दुनियां! इसी पर नाचती है।
मित्रों, अपना जीवन क्या है! मुझे कभी कभी लगता है "मैं, मैं.. हूँ" यह, मेरा केवल एक पक्का विचार मात्र ही है। जबकि मैं खुद से, काफी कुछ अनभिज्ञ आज भी, इस उम्र में हूं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद जरूर लें।
एक गांठ थी,
मन में मेरे
शंका! दुरूह...
रेशे.. जटिल, उलझे.. हुए
एक दूसरे में, मिल रहे थे।
शंका! दुरूह...
रेशे.. जटिल, उलझे.. हुए
एक दूसरे में, मिल रहे थे।
विचार.. ही थे...
कैसे.. मिले! की.. फ्यूज.. हों!
कन्फ्यूज!
कन्फ्यूज!
मैं..
विचार.. वे, मेरे.. न.. थे।
विचार.. वे, मेरे.. न.. थे।
परे.. थे, कुछ.. पढ़े... थे,
बहुत.. कम, प्रिय..
बहुत.. कम, प्रिय..
कढ़े... थे।
कुछ
सुने थे, अधपके, क्या! अधकचे थे।
सने.. थे,
चिपके.. हुए,
एक दूसरे से, लड़ रहे,
कभी.. जुड़ रहे,
कभी एक में, ना..
मिल.. रहे।
इसलिए, स्पष्ट
ना...,
मुझे.. लग रहे थे।
जीवन! उन्हीं में, चल रहा था,
भीतर कहीं कुछ, पल रहा था,
क्या है ये, फैला हुआ
चहुंओर मेरे!
सोचता.., मै.. रात दिन,
सचमुच, दुखी.. था।
सच है ये!
अलग.. करना कठिन था,
और, मैं प्रिय, दुखी था,
और, मैं प्रिय, दुखी था,
पर खोजता था!
देखता दुनियां उसी में,
झलकती... थी,
देखता दुनियां उसी में,
झलकती... थी,
झांकती.. थी
मार्ग भी मुझे दिखाती थी,
पर, मित्र मेरे! मैं भ्रमित.. था!
मार्ग भी मुझे दिखाती थी,
पर, मित्र मेरे! मैं भ्रमित.. था!
यह अचानक! क्या हुआ,
सब घुल रहा था,
अलग होता..
अलग होता..
बाल जैसा
चोटियों में, फाड़.. हो, हो
गंछ.. रहा था,
आड में खुद के छिपा वह,
बाहर.. निकलता...
सच! मुझे, प्रिय..! दिख रहा था।
आड में खुद के छिपा वह,
बाहर.. निकलता...
सच! मुझे, प्रिय..! दिख रहा था।
कोई....,
खड़ा... था
अपने... पीछे,
खुद.. को, छिपाए
मुझे ऐसा लग रहा था।
मैं कहां था?
मुझे ऐसा लग रहा था।
मैं कहां था?
मैं नहीं था, था ही नहीं!
सब शून्य था,
विचार सुंदर एक मेरा
मान्यता से, मेरी.. खुद
मान्यता से, मेरी.. खुद
हे प्रिय, मेरे...
इतने दिनों से, 'मैं' बना था।
एक! सच.. बताऊं,
एक.. व्यवस्था,
मैं!
मात्र.. था
चलती.. हुई,
चलती.. हुई,
जीवन लिए, इस विश्व में
भरमता, इतने दिनों से चल रहा था।
कुछ इंद्रियों की, शक्ति थी,
लौकिक प्रिये!
संसार से,
संसर्ग..तक के ही लिए,
इससे ज्यादा
कुछ नहीं,,
क्षमता थी इनकी...
ये.. दिव्यता को, भूल कर भी
छू... सकें।
एक रूप लेकर,
मृत्तिका का, नित.. बदलता
मस्तिष्क का बस, खिलौना.. मैं,
प्रोग्राम.. थे
मस्तिष्क का बस, खिलौना.. मैं,
प्रोग्राम.. थे
बहुत सारे, मुझमें भरे!
कुछ जन्म से,
स्थान से, प्रिय! प्रियजनों के,
संस्कार से, जाति से,
संस्कार से, जाति से,
वर्ण के।
इस सभ्यता की,
मोटी... चादर ओढ कर!
भीतर घिनौना! मूल.. हिंसक!
स्वार्थी.., मैं...!
भीतर घिनौना! मूल.. हिंसक!
स्वार्थी.., मैं...!
सीमित.. सुखों, असीमित दुखों!
तक, मात्र, जग.. में,
इतने दिनों से, तेरे सामने..
इतने दिनों से, तेरे सामने..
ही, घूमता.. था।
पूछती हो!
कौन... हूँ मैं...?
विचार... हूँ, मैं...
एक अपना, पुष्ट है जो बालपन से,
हूँ.. यहां! इस रूप में!
इससे ज्यादा.. कुछ नहीं मैं।
नाम मेरा
एक पट्टा, जन्म से डाला हुआ
मेरे गले में, निकाल कर
मैं फेंकता हूं!
घुल रहा है, मैं..., मेरा,
प्रिय धीरे धीरे..
आ रहा हूँ सामने मैं, खुद.. ही अपने!
बहुत हल्का हो रहा हूँ
मैं... से, ऊपर.. उठ रहा हूं!
जो भी हुआ है, आज तक
मुझसे प्रिये!
मैं, उससे.. होता, दूर..!
अब....
एक लहर, जिंदा... बन रहा हूँ।
कुछ नहीं, अफसोस, अब.. है,
कुछ नहीं है, कामना..
कुछ नहीं, अवशेष अब.. है
कुछ नहीं है, पावना।
एक सच सुनो!
जितने तुम्हे!
यहां... दीखते हैं
विचार.. हैं सब, मात्र.. बस,
सब, जी.. रहे!
इसी को तुम सोचना..
और देखना, ये फर्क क्यों है
संयस्त कोई, गृहस्थ कोई, नृशंस कोई?
सोचना क्योंकर, हुआ ये...
जिंदगी है, चल रही..
पर विचारों में पल रही है।
पूछती हो!
विचार क्या है?
जटिल.. हैं,
काबू.. नहीं है किसी.. का,
इन पर प्रिये....!
पर, सच! यही है!
दुनियां इसी पर नाचती है, भागती है
एक पल में, छोड़ती, घर बार सब,
राग रंग वैभव, यही.. है।
प्रिय यही, अप्रिय.. यही है
किसी का भी, एक क्षण नियंत्रण
इन पर नहीं है।
जीवन हैं ये, मरण.. भी
प्रिय.. इन्हीं का है..।।।
विचार ही ये जिंदगी हैं।
विचार ही ये जिंदगी हैं।
जय प्रकाश मिश्र
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