न्याय की दरकार किससे।
मित्रों, संसार स्वयं में सुंदर और अप्रतिम प्रगतिशील है। मनुष्य केवल आपस में प्रेम से रहें और अन्य प्राणियों को प्रेम करें तो आज ही सारी समस्याएं स्वतः हल हैं। इसी पर ये लाइने।
तत्व होंगे बहुत सुंदर,
पुराने आदर्शों में..
मनुष्यता के, संस्कृति के
सजा कर रखे हुए
करीने से,
बांट के, छांट के,
खांचों में भर के,
धारणीय हैं क्या ?
धारणीय हैं क्या ?
आज भी
सब उस तरह ही,
आदमी की जिंदगी में, बात है ये..!
इसलिए, सार्थक
एक बहस होनी चाहिए
आदर्श ऊपर, संस्कृति के,
धरणीय हों वे,
यम नियम आदर्श सारे
न रहें रखे हुए,
केवल वहां
बस किताबों तक सुशोभित
किसी मेज़ पर रखे हुए
शांत! चुप! खिलते हुए गुलदान से।
वह समय बीता
राज बीता
विदेशियों का काल बीता,
सदी बीती.. अरी यह
इस नव सदी में
मानसिकता हर किसी की
अब बदलनी चाहिए
और कानून भी वो..
राजसी,
सारे बदलने चाहिए।
नियामक इतने कड़े..,
आदर्श! प्रिय इतने बड़े..
ये.. किस लिए?
आदमी,
आदमी ही, बस रहे
जानवर वह न बने।
वह सहज हो, सामान्य हो
बुद्धि का उपयोग
अपनी
कुटिलता में, छद्म में
चालाकियों से निकृष्टतम
स्वार्थ के अपराध में, वह न करे।
सोच न!
यह न्याय की
दरकार किससे, आज
सबको
क्या प्रकृति से, जानवर से?
जी नहीं, मात्र!
पापी और दुष्ट! आदमी से।
जरूरत ही नहीं है
नियामक
किन्हीं किताबों की,
आदर्शों के किसी संहिता की
आदमी यदि
आदमी बन कर रहे।
व्यापार करना
आदमी का बंद कर दे।
जय प्रकाश मिश्र
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