स्मृतियाँ

मित्रों, उम्र हर क्षण शेष होती है, और स्मृति में अशेष रह जाती है। और एक दिन अंत में स्मृतिशेष हो लोगों में चली जाती है। जीवन पट का एक टुकड़ा आपके लिए प्रस्तुत करता हूं, आपको अच्छा लगे बस और क्या।

उम्र की माला में, इस..
फूल से, कुछ वर्ष हैं
किशोर 
वय 
के, 
धूसरित होते नहीं, 
आज भी, ताजे हरे हैं।

महकते.. हैं 
स्मृति में, स्निग्ध वैसे, 
आज भी रखे.. हुए 
समय की भी मार से
कुम्हलते.. बिल्कुल नहीं हैं।

तरंगित मन, कैसा चंचल,
सुकुमार था, तब!
निष्पाप कह 
सकता हूँ, 
मैं.. 
अब,
भावना में लिपट कर, 
यह मधुमयी! 
गोते लगाया, डूब कर तब।

कल्पना की 
धार में 
तैरता हो मत्स्य, कोई,
तरलता में सहज होकर
अहा कैसा, 
सरित में यह तैरता था
सोचता हूँ आज प्रिय, क्या मैं यही था?

चित्र अद्भुत! उस समय का
अभी भी है उभरता 
निकलता हो 
चांद 
काले बादलों से, 
धीमे धीमे पूर्णिमा का, 
बड़ा होता..
और मैं बैठा धरा पर, 
देखता हूँ 
समय की बहती नदी के किनारों पर
चुप शांत कैसे
मूक होकर, 
आठवें, इस बीतते प्रिय दशक में, 
निसर्गी, अंतर्मुखी इस शांति पट पर।

स्फुरन! होता है अब भी, 
सोच करके दृश्य वह,
शगल करती
लड़कियां
तब
देख लेतीं 
जिस किसी को, एक नज़र, 
उड़ती हुई, उड़ता था वह, 
आकाश में, 
एकांत में, कई दिन तक।

सौम्य सी मुस्कान ही 
उपहार थी 
तब,
हर किसी की
हर किसी को
सीमित सभी कुछ, बस यहीं तक।

याद है, सुरम्य सुंदर दृश्य वह!
खिलखिलाहट, हंसी की
बजती हुई
लघु
घंटियों सी, पनघटों पर।
 
छुनछुनाती, किनकती
उलाहने, और 
व्यंग से थी निकलती
एक संग, 
नववधू और बच्चियों की 
खुशनुमा आवाज वह।

गूंजती है, आज भी
आशीष ध्वनि!
उस समय की, दी गई..
हर शाम को, बहुओं को अपने,
जब पैर छूतीं सास की
रंग आलता से
चरन उनके।

और अग्रज औरतों के
फूल झरते, 
वाक् वे, 
हर एक के, आशीष बन के।

जय प्रकाश मिश्र








Comments

Popular posts from this blog

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

एक घंटा बिताते हो पार्लर... में,

बावरे ये नयन तेरे, शिकारी हैं!