लुहार! हूँ, मैं.. आत्मा... का,

सच! 
शिकारी.. हूँ! 
मैं, प्रिये.., मैं.. ढूंढता हूँ... 
वस्तु अपनी, 
दर.. बदर क्यूं, हर.. कहीं..! 
मिलती नहीं, 
मैं, क्या करूं? 
इसलिए तो, सोचता हूँ, रात दिन, 
दुनियां.. मेरी, प्रिय! यह नहीं!  

वह, रूप! नहीं.., रंग! नहीं.., 
स्वर्ण.. का 
कोई.. खेल! बिल्कुल भी नहीं,
सुगंध.. से ले, स्वाद... का 
दूर... तलक, 
मेरा... 
प्रिय, मतलब.. ही नहीं।

सुर ताल सब, 
लय.. विलय... हैं, मेरे... लिए, 
दृष्टिगत... 
भौतिक प्रिये!  
किसी.., चीज से... संबंध नहीं।

लुहार!  हूँ,  मैं.. आत्मा... का,
आत्मा.. ही खोजता हूँ! 
एक भी हो, शुद्ध! 
सात्विक, प्रिय कोई...
थक हार बैठा, 
मिलती... ही नहीं। 

संसार है यह! बौद्धिकों का! 
व्यापार है, अड्डा.. प्रिये!  
प्रिय.. वस्तुओं 
का,
प्रिय.  वस्तुओं से, 
मेरा कोई, मसरब ही नहीं।

अलग है, हर.. इकाई, 
अपने.. में गुम है!  
शरीरों.. की दास्तां है, 
शरीरों.. 
में, घुप.. है! 
उससे.. ऊपर, बात.. 
कोई..
करता... ही नहीं।

मर्त्य हैं,
ये.... नहीं.., 
इच्छाएं.. इन्की...
देख... ना, 
हर रोज खिलतीं, फूल.. सी 
हर रोज.. मुरझातीं.. यहीं।

पुत्र! तो अमरित! के हैं ये...
पर, दुखी, क्यों... हैं? 
सब.. कुछ!  प्रिये, है.. इन्हीं का
फिर! दरिद्र... क्यों है?  
एक ही, मानव.. सभी हैं 
सम्मिलित.. है, आत्मा..,
भौतिक सुखों की सेज पर
मानते! 
ये कुछ...भी नहीं।

मैटेरियल.. पर टंग गए,
नापते.. हर चीज को,
तौलते हैं, स्वाद.. को, 
सुगंध को भी बांटते! 
स्पर्श तक तो ठीक था
स्वरों... को हैं, बांधते! 
आत्मा.. को ये नहीं,  प्रिय! 
आज.. तक हैं, मानते।

किस तरह ये, विकल हैं, प्रिय! 
बीमार भी.. हैं,
रोग.. इनका, देह.. का, 
है... ही, नहीं...
पर.. प्रिये! वह कौन है? 
यह बात जो, इनसे.. कहे! 
अपने आगे, कब किसी की 
बात.. ये, हैं मानते।

इनकी, प्रिये... 
एक भूख है, निधि.. स्वर्ण की
सम्पन्नता.. की,
क्या.. अजब है! सच, गजब.. है! 
निधि भर गई, कितनी... प्रिये!  
यह भूख..! भरती ही नहीं !

कोई क्या करे, कैसे करे! 
अमृत का रस, 
ये.. चाखना, चहते... नहीं।
मिट्टी के आगे, एक पग
अपवर्ग के निसर्ग का 
कभी भी, रखते नहीं।

सब आत्माएं एक हैं
एक ही सब लोग हैं..
प्रिय! 
मिल.. सभी. 
इक.. कदम, इस बात पर!  
आज तक, रखते... नहीं!

जाति पर, धर्म पर, 
देश के भी, नाम पर..
नस्ल पर, सभ्यता पर...
मर रहे, मारते.. 
एक दूसरे को, देख कैसे।।।
ये आदमी. हैं? अरे, कैसे..! 
मुझे तो, लगते... नहीं ! 

रक्त का व्यापार है, सब,
मांस में लिपटा हुआ,
लोथड़ा, मस्तिष्क... इनका
मैटेरियल से और आगे
आज तक बढ़ता ही नहीं 
अटका हुआ है, वहीं प्रिय! 
हृदय... को, 
यह.. मानते ही, हैं..., नहीं..।

हर एक बच्चा 
अमानत.. है
खुदा.. की, भगवान.. की, 
ईसा... 
सभी... की,
जो.. एक है! इसे मानते ये हैं नहीं।
बांट कर उस, शक्ति.. को 
व्यर्थ के, मसले हजार 
ढो रहे सब ढोंग कैसे लड़ रहे, 
सब, खुद ही में, मारते है, बालकों को
वृद्ध को, बीमार को
ये... सोचते, तो.. हैं नहीं।

लुहार हूँ मैं, आत्मा... का,
आत्मा.. ही खोजता हूँ! 
एक भी हो, शुद्ध! 
प्रिय..! 
आज.. तक, 
कहीं... भी, 
मिलती... ही नहीं। 

शिकारी.. हूँ! 
मैं, प्रिये.., मैं.. ढूंढता हूँ... 
वस्तु अपनी, 
दर.. बदर क्यूं, हर.. कहीं..! 
मैं, क्या करूं? 
इसलिए तो, सोचता हूँ, रात दिन, 
दुनियां.. मेरी, प्रिय! यह नहीं!  

जय प्रकाश मिश्र










 

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