बैठ चिड़िया शाख पर है देखती,
बहक जाता हूँ, मैं.. अब भी
फंस हूँ जाता,
आज
भी,
मंजुली, हंसती हुई
इन रस्सियों के जाल में,
प्रियल कितनी, लुभातीं, ये सुनहरी।
लोल फंदे, झूलते ये,
मोह.. लेते,
चित्त..
मेरा
साथ कैसे, ले के उड़ते।
खींच लेते,
दृष्टि मेरी, मन मेरा
और मैं हूँ उलझ जाता,
चिपक जाता
फिर उन्ही कंटवासियों में,
बेर के काँटो में फिर से
तड़फड़ाता..!
पंख मेरे छिल गए हैं
खेल में इस
और मन है,
पा रहा हूँ अधभरा।
सच सुनो मुझमें है कोई
मत्स्य जिंदा!
बहती नदी का, नवेला!
लालची,
यह कूदता है, मचल जाता,
आज.. भी
भूलकर
पानी है कितना बह चुका।
ताक पर रख, भूतियों को
आज तक की
दौड़ता
हूँ,
संसार पा लूं...
मिथ्या है
यह,
अच्छी तरह हूँ जानता।
जानता हूँ,
जग है छिछला,
गहराइयां इसमें नहीं हैं,
कुछ नहीं हैं, पाट यह फैला हुआ।
भ्रांति हैं सब दृश्य, क्षण.. हैं
इन क्षणों में, कुछ नहीं
मात्र छाया सोच की,
स्वीकृति की
बनती बिगड़ती दौड़ती है।
स्थाई नहीं हैं
रश्मियां ,
रस्सियां बस लग रही हैं..
और मैं है,
एक चिड़िया शाख पर बैठी हुई,
देखती, लोल प्रिय यह दृश्य सारा..।
जय प्रकाश मिश्र
यह आपकी सबसे ईमानदार कविता है, मिश्र जी। पिछली कविताओं में आप ज्ञानी थे, यहाँ आप फँसा हुआ मनुष्य हैं। और यही इसे महान बनाता है।
एक अच्छी क्रिटिक
1. इस कविता का साहस — स्वीकारोक्ति:
जानता हूँ, जग है छिछला... मिथ्या है यह, अच्छी तरह हूँ जानता — जानते हुए भी बहक जाता हूँ, फँस हूँ जाता`। ज्ञानी का फँसना, अज्ञानी के फँसने से अधिक पीड़ादायक होता है। आपने इस पीड़ा को छिपाया नहीं। `पंख मेरे छिल गए हैं — यह पंक्ति केवल कवि ही लिख सकता है, उपदेशक नहीं।
2. तीन बिंब जो इसे अमर बनाते हैं:
सुनहरी रस्सियाँ: बंधन अगर काला होता तो कोई फँसता ही क्यों? आपका बंधन मंजुली, हंसती हुई, सुनहरी है। यही माया का सबसे सच्चा रूप है।
बेर के कँटीले वन में तड़फड़ाना: रस्सी खींचती है और अंत में बेर के काँटों में पटक देती है। यह पूरे संसार चक्र का एक चित्र है।
मछली: सच सुनो मुझमें है कोई मत्स्य जिंदा! बहती नदी का, नवेला! लालची — मन को मछली कहना पुराना है, पर नवेला कहना नया है। बूढ़ा शरीर, पर मन आज भी नवेला, कूदता हुआ। यह आपकी अवस्था का सबसे सच्चा स्वीकार है।
3. दर्शन का शिखर — अंतिम 6 पंक्तियाँ:
`स्थाई नहीं हैं रश्मियां, रस्सियां बस लग रही हैं..
और मैं है, एक चिड़िया शाख पर बैठी हुई, देखती...`
यहाँ दो आप हो गए — एक फँसने वाला, एक देखने वाला। फँसने वाला तड़फड़ाता है, देखने वाली चिड़िया शांत है। यही साक्षी-भाव है। पूरी कविता का समाधान इसी एक बिंब में है।
कहाँ एक बारीक माँजने की गुंजाइश है?
भूतियों को ताक पर रख — यहाँ भूतियों शब्द अटकेगा। यदि अनुभवों को / सीखों को कर दें तो पाठक को आपकी वेदना तुरंत समझ आएगी। आप अनुभवी होकर भी दौड़ते हैं, यही तो पीड़ा है।
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मित्रों के लिए मोती — इस कविता से
मित्रों, इस कविता में 4 मोती हैं, जो हम सबके लिए हैं —
मोती 1: बंधन बदसूरत नहीं होते, सुंदर होते हैं, तभी हम फँसते हैं।
मोती 2: मन कभी बूढ़ा नहीं होता। शरीर के पंख छिल जाते हैं, पर भीतर की मछली आज भी नवेली और लालची बनी रहती है।
मोती 3: जानना मुक्ति नहीं है। जानता हूँ मिथ्या है — यह जानना काफी नहीं, देखते रहना पड़ता है।
मोती 4: अंतिम सत्य — हम दोनों हैं। एक वह जो रस्सियों में उलझा तड़फड़ाता है, और दूसरा वह जो शाख पर बैठा सब देखता है। जब तक हम पहले के साथ हैं, दुख है; जब दूसरे के साथ हो जाते हैं, मुक्ति है।
यह कविता भेजिए, मिश्र जी। यह उपदेश नहीं, एक सच्चे मनुष्य की डायरी है — और सच्चे मनुष्य की ही बात सबके दिल तक पहुँचती है।
मित्र, यह कविता मुझे आपकी पिछली कई कविताओं से अधिक भीतर की और अधिक ईमानदार लगी। यहाँ आप संसार को केवल दोष नहीं दे रहे; आप स्वयं को भी उसी मोह-जाल में पकड़ा हुआ देख रहे हैं। यही इसकी शक्ति है।
मेरी कड़ी आलोचना
सबसे सुंदर केंद्रीय बिंब है—
> “सच सुनो मुझमें है कोई
मत्स्य जिंदा!
बहती नदी का, नवेला!
लालची…”
यह बहुत अच्छा है। नदी बह चुकी है, समय निकल चुका है, फिर भी भीतर की मछली छलाँग लगाती है—पुरानी तृष्णा अभी मरी नहीं है। यह पूरी कविता का हृदय बन सकता है।
दूसरा बहुत अच्छा बिंब:
> “पंख मेरे छिल गए हैं
खेल में इस
और मन है,
पा रहा हूँ अधभरा।”
“अधभरा” बहुत अर्थवान है—इतना भोगा, इतना दौड़ा, फिर भी भीतर पूरा नहीं हुआ।
और अंत में—
> “मैं है,
एक चिड़िया शाख पर बैठी हुई,
देखती... यह दृश्य सारा।”
यहाँ कविता अचानक मोह में फँसे व्यक्ति से साक्षी की ओर चली जाती है। यह दार्शनिक उपलब्धि है।
लेकिन छेनी यहाँ जरूरी है
पहली पंक्तियों में “मंजुली”, “प्रियल”, “लोल”, “कंटवासियों” जैसे शब्द अर्थ को थोड़ा धुंधला कर रहे हैं। यदि ये आपके जानबूझकर चुने हुए निजी/काव्यात्मक शब्द नहीं हैं, तो इन्हें सरल करना कविता को अधिक शक्तिशाली करेगा।
विशेषकर “कंटवासियों” पर मैं रुक गया। यदि आपका आशय काँटों से बने फंदों/कंटकों से है तो शब्द को ऐसा रखें कि पाठक अर्थ खोजने में न अटक जाए।
दूसरी बात, रस्सी, फंदा, काँटे, मत्स्य, नदी, चिड़िया, रश्मियाँ—बिंब बहुत हैं। अधिकांश सुंदर हैं, पर कविता को एक मुख्य धुरी चाहिए। मेरे विचार में वह धुरी है:
फंदा → मछली → नदी → चिड़िया।
इन चारों को बचाकर बाकी जगह थोड़ी कटौती की जा सकती है।
तीसरी बात—
> “जग है छिछला, गहराइयां इसमें नहीं हैं”
यह विचार आपकी कविता के बिंबों की तुलना में कुछ सामान्य है। इसे आप पहले से निर्मित नदी के बिंब से ही कह सकते हैं। यानी बताने के बजाय दिखाइए।
सबसे महत्वपूर्ण सुझाव
आपकी कविता का असली संघर्ष है:
“जानता हूँ कि मोह मिथ्या है, फिर भी भीतर की मछली काँटा देखकर कूद पड़ती है।”
बस! यही इतना बड़ा सत्य है कि इसके लिए बहुत दर्शन समझाने की जरूरत नहीं।
इसलिए मैं इसे काटते समय कविता को और दार्शनिक नहीं, बल्कि और दृश्यात्मक बनाऊँगा।
आज का “मित्रों का मोती”
मोह का जाल बाहर कम, भीतर अधिक होता है।
मन जानता है कि नदी बह चुकी है,
फिर भी भीतर की मछली
हर चमकते काँटे पर
आज भी छलाँग लगा देती है।
शायद मुक्ति मोह के मिटने में नहीं,
उसे पहचानकर भी
उसमें न फँसने में है।
यही आपकी कविता का मुझे मिला हुआ मोती है।
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