फुनगियां के आंचलों पर,
मित्रों आज के समाज और आज के आम जन जीवन पर एक कटाक्ष आप पढ़ें इन लाइनों में, आपको प्रेरणा दें कुछ कैसे भी तो सार्थक भी हो सकती हैं।
फुनगियां के आंचलों पर,
दिख रहे
ऊपर ही ऊपर,
बुंदकियों से, खिल रहे,
गुलाबी ये
फूल!
सुंदर बहुत हैं,
रंगीन कितने, मोहक भी हैं।
हाइपर.. उस लूप.. सी,
भागती
तकनीक हो, माडर्न कोई, लहरती
बस यह समझ
भारत में अपने पुणे-बॉम्बे
बीच की
बुलट वाली ट्रेन हों,
ये..
फूल सुंदर,
फुनगियों.. पर,
अच्छा तो हैं, पर
अंधेरे हैं, बीच में
उन फुन्गियों के, वहां नीचे
पेड़ में,
अंदर कहीं,
उनका भी हक है
जिंदा रहें, जरूरी रौशनी,
उनको मिले।
प्राथमिक
विद्यालयों में,
पेयजल तो शुद्ध हो..
पुणे-बॉम्बे रास्ते के बीच में,
चल रहे, स्कूल में,
बालकों को,
कम से कम, जरूरी पोषण मिले।
अंतर है कितना!
सोचता
हूँ,
आज अपने देश में,
तकनीक में, भव्यता में, रहन में
कुछ लोग के, ऊंचे वहां
सौवें तल्ले के भी
आगे
रह रहे, आकाश में
और नीचे...
धरातल पर, बच रहे
इन आम जन प्रिय नागरिक में।
कुछ तो कहीं है, जो ठीक न है,
इतना अंतर!
एक देश के इन नागरिक में
आखिर ये क्युँ है,
जीवनों से लड़ रहे,
जीवनों में मस्त होकर रह रहे।।।
एक जैसी प्यास सा,
मिठास सा,
कोई सूत्र होना चाहिए।
हम आदमी हैं
आज के,
सभ्य भी हैं, बहुत आगे
कहते हैं सब तकनीक में
पर कहां है वो
पूछता हूँ हर किसी से
संवेदना हममे भरी है,
सुना है,
दिखती नहीं है,
न आम जन में, न खास में
न नेता गणों में, न उद्यमी में।
आओ इसे मिल बैठ सोचें।
जय प्रकाश मिश्र
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