खुशी तेरी और तूं..!

मित्रों आपकी प्रसन्नता के लिए आज की पंक्तियां प्रस्तुत हैं।

यह खुशी तेरी, और तूं..!
संग मिलकर, 
पिघल 
कर,
एक हो जाओगी जब..., 

और यह पहनी 
खुशी,  
कपड़ों सी ऊपर 
समस कर, रसते हुए 
कपड़ों के नीचे, सिमट कर
तुझे ढाल लेगी, अपने अंदर...

तब कहीं तूं खुश मिलेगी 
हमेशा ही, चहकती
हर हाल में, 
हर काल 
में...,

एक गुण तुझको मिलेगा
पहचान देगा, 
खुशी 
का
की वही है तूं, अन्यथा.. गर 
रुनासी, 
तो खुशी न! कुछ और है, तूं..! 

अप्रभावित! गुण तेरा, 
संसार के हर 
कारकों 
से,
अविचलित
जब तक है, प्रिय
यही तो, वह द्रव्यता द्रव्य की। 
कीमती..! अपरिवर्तित, एक सी।

अपरिवर्तित यह रूप, 
गुण, सौंदर्य है,
औदार्य है,
जो
बांध लेता सभी को, 
एक जैसा, 
विश्वास की ही रस्सियों में।

अन्यथा इस रूप की 
क्षण विकृति भी,
दूर कर देगी 
तुम्हें, 
हर हृदय से,
स्वर्ण हो, मुक्ता-नवल, हीर कण 
चमकते हैं एक से 
हर हाल में, हर स्थिति में
तभी तो प्रिय, 
हर किसी को, यहां इस संसार में।

सोचता हूँ, क्या है मिलता 
साथ तेरे, 
कुछ नहीं, अनुभूतियां
संग की, पास की, संसर्ग की 
एहसास की, 
पर...
कहां हैं ले डूबतीं 
क्या हैं वे, उसे छू रहा हूँ, 
भावना के हाथ से
इतने गहरे, 
मनों में, किस तरह 
उद्विग्नता को, शांत करतीं..
अनुभूतियों की परत ही मैं खोलता हूँ।

द्रव्य है, हर एक में 
गुण हैं सबमें 
बाहरी, 
पहचान देता है सभी को
महसूसता हूँ
चंदनी सी
महक 
है तूं
चांदनी का रूप है तूं 
शांत स्थिर झील सी 
थोड़ा और गहरी
नीलवर्णी 
खींचती मुझे
पास अपने पुतलियां तेरी हैं प्रिय
सुवर्ण सुंदर केश हैं 
यह सभी गुण हैं, मात्र तेरे बाहरी
तूं जानती है, यह नहीं तूं।


और मैं, एक रिसेप्टर सा
इन सभी का, 
पर अलग 
सौ..,
पर्सेंट तुमसे,
बीच में, मेरे तेरे देख न
आकाश है, 
वायु में परमाणु हैं, काल है,
प्रकाश है, अनगिनत कंपन भी हैं
घेरे हुए, उन्हीं में एक मन मेरा, 
और इंद्रियां हैं, 
किलोल करतीं किस तरह..
सब साथ हैं..
एक लय एक ताल हैं, जब तलक
सुख तभी तक है..

अन्यथा 
बदलते.. ही एक पल की 
परिस्थिति,
दूर कर देती हमे,
जी... यही तो, वह नियति है,
मिला देती, छुड़ा देती
चाहते ही, एक पल में।

बीच में इस सुख के प्रिय,
हर खुशी में
वह 
नियति भी साथी है अपनी
मान इसको, जान इसको।

स्वार्थी हम कितने हों, 
चाहते हों
एक दूसरे को, 
प्राणपन 
से 
पर सुखद अनुभूतियां 
सब योग हैं,
आत्मा की, परमाणु की, 
काल की, आकाश की 
और अपने मन के संग 
इन इंद्रियों की 
बिना इनके यह नहीं।

अब समझ ले
समष्टि जीवन में सभी।

जय प्रकाश मिश्र











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