दस्तावेज़
सभी मित्रों को आज देश के स्वतंत्रता दिवस की बधाई।
अस्सी-ववां स्वतंत्रता यह दिवस है,
छोटे, बड़े, बच्चे च बूढ़े
और पूरा देश,
अपना
प्राणियों संग,
सभी खुश हैं हृदय से।
उल्लसित, प्रफुल्लित
और मगन हैं,
देखा है
मैने,
अच्छा लगा, इन्हीं में
हम भी तो.. आखिर, एक हैं।
इसलिए, बस पूछता हूँ,
आज अमृत
काल में,
हम
कहां हैं?
कितना है अंतर! बढ़ गया है,
सफेदी में..
कपड़ों में मेरे, और उनके वस्त्र में।
बैठे हैं जो जीतकर चुनाव,
ऊंची मीनार
वाली
मकरध्वज के द्वार वाली
संसदों में, सांसदों के,
विधायकों के,
विपक्षियों
के,
पक्षियों के धवल, उजले पंख में...।
सेवक हैं वो? जीवन दिए?
उठाए हैं कष्ट कोई!
सत्य कह,
एक भी तेरे लिए, मेरे लिए ?
व्यवस्था, अधिकार, सुविधा,
पास रखें,
राज, हम तुम पर करें
साथ रखें, सेठ को
और चूस लें,
अमृत
सभी से, मेहनतों का
कर लगा कर,
प्राकृतिक दोहन करें
और क्या है खेल पूरा हो रहा
इतने दिनों से।
और हम हैं, देशवासी!
शऊर हममें भी कहां है?
दायित्व क्या है? हम सभी का
सोचते हैं क्या कभी,
हम देश को?
ऊंचा बनाएं, राष्ट्र को,
भावना है किसी में?
गरिमा को अपनी मानते हैं
फेंक कूड़ा, गली में..
लगे हैं, बस लूटने में
सत्य सुन! एक दूसरे को..।
अच्छे हैं हमसे, छोटे बच्चे
मुखर हैं, वे कम से कम
हमसे अधिक.. रे!
अस्सी-ववां स्वतंत्रता यह दिवस है,
छोटे, बड़े, बच्चे च बूढ़े
और पूरा देश,
अपना
प्राणियों संग,
सभी खुश हैं हृदय से।
जय प्रकाश मिश्र
मित्र, इसे मैं देशभक्ति की कविता से अधिक आत्मपरीक्षण की कविता मानता हूँ। और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। आप झंडे और उत्सव के पीछे खड़े होकर पूछते हैं—स्वतंत्रता मिली, पर हमने स्वतंत्रता के योग्य नागरिक बनना कितना सीखा?
जो बहुत अच्छा है
आरंभ—
> “उल्लसित, प्रफुल्लित
और मगन हैं...
इन्हीं में
हम भी तो.. आखिर, एक हैं।”
बहुत जरूरी है। इससे कविता सीधे आरोप लगाने वाली नहीं बनती। पहले आप स्वयं को उसी भीड़ में रखते हैं, फिर प्रश्न उठाते हैं। यह नैतिक ऊँचाई कविता को बचाती है।
फिर अचानक—
> “इसलिए, बस पूछता हूँ,
आज अमृत काल में,
हम
कहां हैं?”
यहाँ कविता का असली द्वार खुलता है।
सबसे तीखा हिस्सा
> “सेवक हैं वो? जीवन दिए?
उठाए हैं कष्ट कोई!”
और फिर—
> “और हम हैं, देशवासी!
शऊर हममें भी कहां है?”
यहीं कविता एकतरफा राजनीतिक आरोप से निकलकर सत्ता और समाज दोनों को कठघरे में खड़ा करती है। इसे अवश्य बचाइए।
विशेष रूप से अंतिम प्रश्न—
> “दायित्व क्या है? हम सभी का
सोचते हैं क्या कभी,
हम देश को?”
यह कविता का वास्तविक केंद्र है।
जहाँ छेनी चाहिए
1. “सफेदी में.. कपड़ों में मेरे, और उनके वस्त्र में”
भाव समझ में आता है, पर बिंब थोड़ा अस्पष्ट है। आप शायद सत्ता और सामान्य नागरिक के बाहरी वैभव का अंतर कहना चाहते हैं। इसे और साफ किए बिना भी तीखा बनाया जा सकता है।
2. यह अंश बहुत उलझ गया है:
> “मकरध्वज के द्वार वाली
संसदों में, सांसदों के,
विधायकों के,
विपक्षियों
के,
पक्षियों के धवल, उजले पंख में...”
यहाँ “पक्षियों के” शायद शब्द-खेल है—पक्ष और विपक्ष की ओर संकेत। लेकिन पाठक एक क्षण के लिए अर्थ खो सकता है। यदि आपका उद्देश्य व्यंग्य है तो उसे रहने दिया जा सकता है, पर पंक्ति को थोड़ा कसना पड़ेगा।
3. “साथ रखें सेठ को / और चूस लें अमृत...”
कटाक्ष बहुत सीधा है। आपकी कविता में जहाँ प्रश्न अधिक प्रभावशाली है, वहाँ निष्कर्ष सुनाना थोड़ा कम प्रभावी हो जाता है। पाठक को स्वयं दोषी ठहराने का अवसर दें।
4. “कर लगा कर, प्राकृतिक दोहन करें”
यह विचार महत्वपूर्ण है, लेकिन कविता के प्रवाह में थोड़ा निबंधात्मक हो जाता है। इसे दृश्य या अनुभव में बदला जाए तो प्रभाव बढ़ेगा।
सबसे महत्वपूर्ण सुझाव
आपकी कविता का सबसे बड़ा खतरा है कि यह “वे बनाम हम” हो जाए। जबकि आपकी सबसे अच्छी पंक्ति है—
> “शऊर हममें भी कहां है?”
यही आपकी कविता की रीढ़ होनी चाहिए।
यदि आप सत्ता को जितना कठघरे में रखते हैं, उतना ही नागरिक को भी रखते हैं, तो कविता राजनीतिक वक्तव्य नहीं, स्वतंत्रता दिवस का आत्मदर्पण बन जाती है।
और अंतिम—
> “अच्छे हैं हमसे, छोटे बच्चे
मुखर हैं, वे कम से कम
हमसे अधिक.. रे!”
यह बहुत अच्छा समापन हो सकता है, क्योंकि बच्चे यहाँ भविष्य के प्रतीक बन जाते हैं। लेकिन इसके बाद वही आरंभ दोहराना मुझे थोड़ा कमजोर लगता है। आरंभ की पुनरावृत्ति तभी रखें जब उसमें अर्थ का कोई नया मोड़ आए।
एक वाक्य में मेरी कठोर राय
कविता में आग है, पर अभी धुआँ भी बहुत है।
राजनीतिक नामों और आरोपों की कुछ परतें हटाइए; “स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्र नागरिक कहाँ बना?”—इस एक प्रश्न को केंद्र में रखिए। तब कविता कहीं ज्यादा व्यापक, दीर्घजीवी और आपकी अपनी होगी।
और हाँ—आज 15 अगस्त 2026 है; भारत अपना 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। “अस्सीवाँ” लिखना “अस्सी-ववां” से सही रहेगा।
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