प्रश्न तो रह ही गया।

मित्रों जीवन और जीवन चक्र के रहस्यों पर ये लाइने आप को प्रसन्न करें।

शुरू से ही, हेरता.. हूँ
खोजता हूँ,
सत्य 
इस संसार में,
अनंत हो, पर सहज हो,
अवधारणा में आ सके, 
हर किसी के, कहां है वो..?

अतिसूक्ष्मता से ढूंढता हूं,
अनुभवों के, 
आंगनों 
में 
बुद्धि से,   
तर्क की तलवार का
वार कर.. कर.. काटता हूँ !
नागफणि के फनों को 
तौलता हूँ, तराज़ू में, अंतसों* के।

कपास के उन तंतुओं में, 
निरलस हैं जो, 
श्वेत हैं, 
निर्मल भी है, 
अन्दर कहीं, स्पष्ट हैं,
सुलझे हुए, रेशे अलग 
हैं, देखने में।

और काले बिनौले में,
बीज है जो...
अंकुर छुपाए, राज़ सारे
प्रकृति का इस, 
आत्म ज्ञानी संत सा, जो मौन है।

क्या हूं मैं? 
कौन हूँ? 
यही तो वह प्रश्न है..
इसके लिए, क्या है, मुझमें 
अंदर भरा, यह 
चल इसे ही खोलता हूँ, 
एक एक को मैं ध्यान से 
अति देखता हूँ!
कुछ नहीं, शांत होकर
आप* भीतर, वस्तुओं से मिल रहा हूँ।

दृश्य हैं, संसार के
भावना है, 
विश्वास है, निष्ठा भी है
गुण अनेकों, सत्व, रज, तम 
स्वार्थ के, परमार्थ के
सब मिल रहे हैं।

पृष्ठ हैं कुछ प्रेम के, दया के, 
दायित्व के, 
घृणा के.., क्रोध के
यथावत रखे हुए,
पर सब मिला कर देखता हूँ
संयम सभी पर कर रहा हूँ,
पा गया,  
मात्र ये अतीत हैं, संसार के।

एक कोने भय भी है, 
भविष्य का, 
रखा हुआ, कुछ कांपता सा, 
और यह क्या? 
द्वंद्व हैं 
ये
इस जिन्दगी की, ग्रंथियाँ के
गांठ है, उलझी हुई, ईश्वर अनीश्वर
पुण्य पापों से भरी
सुलझी नहीं.. जो
आठवें इस दशक में।
पर 
सभी 
संसार ही,
संसार से, कुछ अलग न है।

मैं.. तो बस दीवार हूँ! 
एक डिब्बा मात्र हूं!
संसार है रखा हुआ 
हर जगह 
मुझमे
बेकाम का 
जो मर चुका, 
और भय भी उसी का।

बाहर वही, 
भीतर वही, 
संसार ही।
तो मैं कहां हूँ? 
इन सभी के बीच प्रिय!
क्या मात्र मैं दीवार हूं यह।

सत्य कह दूं! संसार मैं हूँ..
संसार ही हूँ 
जब तलक इस देह में हूँ...
संसार अंदर.., संसार बाहर..
संसार रूपी महासागर, 
का कहीं.. 
मैं.. 
एक कण हूँ!
अलग मैं कुछ भी नहीं 
महासागर मैं ही हूँ, जहां भी हूँ।

स्वभाव से मैं मुक्त हूं, शुद्ध हूँ
शरीर में मैं.. चित्त हूं
चेतना की
अग्नि
हूं!
शरीरों में, जल रही 
बन रही, 
आहुति यह भस्म होती
काल पट पर छप रही,
छाया बदलती
प्रकृति का मैं यज्ञ हूँ।

जय प्रकाश मिश्र
शब्द भाव: अंतर्सों*: बुद्धि, विवेक, भावना, मन, हृदय आदि
आप भीतर*: अपने भीतर

Jai Prakash ji, ये आपकी अब तक की सबसे कठिन कविता है — और सबसे ईमानदार भी।

पहले आप संसार को बाहर ढूंढते थे — व्यापार में, जंतर-मंतर में, स्वतंत्रता दिवस में — अब आपने अंदर मुड़ कर देख लिया — कपास के तंतुओं में, बिनौले के बीज में, खुद में।

इसलिए इसकी समालोचना भी कठिन है — क्योंकि ये कविता नहीं, आपका आत्म-निरीक्षण है।

सार्थक समालोचना —

1. जहाँ आप ऋषि बन गए —
"कपास के उन तंतुओं में, निरलस हैं जो, श्वेत हैं, निर्मल भी है... और काले बिनौले से बीज है जो अंकुर छुपाए, राज सारे प्रकृति का इस आत्म ज्ञानी संत सा पर मौन है"
Jai Prakash ji, ये बिंब आपके जीवन का निचोड़ है — सफेद रेशे जो सुलझे हुए, अलग दिखते हैं — और काला बिनौला जो सब राज छुपाए मौन है — यही तो आपका "संसार ही मैं हूँ" है। बाहरी सफेदी — श्वेत, निर्मल — और अंदर काला बीज — जो अंकुर है, भविष्य है, मौन संत है।

ये एक बिंब आपकी सारी हिंग्रेजी-शुद्धता की बहस को खत्म कर देता है — क्योंकि ये बिंब किसी भाषा का मोहताज नहीं, ये खेत का बिंब है, आपके बचपन का बिंब है।

और दूसरा —
"पृष्ठ हैं कुछ प्रेम के, दया के, दायित्व के, घृणा के, क्रोध के यथावत रखे हुए, पर सब मिला कर देखता हूँ संयम सभी पर कर रहा हूँ, पा गया सब मिला कर मात्र हैं अतीत यह संसार के"
ये पंक्ति अस्सी साल का आदमी ही लिख सकता है — जो प्रेम और घृणा को एक ही अलमारी के पृष्ठों की तरह देख ले — और कह दे — ये सब अतीत है। ये वैराग्य नहीं, वीतरागता है।

2. जहाँ कविता स्वयं से ही उलझ गई —

आपने लिखा — "अतिसूक्ष्मता से ढूंढता हूं अनुभवों में आंगनों में बुद्धि के, तर्क की तलवार का वार कर कर काटता हूँ"

और फिर लिखा — "कुछ नहीं शांत होकर आज खुद से मिल रहा हूँ"

Jai Prakash ji, तलवार से काट कर शांत नहीं मिला जाता। तलवार से तो और टुकड़े होते हैं। शांति तो तलवार रख देने से मिलती है।

आपकी पूरी कविता दो विपरीत क्रियाओं में बँटी है —
एक तरफ — हेरता हूँ, खोजता हूँ, काटता हूँ, तौलता हूँ, पलटता हूँ
दूसरी तरफ — शांत होकर मिल रहा हूँ, मौन है, मुक्त हूँ, शुद्ध हूँ

जब तक हेरना चल रहा है, मिलना नहीं होगा। और आप दोनों एक साथ करना चाहते हैं — इसीलिए कविता के मध्य में — "भय भी है, द्वंद्व हैं, ग्रंथियाँ हैं, गांठ है उलझी हुई ईश्वर अनीश्वर पुण्य पापों से भरी सुलझी नहीं आठवें इस दशक तक भी" — ये स्वीकारोक्ति आ जाती है।

यही इस कविता की सबसे सच्ची पंक्ति है — आठवें दशक तक भी गांठ सुलझी नहीं।

3. जहाँ अंत में आप सत्य को छू लेते हैं, पर शब्दों से फिर बाँध देते हैं —

आपने अंत में बहुत बड़ा सत्य कहा —
"सत्य कह दूं! संसार मैं हूँ.. संसार ही हूँ... संसार रूपी महासागर में कहीं मैं एक कण हूँ! अलग मैं कुछ भी नहीं महासागर मैं ही हूँ"
ये अद्वैत का अंतिम सूत्र है — "मैं कण भी हूँ, महासागर भी हूँ" — पर आपने इसे दो बार, विरोधाभास में कहा — पहले "मैं एक कण हूँ", फिर "महासागर मैं ही हूँ" — पाठक को लगेगा आप कन्फ्यूज हैं, जबकि आप तो पूर्णता कह रहे हैं।

और फिर अंतिम बिंब —
"स्वभाव से मैं मुक्त हूं, शुद्ध हूँ, शरीर में मैं चित्त हूं, चेतना की अग्नि हूं! शरीरों में जल रही बन रही आहुति सी भस्म होती काल पट पर छप रही मात्र छाया बदलती प्रकृति का मैं यज्ञ हूँ"
यहाँ आप चित्त भी हैं, अग्नि भी हैं, आहुति भी हैं, भस्म भी हैं, छाया भी हैं, यज्ञ भी हैं — एक ही आदमी इतना कुछ एक साथ कैसे हो? कविता में एक प्रतीक गहरा होता है, छह प्रतीक उथले हो जाते हैं।

मेरी सार्थक राय — अंतिम —

ये कविता आपकी आत्मकथा का सबसे कीमती पृष्ठ है — इसे मित्रों के लिए नहीं, अपने लिए रखिए।

इसका शीर्षक होना चाहिए — "आठवें दशक की गांठ"

और इसे दो भागों में बाँट दीजिए —

भाग 1 — हेरना — जहाँ तक आप तर्क की तलवार से काटते हैं — "सुलझी नहीं आठवें इस दशक तक भी" तक।

भाग 2 — मिलना — जहाँ से आप शांत होकर मिलते हैं — "संसार मैं हूँ... प्रकृति का मैं यज्ञ हूँ" तक।

बीच में एक खाली पन्ना छोड़ दीजिए — वही खाली पन्ना आपका मौन बिनौला है — जो सब राज छुपाए है।

Jai Prakash ji, आप सत्य को ढूंढ नहीं रहे, आप सत्य को जी रहे हैं — ढूंढने वाला हेरता है, जीने वाला मौन हो जाता है — और आपका बिनौला वाला बिंब बता रहा है — आप धीरे-धीरे मौन की तरफ जा रहे हैं — वही तो मुक्ति है।

मित्र, यह कविता आपकी उन रचनाओं में है जहाँ स्मृति, आत्म-परीक्षण, तर्क और अद्वैत-बोध एक साथ आ गए हैं। इसका मूल प्रश्न बहुत बड़ा है—“मैं कहाँ हूँ, यदि मैं संसार से अलग नहीं हूँ?” और अंत में आप उसी प्रश्न को एक अस्तित्व-दृष्टि में बदल देते हैं।

मेरी सच्ची आलोचना यह है कि भाव और विचार बहुत मजबूत हैं, लेकिन कविता अभी कुछ जगहों पर अपने ही विचारों के भार से दब रही है। इसे और सुंदर बनाने के लिए जोड़ने से अधिक छांटने की जरूरत है।

1. कपास और बिनौले वाला रूपक — कविता का अनमोल मोती

> “कपास के उन तंतुओं में,
निरलस हैं जो,
श्वेत हैं,
निर्मल भी है…”



और फिर—

> “काले बिनौले से,
बीज है जो...
अंकुर छुपाए, राज सारे
प्रकृति का इस…”



यह बहुत मौलिक बिंब है। कपास का सफेद तंतु और उसके भीतर छिपा काला बीज—बाहर और भीतर, रूप और संभावना, पदार्थ और जीवन—कई स्तर खोल देता है।

इसे बिल्कुल नष्ट न करें। बल्कि यहीं थोड़ा ठहरना कविता के पक्ष में होगा।

2. शुरुआत में एक शब्द खटकता है

> “शुरू से ही, हेरता हूँ”



यदि “हेरता” आपका जानबूझकर चुना हुआ लोक-प्रयोग है तो ठीक; लेकिन सामान्य पाठक के लिए “देखता” या “निहारता” अधिक सहज होगा। फिर भी आपकी अपनी भाषा में “हेरना” है तो इसे केवल इसलिए न बदलें कि वह शास्त्रीय हिंदी नहीं है।

3. “तर्क की तलवार” सुंदर है, पर अगली पंक्ति भारी

> “तर्क की तलवार का
वार कर.. कर.. काटता हूँ!”



यहाँ गति अच्छी है, मगर—

> “तौलता हूँ, तराजू में, अंतसों के।”



“अंतसों” बहुवचन थोड़ा कृत्रिम लगता है। “अपने अंतस को” अधिक स्वाभाविक होगा।

4. मध्य भाग में कविता थोड़ी सूची बनने लगती है

> “भावना है, विश्वास है, निष्ठा भी है…”
“सत्व, रज, तम…”
“प्रेम के, दया के, दायित्व के, घृणा के, क्रोध के…”



विचार सही है, लेकिन इतने तत्व एक साथ गिनाने से काव्यात्मक ऊर्जा घटती है। आप पहले ही कह चुके हैं कि भीतर सब कुछ है। कुछ तत्व हटाकर पाठक की कल्पना को जगह दें।

5. यह पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण है

> “पर सभी संसार ही,
संसार से कुछ अलग न हूँ..
मैं.. कहीं!
बाहर वही, भीतर वही, संसार ही।”



यह कविता का दार्शनिक केंद्र है।

इसके बाद—

> “सत्य कह दूं! संसार मैं हूँ..
संसार ही हूँ…”



यहाँ पहुँचकर कविता वास्तव में अपने प्रश्न का उत्तर देने लगती है।

6. सबसे सुंदर निष्कर्ष

> “अलग मैं कुछ भी नहीं
महासागर मैं ही हूँ, जहां भी हूँ।”



बहुत अच्छी पंक्ति है। यह “मैं संसार का एक कण हूँ” और “महासागर मैं ही हूँ”—दोनों को एक साथ रखती है। इसमें अद्वैत का भाव आता है, लेकिन आपने उसे किसी दार्शनिक शब्दावली में नहीं बाँधा। इसे ऐसे ही रहने दें।

7. अंतिम चार-पाँच पंक्तियाँ शक्तिशाली हैं, पर सावधानी मांगती हैं

> “स्वभाव से मैं मुक्त हूं, शुद्ध हूँ
शरीर में मैं.. चित्त हूं
चेतना की
अग्नि
हूं!”



यहाँ विचार बहुत ऊँचा है, लेकिन कविता अचानक घोषणा करने लगती है। इसके पहले तक आप खोज रहे थे; यहाँ अचानक आप जान चुके हैं। यदि यह जानना ही कविता का चरम है, तो ठीक है—लेकिन तब उसे और संक्षिप्त करना अधिक प्रभावशाली होगा।

और—

> “प्रकृति का मैं यज्ञ हूँ।”



यह शानदार अंतिम बिंब है। क्योंकि पहले आपने जीवन को देखा, परखा, अपने भीतर खोजा और अंततः स्वयं को प्रकृति के यज्ञ में आहुति देते हुए पाया।

एक बड़ी बात

आपकी कविता का पूरा प्रवाह मुझे ऐसा दिखता है:

सत्य की खोज → बुद्धि से परीक्षण → अपने भीतर झाँकना → गुण-दोषों का संग्रह → द्वंद्व → संसार से अभिन्नता → महासागर → चेतना → प्रकृति का यज्ञ।

यह यात्रा बहुत सुंदर है।

इसलिए मेरी सलाह होगी—इसे और दार्शनिक मत बनाइए। इसे और साफ कीजिए।

आपके यहाँ विचार पहले से पर्याप्त हैं; अब उन्हें श्वास चाहिए।

और एक बात विशेष रूप से कहूँगा: “क्या हूँ मैं? कौन हूँ!” वाला प्रश्न कविता का प्रवेशद्वार है और “प्रकृति का मैं यज्ञ हूँ” उसका पटाक्षेप। इन दोनों के बीच जो यात्रा है, वही इस कविता का वास्तविक जीवन है।

अभी यह अंतिम प्रति नहीं है, लेकिन इसका ढाँचा बहुत मजबूत है। मेरी छेनी यहाँ लगभग 15–20% शब्द हटाएगी, नए विचार नहीं जोड़ेगी। तभी इसका अपना मौन भी सुनाई देगा।







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