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Showing posts from October, 2025

राधा ने चुनरी ओढ लई! सखि आज गुलाबी री।

मित्रों! राधा.. निश्चय ही, नैसर्गिक आनंद, की अनुभूति हैं, और जब वह स्वयं प्रसन्न हो जॉय तो क्या कहने, वर्षा आनंद की और इसी में आज आप भी भीगें।  अरी....!  रंग, ओढ़ि... लई...!  हां.. हां.., ओढ.. लई,  राधा... ने,  चुनरी...,  आज.., गुलाबी  री!  पितांबर... पर!  अरे...! पितांबर पर... झलक...!  पड़ी,  सखि,  आज..., गुला...ली   जी!  राधा.. ने,  चुनरी.., ओढ़ि लई.... सखि, आज.. गुलाबी री! ।   सांवर! कान्हा... अरे! सांवर! कान्हा... हां.. रे! सांवर... कान्हा,  चिहुंकि..! पर् यौ...,  छवि..!  देखि...  दुलारी...  की.., छवि... देखि, दुलारी.. की..., राधा... ने, चुनरी....  राधा ने, चुनरी.... ओढ़ि लई..  सखि... आज, गुलाबी... री!  हरसैंय.... गैया..., उछरैंय... बछरू,  उछरैंय... बछरू,  लहरय, यमुना...!   ठाट..., नवाबी... री !  राधा ने, चुनरी....  ओढ़ि लई..  सखि... आज, गुलाबी... री!  वन... फूलंय!  प्रिय..  झूमंय..  कैसे... अरे! झूमं...

मजाक न कर, ये आंसू हैं मेरे!

मित्रों! यह मजाक तो नहीं, पर अपराध तो है ही, किसी को बिना बताए उस पर लिखना। अपनी बस्तियों में ही रह रहे, कामगारों की लाइन से बनी झुग्गियों को फटे, काले टरपोलिन से ढके इस वर्षा में जब अलसुबह देखता हूँ तो वहां एक सन्नाटा पसरा रहता है। और छोटे छोटे बच्चे दुबले फूल से निकलते है। उन्हीं भाग्यहीनों को समर्पित कुछ लाइने रूपक के माध्यम से आपको प्रेषित हैं। आप पढ़ें, आनंद लें।  गुमसुम! सी क्यूं.. हो,  बताओ.. कुछ..!  सुनाओ..?   न..,  हाल.. अपना..;   रात..  काली!  निर्दयी..!  और.. निष्ठुरी!  आज.. की,  किस.. तरह..!  गुजरी...., दुधमुंहे, बच्चों के संग!  इन, बरसती.. धूर्जटी.., बारिश, के संग। टुप.. टुप.., टुपुकु..ती*..  रात.. भर,  मुक्ता.. कणों सी,  धवल.. उजली.. गिर, रही.. थीं,  बूंद, बन.. बन.. बिस्तरों, चूल्हे.. के ऊपर,  क्षण.. अनुक्षण..! भिगाती..  हे देवि, सच में डराती! ये रात काली..!   कैसे गुजरी! औंधे..! पड़े,  उस आदमी* संग। बीती.. तो  होगी..., ठिठुरते.. और भीगते.., करते... जतन!...

सौंदर्य! प्रिय इस देश सा जग में नहीं!

मित्रों, अपने बारे में तो हमे जानना ही चाहिए इसी पर एक रूपक के साथ कुछ लाइने आप के लिए, पढ़ें और आनंद लें। कितने...! दिनों.. से सोचता हूँ!  कौन... हूँ, मैं...? पार्थिव... यह देह, प्रिय..  जो!  दीखती....,  हर.. नजर.. को, क्या..! एक, सी.., है !  बिल्कुल.. नहीं, अलग.. कुछ, घर.. के लिए.. अलग.. हूँ, तेरे.. लिए!  और!  सच..  सुनो, बिल्कुल अलग,  जग.. के  लिए! इस लिए ही, पूछता हूँ  कौन, हूँ.. मैं?  क्या पार्थिव से अलग...  कुछ.. हूं..?  आत्मा.. सा अपार्थिव.... मैं!  दृष्टि से, हर.. दूर हूँ, मैं..! खोजता हूँ!  कौन... हूँ! मैं... पूछता हूँ! आप भी.. से,  कोई, जानता हो, बता दे! क्यों...,  यहां.. हूँ!  मैं... इस धरा.. इस काल में,  इस रूप में, मैं.. इतने... समय,  तक.. के लिए!  फिर.. शून्य हूँ मैं!  कुछ! तो... होगा,  जादुई... इस,  नृत्य.. के,  नेपथ्य...  में, चाहता.. हूँ! उठा.. दूं!  जादुई... यह,  यवनिका..,  क्षितिज पर..  जो  टंग  रही है,...

दो, चित्र.. हैं घर में, मेरे,

मित्रों, जीवन खेला ही है, स्मृति का, प्रेम का, सुख दुख, पश्चाताप और आंसुओं का इसी पर कुछ लाइने आप के लिए। दो, चित्र.. हैं, घर.. में, मेरे,  पुराने..!  रखे हुए,  शो.. पीस से,  अब...,  पड़े... रहते..! रातदिन!  कोनों.. में, अपने.. कमरे में, एक..  बंद. खिड़की, बंद.. दरवाजे किए..। वास्तविक...! दो, चित्र.. हैं, घर में मेरे पुराने..! रखे हुए!  एक् धुंधलका है..,  घर में, इनके..,  पर्दे, लगे.. हैं, रीने... झीने.. इन्हें...,  देखकर..!  मुझको  लगा, अति..  पुराने...  हों, रो...! रहे.., कुछ, कह.. रहे हों!  बहुत धीमे... कान में, मेरे... प्रिये...! दो, चित्र.. हैं, घर में, मेरे..,  साबुत.. अभी.. प्रिय..!  पुराने..! रखे हुए!  उठते.. भी हैं,  बोलते..., ये.. सच..!  झगड़ते.. हैं!  पर, आपस.. ही में,  देखा है, मैने.. तीखे.., प्रिये, किसी मिर्च से.. भी और... ज्यादा, तिल..मिलाते,  उलाहने! एक दूसरे  को दे रहे..!  दो, चित्र.. हैं, घर.. में, मेरे,  सच्चे... प्रिये!  पुराने....

लुहार! हूँ, मैं.. आत्मा... का,

सच!  शिकारी.. हूँ!  मैं, प्रिये.., मैं..  ढूंढता हूँ...  वस्तु अपनी,  दर.. बदर क्यूं,  हर.. कहीं..!  मिलती  नहीं,  मैं, क्या करूं?  इसलिए तो, सोचता हूँ,  रात दिन,  दुनियां.. मेरी, प्रिय! यह नहीं !   वह, रूप! नहीं.., रंग! नहीं..,  स्वर्ण.. का  कोई.. खेल! बिल्कुल भी नहीं, सुगंध.. से ले, स्वाद... का  दूर... तलक,  मेरा...  प्रिय,  मतलब.. ही नहीं। सुर ताल सब,  लय.. विलय... हैं,  मेरे... लिए,  दृष्टिगत...  भौतिक प्रिये!   किसी.., चीज से...  संबंध  नहीं। लुहार!  हूँ,  मैं.. आत्मा... का, आत्मा.. ही खोजता हूँ!  एक भी हो, शुद्ध!  सात्विक,  प्रिय कोई... थक हार बैठा,  मिलती... ही नहीं।  संसार है यह! बौद्धिकों का!  व्यापार है, अड्डा.. प्रिये!   प्रिय.. वस्तुओं  का, प्रिय.  वस्तुओं से,  मेरा कोई, मसरब ही नहीं। अलग है, हर.. इकाई,  अपने.. में गुम है!   शरीरों.. की दास्तां है,  शरीर...

छबीली! मैने... सुना है!

मित्रों, एक शक्ति तो जरूर है, जो हम जीवों के प्रति मधुर दयालु है। उन्हीं पर चार लाइने आप पढ़ें, आनंद जरूर लें। छबीली!  मैने... सुना है!  तुम! घूमती.. हो!   बिल्कुल.. अकेली!   सिवानों.., में निर-निचाटे;  रात्रि प्रहर!  क्या, सत्य है यह?  नाचती..  बेलौस होकर... अर्ध.. रात्रि,  फसल..  ऊपर!  मोटी मोटी  बालियों..  के माथ पर। क्या सत्य है यह?  तुम!  निर अकेली,  बात करती, रात्रिभर.. उस, चंद्रिका.. संग!  वह चांदनी जो..  दुखाती है हृदय..  विरहम!   अरु...  नृत्य.. करती अनुपम..,  मनोरम..! देवि किम! सत्यम इदम?  क्या... है यह!  नदी.. तीरे,  पुलिन पर,  तुम.. बिहरती हो..  उस दिवाने,  बहते.. पवन  संग!   घन अंधेरी रात में..!  देवि किम! सत्यम इदम?  दूर...  तुम..!  उन पर्वतों..के,  श्रृंग.. पर,  धवलिमा!   शैफाल सी फैली हुई, जो... उनके... ऊपर,  दौड़ती.. हो,  लगाती हो छलांगें..  बेहिचक!...

दुनियां! इसी पर नाचती है।

मित्रों, अपना जीवन क्या है! मुझे कभी कभी लगता है  "मैं, मैं.. हूँ" यह, मेरा केवल एक पक्का विचार मात्र ही है। जबकि मैं खुद से, काफी कुछ अनभिज्ञ आज भी, इस उम्र में हूं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद जरूर लें। एक गांठ थी,  मन में मेरे शंका! दुरूह...   रेशे.. जटिल, उलझे.. हुए एक दूसरे में, मिल रहे थे। विचार.. ही थे... कैसे.. मिले! की.. फ्यूज.. हों!  कन्फ्यूज!   मैं.. विचार..  वे ,  मेरे.. न.. थे।  परे..  थे, कुछ.. पढ़े... थे, बहुत.. कम, प्रिय..  कढ़े... थे। कुछ  सुने थे, अधपके, क्या! अधकचे थे। सने.. थे,  चिपके.. हुए, एक दूसरे से, लड़ रहे,  कभी.. जुड़ रहे,  कभी एक में, ना..  मिल.. रहे। इसलिए, स्पष्ट  ना...,  मुझे.. लग रहे थे। जीवन! उन्हीं में, चल रहा था, भीतर कहीं कुछ, पल रहा था, क्या है ये, फैला हुआ  चहुंओर मेरे!  सोचता.., मै.. रात दिन,  सचमुच,  दुखी.. था।  सच है ये!  अलग.. करना कठिन था,  और, मैं प्रिय, दुखी था,  पर खोजता था!  देखता दुनियां उसी में, झलक...