इसे कैसे बेंचता

एक टुकड़ा जमीं का, 
मेरे पास भी है, 
आज भी 
है,
पैरों के नीचे
खड़ा हूँ, जिस जमीं पर,
पाँव भर, तेरे सामने, 
अब भी बचा है,
इसे कैसे छींनता संभव नहीं था।

ज्यादा कभी था 
तब मैं सुखी 
था 
जोतता था, जमीं अपनी,
बैल थे, हल था, कुआँ था।
फसलें उगाता 
हर तरह की, बेचता था।

पसीने में डूबकर, 
परिश्रम कर
अंधेरों में ही सही, 
तब खुशी थी अंदर कहीं
दिन बीतता था।

काम था, ईको बना था
खर्च तो बिल्कुल
नहीं था,
मात्र! 
माचिस, 
नमक, मिट्टी तेल की 
दरकार थी, 
मुफलिसी में बहुत था
पर सुखी था।

क्या नहीं मैं उगाता था,
हर खेत में,
नेचुरल एक ढाल था,
विशिष्टता थी, चढ़ता था कोई
शक्ति लेता, बुवाई से,
रहर, सनई  अन्यथा 
किसी दाल से
उतरता था, रबी की उन फसल से..
तब कहां यह नत्रजन था, 
ना कहीं पोटास था,
मात्र तब कंपोस्ट गोबर खाद था।

गाय के गोबर से घर
तब लीपकर.. 
आम की
पल्लव
सजा
कर
ईश पूजा का यहां, विधान था
घंटियां हर घर में बजतीं,
गोधूलि में, 
गाएं थीं लगतीं, दूध देतीं शाम को
मस्त जीवन, 
मस्त घर, वन, प्राणि जीवन
सुख यहां था, आनंद था।

आज सब है,
खड़े ट्रैक्टर, खड़े ट्रेलर
डीजल है महंगा, खर्च अनहद! 
कहां हैं हम...
मात्र गेहूं, धान बोते आज हम!
इसलिए क्या पंगु हैं हम।

किसान हैं हम आज के,
परेशाँ हैं,
सुकुआर हैं अब,
मुँह अंधेरे उठते थे हम
आज उठते दोपहर
कहां थे हम, कहां हैं हम।।।

कोई रास्ता दो, 
कोई मुखर तो हो
बोल न! खेत में, 
बिना विष छिड़काव के,
फूल ही रुकते नहीं अब 
फसल के इन सब्जियों के,
बेंच खाए क्या करें,
बिक गया, वन, बाग, उपवन...

इसलिए
एक टुकड़ा जमीं का, 
मेरे पास भी है, 
आज भी 
है,
पैरों के नीचे
खड़ा हूँ, जिस जमीं पर,
पाँव भर, तेरे सामने, ही बचा अब
इसे कैसे बेंचता, संभव नहीं था।

जय प्रकाश मिश्र

क्रिटिक भी पढ़ें..
एक सार्थक क्रिटिक - आपकी कविता पर
जय प्रकाश जी, ये सिर्फ कविता नहीं है, एक पूरे जीवन का बयान है। और इसलिए ये बहुत सच्ची और बहुत अपनी लगती है।
1. इस कविता का मूल भाव क्या है?
इस कविता की आत्मा दो पंक्तियों के टकराव में है -
"इसे कैसे छींनता वह, संभव नहीं था" से शुरू होकर
"इसे कैसे बेंचता, संभव नहीं था" पर खत्म होना।
पहले में बाहरी आक्रमण से जमीन बचाने का गर्व है, दूसरे में अंदर के दबाव में भी जमीन न बेचने की जिद है। यही पूरी किसान चेतना का सार है। जमीन आपके लिए प्रॉपर्टी नहीं, पाँव भर खड़े होने की अस्मिता है।
आपने बहुत खूबसूरती से तीन काल दिखाए हैं -
कल: जब ज्यादा जमीन थी, पर जरूरतें कम थीं - माचिस, नमक, मिट्टी तेल। सुख था।
कल से आज का संक्रमण: जहाँ गोबर की खाद, रहर-सनई-रबी का प्राकृतिक चक्र, नीम-आम के पल्लव वाला जीवन था।
आज: जहाँ ट्रैक्टर खड़े हैं, पर किसान पंगु है। खर्च अनहद है और फसल सिर्फ गेहूं-धान तक सिमट गई है।
2. क्या बातें बहुत मजबूत हैं?
बिंब-विधान: गोधूलि में गाएं, गोबर से घर लीपकर, बैल थे, हल था, कुआँ मेरा था - ये बिंब पढ़े नहीं, देखे जाते हैं। आज की पीढ़ी के लिए ये एक डॉक्यूमेंट्री हैं।
पारिस्थितिक बोध: ना नत्रजन था, ना कहीं पोटास था, मात्र तब एक ही कंपोस्ट था - ये पंक्ति आज के ऑर्गेनिक फार्मिंग के सारे विमर्श पर भारी है। आपने जिसे जिया है, लोग आज उसे किताबों में ढूंढ रहे हैं।
सच्चाई का दर्द: खड़े ट्रैक्टर, खड़े ट्रेलर, डीजल है महंगा - ये प्रगति का सबसे बड़ा व्यंग्य है। साधन बढ़ गए, साध्य छोटा हो गया। मात्र गेहूं, धान में ही रह गए हम! पंगु हैं हम - ये आज के भारतीय किसान की सबसे सटीक आत्म-स्वीकृति है।
3. शिल्प पर एक पाठकीय सुझाव
आपकी कविता मुक्तछंद में है, पर उसकी लय आपके बोलने की लय है, इसलिए वो कहीं अटकती नहीं। फिर भी दो जगहों पर थोड़ा कसाव इसे और धार दे सकता है।
क) दोहराव का प्रयोग: एक टुकड़ा जमीं का की आवृत्ति आपने टेक की तरह की है, जो बहुत अच्छा है। पर बीच में आज सब है और कहां हैं हम... कहां थे हम जैसे टुकड़े उसी टेक को थोड़ा बिखरा देते हैं। यदि इन पंक्तियों को भी उसी पहली लय में - छोटे-छोटे, रुके-रुके शब्दों में - तोड़ दें, तो इसका करुण प्रभाव और गहरा होगा।
जैसे -
आज सब है /
ट्रैक्टर खड़े हैं /
ट्रेलर खड़े हैं /
पर...
ख) अंत का विस्तार: अंत में खेत में, बिना विष छिड़काव के, फूल रुकते ही नहीं हैं - ये पंक्ति पूरी कविता की सबसे आधुनिक और सबसे पीड़ादायक पंक्ति है। ये सिर्फ खेत की नहीं, पूरे समय की त्रासदी है। आप चाहें तो अगली किसी रचना में इसी एक बिंब को केंद्र में रख सकते हैं।
अंतिम बात
ये कविता नॉस्टैल्जिया नहीं है। ये एक आत्मनिर्भर जीवन-दर्शन का शोकगीत और प्रतिरोध दोनों है। आप सुखी होने की परिभाषा बदल रहे हैं - जहाँ सुख का मतलब ज्यादा होना नहीं, कम जरूरतों में पूरा होना था।
इसमें शिकायत से ज्यादा जिजीविषा है। पाँव भर जमीन बची है, पर उसी पर आप पूरी मजबूती से खड़े हैं। और वही इस कविता को हार की कविता नहीं, बची हुई उम्मीद की कविता बनाता है।
इसे संभाल कर रखिए। ये आने वाले समय में और भी प्रासंगिक होगी।
मित्र, यह कविता मुझे आपकी अब तक की रचनाओं में सबसे अधिक जमीन से जुड़ी हुई लगी। इसमें स्मृति है, कृषि का अनुभव है, पर्यावरण की चिंता है और वर्तमान किसान की विवशता भी—लेकिन इसकी असली शक्ति “एक टुकड़ा जमीन” के रूपक में है। जमीन यहाँ केवल संपत्ति नहीं, स्वावलंबन, पहचान और बची हुई स्वतंत्रता है।
जो बहुत प्रभावशाली है
आरंभ और अंत का लगभग एक ही बिंब—
> “एक टुकड़ा जमीं का,
मेरे पास भी है…”


बहुत अच्छा घेरा बनाता है। शुरुआत में जमीन बची हुई है, अंत में वह बेचने से इनकार बन जाती है। यही कविता का भावात्मक मेरुदंड है।
यह अंश भी बहुत सजीव है—
> “बैल थे, हल था, कुआँ मेरा था।
फसलें उगा कर
हर तरह की, बेचता था
पसीने में डूबकर…”


यहाँ कोई भाषण नहीं है—जीवन स्वयं बोल रहा है।
और—
> “मात्र माचिस,
नमक, मिट्टी तेल की दरकार थी,
मुफलिसी में बहुत था
पर सुखी था।”


यह कविता की सबसे मार्मिक जगहों में है। आपने पुराने ग्रामीण जीवन को आदर्श बनाकर नहीं, उसकी कम जरूरतों और आत्मनिर्भरता के माध्यम से याद किया है।
कृषि वाला हिस्सा बहुत महत्वपूर्ण है
> “रहर, सनई बुवाई से,
उतरता था, रबी की उन फसल से..
ना नत्रजन था, ना कहीं पोटास था,
मात्र तब एक ही कंपोस्ट था।”


यहाँ कविता अचानक कृषि-स्मृति से कृषि-दर्शन में प्रवेश करती है। यह हिस्सा आपकी निजी स्मृति से आगे जाकर आज के कृषि संकट पर प्रश्न करता है।
लेकिन यहीं एक सावधानी भी है—तथ्यात्मक भाषा कविता को कहीं-कहीं कृषि-लेख जैसा बना देती है। “नत्रजन”, “पोटास”, “कंपोस्ट” आपके अनुभव का हिस्सा हैं, इसलिए इन्हें हटाना आवश्यक नहीं; बस इनके आसपास की पंक्तियों को थोड़ा कसना चाहिए।
सबसे जरूरी छेनी
> “काम था, ईको बना था
खर्च तो बिल्कुल
नहीं था…”


“ईको बना था” अस्पष्ट है। यदि यह आपके स्थानीय प्रयोग या किसी विशेष अर्थ में है तो ठीक, लेकिन सामान्य पाठक यहाँ अटक जाएगा। यह शब्द कविता की गति रोकता है।
इसी तरह—
> “विशिष्टता थी, चढ़ता था कोई…”


यहाँ अर्थ पकड़ना कठिन है। संभवतः आप फसल-चक्र और मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता की बात कर रहे हैं। इसे स्पष्ट करने की जरूरत है।
वर्तमान का कटाक्ष अच्छा है
> “आज सब है,
खड़े ट्रैक्टर, खड़े ट्रेलर
डीजल है महंगा, खर्च अनहद…”


और फिर—
> “मात्र गेहूं, धान में ही रह गए हम!
पंगु हैं हम।”


यह बहुत सीधा और प्रभावी है। “पंगु हैं हम” को रहने दीजिए। यह पूरी समस्या को दो शब्दों में पकड़ता है।
लेकिन—
> “सुकुआर हैं हम”


यदि यह स्थानीय शब्द है तो आपकी अपनी मिट्टी की गंध देता है; यदि व्यापक पाठक के लिए है तो अर्थ स्पष्ट करना पड़ेगा।
अंतिम प्रश्न बहुत अच्छा है
> “कहां थे हम, कहां हैं हम।।।”


यहाँ तीन बिंदु और विस्मयादिबोधक से ज्यादा सादा प्रश्न ही पर्याप्त हो सकता है। पंक्ति स्वयं इतनी मजबूत है कि उसे अतिरिक्त विराम-चिह्नों की जरूरत कम है।
और—
> “कोई रास्ता दो, कोई मुखर तो हो”


यह कविता को केवल विलाप बनने से बचाता है। आप शिकायत के बाद रास्ता मांगते हैं।
एक बात जो मैं बदलूँगा
अंतिम पंक्ति में आपने लिखा है—
> “इसे कैसे बेंचता, संभव नहीं था।”


जबकि आरंभ में—
> “इसे कैसे छींनता वह, संभव नहीं था।”


दोनों अलग अर्थ देते हैं। यदि जमीन बचाने की बात है तो “छीनता” और “बेचता” में से कौन-सा मूल भाव है, यह तय करना जरूरी है।
मुझे आपकी कविता के वर्तमान संदर्भ में “बेचता” अधिक गहरा लगता है—क्योंकि जमीन आपके लिए अब आर्थिक वस्तु नहीं, बची हुई पहचान है।
मेरी अंतिम राय
यह कविता “पुराना अच्छा था, आज बुरा है” वाली सरल नॉस्टैल्जिया न बने—यही इसकी सबसे बड़ी चुनौती है। पुराने समय में गरीबी, श्रम और सीमाएँ भी थीं; आज विज्ञान और साधन भी हैं। आपकी असली बात इससे अधिक गहरी है:
हमने सुविधा तो बढ़ाई, पर क्या हमने मिट्टी से अपना रिश्ता खो दिया?
यदि इस प्रश्न को कविता के भीतर थोड़ा और स्पष्ट होने दिया, तो यह केवल किसान की कविता नहीं रहेगी—यह मनुष्य और जमीन के टूटते संबंध की कविता बन जाएगी।
और मेरे हिसाब से शीर्षक “एक टुकड़ा जमीं का” ही रहने दीजिए। बहुत साधारण है—और इसी साधारणपन में इसकी शक्ति है।


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