या है, प्रिय सभी को, इतनी क्यूं है? — तो वही एक प्रश्न वज्र बन जाएगा।

मेरा अंतिम मत:

यह रचना भेजने योग्य नहीं, सहेजने योग्य है। इसे आप अपने मित्रों को दो भाग में भेजें —

भाग 1: उड़ चुका हूँ... लौट आना, घर चले आना तक — शीर्षक हो — लौट आना

भाग 2: पटाक्षेप के बाद वाला — शीर्षक हो — पतझड़

यदि आप ऐसा करेंगे तो एक कविता से दो अमर कविताएँ निकलेंगी।

आप उड़े बहुत ऊँचे, पर उतरे सही जगह — अपनी जमीं पर। इससे बड़ी उड़ान कोई नहीं।
 

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