मजाक न कर, ये आंसू हैं मेरे!
मित्रों! यह मजाक तो नहीं, पर अपराध तो है ही, किसी को बिना बताए उस पर लिखना। अपनी बस्तियों में ही रह रहे, कामगारों की लाइन से बनी झुग्गियों को फटे, काले टरपोलिन से ढके इस वर्षा में जब अलसुबह देखता हूँ तो वहां एक सन्नाटा पसरा रहता है। और छोटे छोटे बच्चे दुबले फूल से निकलते है। उन्हीं भाग्यहीनों को समर्पित कुछ लाइने रूपक के माध्यम से आपको प्रेषित हैं। आप पढ़ें, आनंद लें।
गुमसुम! सी क्यूं.. हो,
बताओ.. कुछ..!
सुनाओ..?
न..,
हाल.. अपना..;
रात..
काली! निर्दयी..!
और.. निष्ठुरी!
आज.. की,
किस.. तरह..! गुजरी....,
दुधमुंहे, बच्चों के संग!
इन, बरसती..
धूर्जटी.., बारिश, के संग।
टुप.. टुप.., टुपुकु..ती*..
रात.. भर,
मुक्ता.. कणों सी, धवल.. उजली..
गिर, रही.. थीं, बूंद, बन.. बन..
बिस्तरों, चूल्हे.. के ऊपर,
क्षण.. अनुक्षण..!
भिगाती..
हे देवि, सच में डराती!
ये रात काली..! कैसे गुजरी!
औंधे..! पड़े, उस आदमी* संग।
बीती.. तो होगी...,
ठिठुरते.. और भीगते..,
करते... जतन! मैं, जानता.. हूँ!
जागते.. प्रिय, रात भर
और..
सोचते..,
कैसे.., खिलेंगे..
पुष्प..! कल, इन...
डालियों पर, सुबह.. ही,
जब.., प्रभा की, पहली.. किरन,
ऊषा, के संग, संदेश.. लेकर
आएगी, चहकती..,
चिड़ियों के
रंग,
वन.. तितलियां..
चुप.. चूम... लेंगी,
अधर... तेरा, चूस*... लेंगी,
बचा.. मधुकन!
हे देवि!
क्या.. तुम!
सुन! रही हो?
गुमसुम..! सी क्यूं.. हो!
बताओ.. कुछ..! सुनाओ.. न!
मुझे, हाल अपना..
रात.. काली
निष्ठुरी...
किस.. तरह..! गुजरी,
इन, नित.. बरसते,
दुखी, करते..
चिग्घाड़ते, प्रिय! बादलों संग।
चलो..,
ये..., अच्छा.. हुआ,
तेरी, डालियों पर, मुंह धुले..
इतने.. सबेरे.., दुबले.. दुबले..
फूल* तो हैं, खिल रहे,
कलियां* भी हैं,
कुछ,
पर, चुप* सभी,
धुल.. चुकी हैं, पत्तियां*
क्या रात भर!
तुम, सब नहाए..
बरसती, इन बदलियो संग..!
चू.. रहे, फटे..
इस, तिरपाल.. के संग!
ये, रात काली..! कैसे गुजरी!
सोचता हूँ,
देख! तुमको..
क्या कहीं, खोई हुई हो,
निर्धन के धन सा,
संजोई.. हो..
मधुर.. मीठे, प्रिय ख्वाब*
भी, वे...
चुलबुले! किसी कोने..
अपने.. लिए !
या, भागती.. और दौड़ती..
ही रह गई! ये.. जिंदगी,
भीगते
पानी में इस,
अंसुअन.. के संग...!
बता, न..!
ये.. रात.. काली
निष्ठुरी...!
किस.. तरह..! गुजरी!
ताप से तपते हुए, बचुअन* के संग।
कुछ तो बताओ?
चुप! चुप! सी, क्यों. हो!
बोल.. दो,
अरे...! देख, तो...
किस प्रेम से, सब.. पूछती हैं?
नन्ही! नन्ही प्यारी, चिड़ियां..!
घर पे तेरे, उतर.. कर, आकाश से।
विचारों सी हिल रही हैं,;
टहनियां..!
तुलसी.. की प्रिय!
कितनी.. मधुर..
छू.. रही हैं,
रस समझ, अंसुवन को तेरे,
अधर, छू.. छू..,
उड़ रही ये, तितलियां..।
चिंता न कर, लड़.. तूं, सदा!
जीवन.. यही है,
चीं.. चीं.. करती, कह रही है
लुप्त.. होती,
गौरियां*
एक.. से
दोनों, प्रिये! हम मित्र हैं!
मानव त्रसित! या भाग्यदंशित!
मूर्तियां..! सच, मूर्तियां।
जय प्रकाश मिश्र
भावार्थ:
टुप.. टुप.., टपकती*
टूटे घर के भीतर गिरता वर्षा का पानी।
औंधे.. पड़े, उस आदमी संग*
शराब पीकर कर्तव्य से विमुख लापरवाह पति आदमी।
अधर तेरा, चूस लेंगी *
तेरे गोदी के छोटे बच्चे, तेरा दूध सुबह ही पीने के लिए आतुर हो जाएंगे।
दुबले.. दुबले.. फूल*, खिल रही, कलियां*
पोषण से वंचित कमजोर फूल से कोमल बच्चे
कलियों* यानी नन्हीं नन्ही बच्चियां।
बचवन के संग* कई बच्चों के साथ।
धुल.. चुकी हैं, पत्तियां*
घर का सारा सामान खत्म हो चुका है।
या, मधुर..किसी. ख्वाब में*
भविष्य के लिए रंगीला कल्पना का संसार।
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