दो, चित्र.. हैं घर में, मेरे,
मित्रों, जीवन खेला ही है, स्मृति का, प्रेम का, सुख दुख, पश्चाताप और आंसुओं का इसी पर कुछ लाइने आप के लिए।
दो, चित्र.. हैं, घर.. में, मेरे,
पुराने..! रखे हुए,
शो.. पीस से,
अब...,
पड़े... रहते..! रातदिन!
कोनों.. में, अपने..
कमरे में, एक..
बंद. खिड़की, बंद.. दरवाजे किए..।
वास्तविक...!
दो, चित्र.. हैं, घर में मेरे
पुराने..! रखे हुए!
एक् धुंधलका है..,
घर में, इनके..,
पर्दे, लगे.. हैं, रीने... झीने..
इन्हें...,
देखकर..!
मुझको लगा, अति..
पुराने... हों, रो...! रहे..,
कुछ, कह.. रहे हों!
बहुत धीमे...
कान में, मेरे... प्रिये...!
दो, चित्र.. हैं, घर में, मेरे..,
साबुत.. अभी..
प्रिय..!
पुराने..! रखे हुए!
उठते.. भी हैं, बोलते..., ये..
सच..!
झगड़ते.. हैं!
पर, आपस.. ही में,
देखा है, मैने..
तीखे.., प्रिये, किसी मिर्च से..
भी और... ज्यादा, तिल..मिलाते,
उलाहने! एक दूसरे
को दे रहे..!
दो, चित्र.. हैं, घर.. में, मेरे,
सच्चे... प्रिये!
पुराने..! रखे हुए!
दूसरों... से, बहुत.. कम,
ही.. बोलते... हैं,
सभ्य हैं,
समय के, सरताज... थे...
अब! चादरों पर,
छप! चुके
हैं,
जाते..! जाते..!
सलवटों.. में, छुपे.. लगते...!
ऐसे.. प्रिये! ये.. हो.. गए....
दो, चित्र.. हैं घर में, मेरे,
अद्भुत! प्रिये...
पुराने..! रखे हुए!
रात को..
बेसुध... हुए
देख.. कैसे, हम-बिस्तर हुए,
दोनों... कन्हरते!
कभी, चिल्हकते...,
हिचकियां, लेते.. हुए
मुन्नों.. को, अपने.. याद.., कर कर
बात.. करते,
सयाने.. बच्चों.. की, किन ये!
मुस्करा, हंसते हुए...
कल्पना के, पर.. चढ़े!
कोई नहीं है, पास इनके..
मुंह.. अंधेरे!
ये.. खांसते.. हैं,
बेड़ों.. से, बेसबब..!
हांफते हैं, देर तक,
देखते..
आंख..! फैलाए.. हुए
अपलक.., प्रिये!
किसी.. आस में
या प्यास में,
यही हैं, ये... जानते!
एक.. दूसरे.. को,
मुंह.. फुलाए
गुब्बारे!
हों जैसे, पिचकते..!
गुलगुलाते, घुलघुले!
दो चित्र हैं
घर में मेरे, प्रिय, सलोने!
पुराने..! रखे हुए!
उठते.. भी हैं, कई.. बार ये,
जाड़े... के दिन हैं!
क्या इसलिए!
मैं, सोचता हूँ
निःशब्द! काली.. रात में.
दूर.., उस निचाट में
गुसलखाने...
तक.... के, लिए...
किस तरह, डुल.. हिल.. हिलाते..
पांव.. अपने, जमीं पर नहीं
चांद.. पर हों, रख रहे!
दो, चित्र.. हैं घर में, मेरे,
संतोषी.. प्रिये
यादें समेटे, जिंदगी की...
पुराने..! रखे हुए!
पूछते एक दूसरे से, हाल.. हैं,
बहुत.. गहरे!
रात..!
लंबी.. हो गई है,
आजकल...,
सुबह.. होती, ही.. नहीं है।
भाग.. जाती
धूप! कैसी.. उम्र सी,
जवानी.. सी,
हाय..!
रुकती.. ही, नहीं.. है।
कह... रहे थे,
प्रिय, कभी मनचले थे!
इस तरह के
दो चित्र हैं घर में मेरे,
प्रिय, सयाने...
पुराने..! रखे हुए!
वक़्त की, रफ्तार... पर
ये, चढ़.. चुके हैं,
वक़्त की
दीवार
से, ये देखते हैं,
बहुत नीचे....
पार...! प्रिय, उस पार...
जग को, बहुत... पीछे!
रेंगते... कभी भागते...
भ्रम... में पड़े....
दो चित्र हैं घर में मेरे,
प्रिय, अभागे*!
पुराने..! रखे हुए!
सागर..., मचलता! रात...दिन...!
जब! मौज पर था,
राज! था,
इनका..., प्रिये..!
पतंग से, उड़ते थे, ये..
तब, आसमां.. में
छोड़.. पीछे, हर किसी.. को!
क्या वे दिन थे!
जवां थे! ये..,
वक़्त भी, क्या चीज... है
चुप पड़े
अब सोचते...हैं
मत! सुनो, रहने ही दो..
पश्चाताप! की,
धधकती.. प्रिय-अग्नि में
जल रहे ये..,
दो, चित्र.. हैं घर में, मेरे,
प्रिय, सड़ रहे*!
पुराने..! रखे हुए!
राज.. है, तुम भी सुनोगे...
रंग सब फीके हुए,
राग.., सब..., अब..., गल.. रहे..
राम धुनि की, बात प्रिय
इस उम्र में
अब....., ये, कर रहे...
दो चित्र हैं घर में मेरे,
पुराने..! रखे हुए! विदा कहते..
सकल जग को
कौन जाने! हंस.. रहे, या रो.. रहे।
प्यारे हैं मुझको, कुछ भी हो
ये चित्र हूँ, मैं.. खुद प्रिये।
जय प्रकाश मिश्र
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